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विश्व मानवता के पुजारी थे गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर

Updated at : 09 May 2023 1:22 PM (IST)
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विश्व मानवता के पुजारी थे गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर साधक, चिंतक और महान प्रेरक थे. उनकी काव्य साधना की वैभव और विविधता ने मानव जाति की अंतरात्मा को अभिभूत किया है.

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-डॉ एनके बेरा-

कविगुरु, गुरुदेव, ऋषिकवि, विश्वकवि आदि अनेक विशेषणों से संबोधित महापुरुष गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर विश्व मानवता के पुजारी थे. उनके दृष्टिकोण से सब ठांई मोर घर आछे,आमि सेई घर मरि खुंजिया. वस्तुतः रवींद्रनाथ केवल भारत के ही नहीं, सारे संसार के कवि थे, विश्वमानव के कवि, इसलिए कवि ने स्वयं लिखा है-

मैं हूं पृथ्वी का कवि

जहां जितनी भी होती है ध्वनि

मेरी बांसुरी के सुर में उसी क्षण

जाग उठती है उसकी प्रतिध्वनि

इस स्वर साधना में पहुंची नहीं

बहुतों की पुकार,

इसी से रह गयी दरार

अनुमान और कल्पना में

धरित्री की महा एकता

पूर्ण करती रही है

निस्तब्ध क्षणों में मेरे प्राण

विशाल और बहुमुखी थी रवींद्रनाथ की प्रतिभा

विश्वकवि रवींद्रनाथ की प्रतिभा इतनी व्यापक, विशाल और बहुमुखी थी कि उसे पूरा-पूरा समझना, आंकना मुश्किल ही नहीं, लगभग असंभव-सा है. उन्होंने कविता को नये छंद दिये, संगीत को नये स्वर,चरित्रों को नयी आकृतियां और मानव को अनेक प्रेरणाएं दी. वह साधक, चिंतक और महान प्रेरक थे, उनकी काव्य साधना के वैभव और विविधता ने मानव जाति की अंतरात्मा को अभिभूत किया. संसार के किसी भी देश और काल में शायद उसकी तुलना नहीं मिलती, केवल एक कवि की साधना से एक प्रादेशिक भाषा बांग्ला विश्व साहित्य के परिधि में पहुंच गयी. यूरोप में इसका उदाहरण हमें दांते के जीवन से मिलता है. लेकिन रवींद्रनाथ की प्रसिद्धि शायद दांते से भी दूर प्रसारी और युगांतकारी है. भारत के समग्र जीवन से एकात्मता ही रवींद्रनाथ की प्रबल प्राणशक्ति का उत्स है. उनकी सृजनशील प्रतिभा के अक्षय प्रकाश का मूल भी यही है. उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग, दीन-दुखिया के दुख में हमेशा चिंतित रहते थे, इसलिए उनकी रचनाओं में मध्यवर्गीय तथा निम्नवर्गीय भावनाओं की प्रतिच्छवि देखने को मिलता है. कवि जन्मदिन काव्य में स्वयं लिखा है-सबसे दुर्गम जो मनुष्य है, अपने अंतराल में, उसका कोई परिणाम नहीं वाह्य देश काल में, वह है अंतरमन, अंतर मिलने पर ही मिलता है उसका अंतर परिचय, मिलता नहीं सर्वत्र प्रवेश द्वार, आधी बनी हुई है सीमा रेखा मेरी, अपनी ही जीवन यात्रा की, किसान चलाते हल खेत में, बुनकर चलाते तांत घर में बैठ, बहुत दूर प्रसारित है इनका कर्मभार, उसी पर कदम रख चलता है सारा संसार.

राष्ट्रीयता का महान राग

ग्रामीण जीवन में सुधार, नवजागरण और सामाजिक सुधार के साथ-साथ साहित्य की एक ऐसी अतृप्त पुकार थी, जिसका जयघोष उनके समस्त काव्य में होता है. उन्होंने अपनी रचनाओं में राष्ट्रीयता का महान राग चलाया है और बांग्ला साहित्य की लहर अन्य भाषाओं के दरवाजे तक पहुंचायी है. गुरुदेव रवींद्रनाथ की विचार कल्पना आदि दूसरे साहित्य को भी प्रभावित करने लगी. ओड़िया साहित्य के (1920-30) सबुजयुग पर रवींद्रनाथ का प्रत्यक्ष प्रभाव है. इस तरह कविगुरु रवींद्रनाथ की साहित्यिक रचनाओं का देश की अन्य भाषाओं पर अपना व्यापक रूप से प्रभाव पड़ा है, क्योंकि हिंदी तो बांग्ला की बहन ही है. भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा है कि बांग्ला भाषा हिंदी का साथ देनेवाली बड़ी बहन के समान है. हिंदी के क्षेत्र में छायावाद के जन्म का श्रेय विश्वकवि रवींद्रनाथ को दिया जाता है.

शांतिनिकेतन की स्थापना

विश्व बंधुत्व की भावना से प्रेरित होकर गुरुदेव रवींद्रनाथ ने वर्ष 1901 में शांतिनिकेतन की स्थापना की. शांति निकेतन इस हिंसा-विद्वेष से जर्जर सागर में एक ऐसा आलोकस्तंभ है, जिससे रक्तसिंधु में डूबती-तैरती मानव जाति को सुरक्षा की आशा-किरणें प्राप्त होती हैं. आरंभ के समय वहां केवल दो-तीन छात्र थे, लेकिन धीरे-धीरे छात्रों की संख्या सैकड़ों तक पहुंच गयी. आज शांतिनिकेतन विश्वभारती विश्वविद्यालय के नाम से प्रसिद्ध हो चुका है. रवींद्रनाथ ने स्वयं शांतिनिकेतन के संबंध में लिखा है,- मैं शांतिनिकेतन, विश्वभारती को बंगाल की नहीं, भारतवर्ष की नहीं, संसार की संस्था मानता हूं और चाहता हूं कि यह संस्था संसार के तमाम लोगों की संस्कृति का आदर करें और भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करे. यहां पर सभी संस्कृतियों और भाषाओं के विद्वान रहें और अपनी-अपनी संस्कृतियों का अन्वेषण और उन्नति करें. विश्वभारती सचमुच विश्वभारती है. यहां आकर राष्ट्रीयता के तंग घेरे समाप्त हो जाते हैं और मानव विश्वबंधुत्व के दिव्यमार्ग से दीक्षित हो जाता है.

गीतांजलि के लिए नोबेल पुरस्कार

रवींद्रनाथ की अमर कृति गीतांजलि जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ, उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें ईश्वर चेतना व अध्यात्म चेतना के साथ-साथ स्वदेश चेतना, विश्वचेतना का अभिनव आदर्श प्रकाशित हुआ है. इस काव्य में प्रकृति चेतना, मानव चेतना का समन्वय हुआ है. गीताजंलि मुख्यतः अध्यात्म चेतना क बंधन एवं व्याकुलता वाणी इस काव्य में संपूर्ण रूप से है.

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