मासिक धर्म स्वच्छता पर बदलाव की पहल

Published at :31 May 2014 12:51 PM (IST)
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मासिक धर्म स्वच्छता पर बदलाव की पहल

मामाहवारी पर बात करना गांव तो क्या, शहरी क्षेत्र की किशोरियों और महिलाओं में भी एक तरह की कुंठा पायी जाती है. यह स्थिति दुनिया के अन्य कई देशों में भी है, जबकि यह सीधा-सीधा शारीरिक परिवर्तन की वैज्ञानिक प्रक्रिया है. इसे लेकर ग्रामीण समाज में अनेक तरह की भ्रांतियां हैं और कई मामलों में […]

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मामाहवारी पर बात करना गांव तो क्या, शहरी क्षेत्र की किशोरियों और महिलाओं में भी एक तरह की कुंठा पायी जाती है. यह स्थिति दुनिया के अन्य कई देशों में भी है, जबकि यह सीधा-सीधा शारीरिक परिवर्तन की वैज्ञानिक प्रक्रिया है. इसे लेकर ग्रामीण समाज में अनेक तरह की भ्रांतियां हैं और कई मामलों में इन भ्रांतियों को धार्मिक विश्वास से जोड़ कर और जटिल बना दिया गया है. यह स्थिति महिला स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती है. इस चुनौती को हल करने के लिए विश्व स्तर पर अभियन चल रहा है. 28 मई को विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस मनाया जाता है. भारत में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन एवं अन्य संगठन इस दिशा में लगातार प्रयास कर रहे हैं. इसी संदर्भ में झारखंड-बिहार में यूनिसेफ ने चार जिलों में अपना पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है. इसके जरिये सामाजिक सोच को बदलने तथा किशोरियों और महिलाओं में इस विषय को लेकर आत्मविश्वास विकसित करने की बड़ी पहल हो रही है. इस पहल को दोनों राज्यों के अन्य जिलों के संदर्भ में जानने-समझने की जरूरत है, ताकि माहवारी को लेकर समाज में व्याप्त भ्रांतियों और कुंडाओं को दूर करने का माहौल बन सके.

पंचायतनामा डेस्क

यूनिसेफ बिहार के नवादा और वैशाली तथा झारखंड के गुमला और पूर्वी सिंहभूम जिलों में माहवारी (मासिक धर्म) संबंधी साफ-सफाई को लेकर महिलाओं और किशोरियों के बीच जागरूकता कार्यक्रम चलाया जा रहा है. यह पायलट प्रोजेक्ट है. बिहार में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और बिहार शिक्षा परियोजना का यूनिसेफ को सहयोग भी है. यूनिसेफ ने जॉनसन एंड जॉनसन की भी मदद ली है. इसकी सफलता और इसके अनुभव इस कार्यक्रम की भावी रूपरेखा को तय होगी. इसके जरिये लड़कियों और महिलाओं को माहवारी के दौरान बरती जानी वाली स्वच्छता तथा इसके स्वास्थ्य संबंधी विषयों की जानकारी दी जा रही है. खास कर माहवारी को लेकर जो सामाजिक भ्रांतियां और व्यवहार हैं, उनमें बदलाव लाने की पहल की जा रही है.

ग्रामीण क्षेत्र की 10 से 19 साल की लड़कियों में माहवारी को लेकर खास प्रकार की ग्रंथी पायी जाती है. वे इसे शारीरिक बदलाव की सामान्य प्रक्रिया मानने की जगह एक सामाजिक संकोच का विषय मानती हैं. इसे लेकर सामाजिक व्यवहार भी करीब-करीब ऐसा ही है. इस विषय पर खुल कर बातचीत करने की मानसिकता अब तक विकसित नहीं हुई है. लिहाजा किशोरियों में इसे लेकर गैर जरूरी मानसिक तनाव, कुंठा और छुपाव की प्रवृत्ति आम है. इस कार्यक्रम के जरिये इस सोच और व्यवहार में बदलाव लाने की बड़ी पहल की जा रही है. ज्यादातर लड़कियां माहवारी को लेकर मानसिक रूप से बिल्कुल तैयार नहीं होतीं और जब यह स्थिति आती है, तो इसे छुपाने का प्रयास करती हैं या इस घबराहट में होती हैं कि इसकी जानकारी किस से साझा करें. माहवारी को लेकर महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, शिक्षिकाओं और पहली बार की माहवारी से गुजर चुकी महिलाओं में भी सही जानकारी की दर कम है.

जॉनसन एंड जॉनसन भी साङोदार

मासिक धर्म संबंधी स्वच्छता और किशोरियों पर लगाये गये कई सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिबंधों की सच्चाई दयनीय है. इस सच्चाई को सामाजिक संदर्भ में जोड़ कर यूनिसेफ ने यह परियोजना शुरू की है. इसे ‘खिलती उम्र की बंदिशें’ नाम दिया गया है. जॉनसन एंड जॉनसन को भी इसमें साङोदार बनाया है.

प्राथमिक अनुसंधान के नतीजे गंभीर

यूनिसेफ ने वर्ष 2013 में बिहार के इन दो जिलों में प्राथमिक अनुसंधान के लिए सर्वे भी कराया. इसमें किशोरियों, महिलाओं और इस विषय से जुड़े अन्य लोगों, जैसे माता-पिता, शिक्षिका, महिला स्वास्थ्यकर्मी आदि को विषय बनाया गया. अनुसंधान के लिए साक्षात्कार विधि अपनायी गयी. नालंदा और वैशाली में 4500 साक्षात्कार संकलित किये गये. इस अनुसंधान का जो नतीजा आया, बिहार-झारखंड के बाकी जिलों में भी मासिक धर्म स्वच्छता और उसके प्रबंधन से संबंधित मौजूदा ज्ञान, दृष्टिकोण और विश्वास की स्थिति करीब-करीब वही है. का संकेत कर रहे हैं.

बातचीत और सही ज्ञान का अभाव

ग्रमीण बिहार में महिलाओं के लिए माहवारी का विषय आज भी लज्जा और शर्मिंदगी का माना जाता है. इस विषय पर बातचीत न केवल हतोत्साहित करती है बल्कि प्रतिबंधित भी है. यह सोच कि माहवारी प्रारंभ होने वाली किशोरियों को मासिक धर्म के लिए, तैयार नहीं किया जाना चाहिए. ज्ञान की कमी और मौन की संस्कृति को दर्शाता है जो कि उन्हें एक भयंकर अनुभव की ओर ले जाता है. मगर जानकारी दी भी जाती है तो सिर्फ मासिक धर्म के प्रबंधन के बारे में न कि मासिक धर्म क्यों होता है. और कैसे स्वच्छता बनाये रखे. किशोरियां, यदि महवारी के संबंध में जानकारी प्राप्त करने की हिम्मत भी करती है तो बंद दरवाजा के अंदर और बड़ी गुपचुप तरीके से, इस पर डांट पड़ने की पूरी संभावना होती है. महिला के जननांग के नामों के लिये उपयुक्त शब्दावली की कमी के मामले को बदतर बनाती है. महिला जननांगों के नाम गलियों की भाषा के रूप में प्रयोग किया जाता है. उपयुक्त शब्दावली न होने के कारण इस विषय पर चर्चा करना और भी कठिन हो जाता है. और इससे शर्म और माहवारी से जुड़ी नकरात्मक सोच और मजबूत हो जाती है. इस बारे में धार्मिक मान्यातएं भी हैं- इस्लाम और हिंदु धर्म की धार्मिक पुस्तकों के अनुसार माहवारी के दिनों में सामाजिक बंदिशों और रोकने-टोकने संबंधी व्यवहारों को वैधता मिलती है. अक्सर लड़कियों पर ‘यह मत करो’ कहकर प्रतिबंध लगाया जाता है. समय के साथ लड़कियां यह सोचना शुरू कर देती है कि ‘वह यह नहीं कर सकती’ और अंत में ‘मैं ऐसा नहीं करूंगी’ मानकर खुद ही अपने पर बंदिशें लगा लेती है.

एक बड़ा अंतर यह आया

यूनिसेफ के अध्ययन में एक बड़ा बदलाव यह पाया गया कि स्कूल जाने वाली ज्यादातर लड़कियां माहवारी के कारण अपनी पढ़ाई के नुकसान के पक्ष में नहीं हैं. 85 प्रतिशत किशोरियां इस दौरान विद्यालय जाने के पक्ष में हैं. उनमें से 79 प्रतिशत ने माना कि उनकी मातायें पढ़ाई जारी रखने में उनसे सहमत होंगी. यही प्रचलन माहवारी शुरू होने के बाद पढ़ाई जारी रखने के बारे में देखा गया. 93 प्रतिशत किशोरियों ने माना कि माहवारी शुरू होने के बाद भी जाना जारी रखना चाहिए और 91 प्रतिशत की राय है कि उनकी माताएं उनके इस विचार से सहमत होंगी.

यूनिसेफ की पहल

हालात बदलने की जिद

बिहार में इस साल जनवरी में यूनिसेफ ने लड़कियों में मासिक धर्म स्वच्छता और स्वास्थ्य विषय में संवाद विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया. इसमें सरकारी अधिकारियों, शिक्षकों, गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों तथा किशोरियों ने हिस्सा लिया. इसमें मासिक धर्म, उससे जुड़ी स्वच्छता और स्वास्थ्य से उसके संबंध पर बातचीत की परिस्थितियां विकसित करने के पर चर्चा की गयी. मार्च 2014 में यूनिसेफ ने इस विषय पर संचार रणनीति तैयार की, जिसका समर्थन राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने किया.

2015 तक का लक्ष्य

यह लक्ष्य तय किया गया है कि सन 2015 तक बिहार के दोनों जिलों में किशोरियां और महिलाएं माहवारी एवं उससे संबंधित स्वच्छता के बारे में जानने लगेंगी और माहवारी की अवधि में स्वच्छतापूर्ण प्रबंधन करने लगेंगी.

इस तरह प्राप्त करेंगे लक्ष्य

3,800 (लगभग) ग्राम स्तरीय कार्यकर्ता (आशा /आंगनबाड़ी कार्यकर्ता), अध्यापिकायें और साथी शिक्षक माहवारी सम्बन्धी स्वच्छता और इसके प्रबंधन पर समझ को बढ़ावा देने में आपसी संचार/सामुदायिक गतिशीलता सत्रों के संचालन में सक्षम हों.

10 से 19 वर्ष की आयु वर्ग वाली 3,00,000 (लगभग) किशोरियाँ और 12,000 महिलायें माहवारी और उससे सम्बन्धी स्वच्छता के प्रबन्धन के विषय पर अपने हमउम्रों से चर्चा करने में सक्षम हैं :

माहवारी के बारे में खुलकर बात कर सकें, शर्मिन्द्गी न महसूस करें.

माहवारी और इससे संबंधित साफ-सफाई की जानकारी का लाभ.

माहवारी से संबंधित साधनों के बारे में बात करने के लिए आत्मविश्वास होन.

मासिक चक्र के स्वच्छतापूर्ण प्रबन्धन में सुधार ला सकें.

माहवारी के अवशोषक का पर्यावरण के सुरक्षित तरीके से निस्तारण कर सकें.

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