कई बीघा जमीन गदाधर नदी के कटाव में चली गई है. स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 2010 में अलीपुरद्वार नगरपालिका की तत्कालीन कांग्रेस बोर्ड ने इस जमीन की खरीद की थी. एक लाख 30 हजार रुपये प्रति कट्ठा की दर से जमीन खरीदी गई थी. नगरपालिका की योजना यहां डंपिंग ग्राउंड बनाने की थी. कुछ दिनों तक नगरपालिका के विभिन्न वार्डोँ से कचरा लाकर यहां फेंका भी गया. बाद में स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया.
स्थानीय लोगों के कड़े विरोध को देखते हुए नगरपालिका ने कचरा फेंकने का काम बंद कर दिया. तब से लेकर अब तक 23 बीघा जमीन यूं ही पड़ी हुई है. कई बीघा जमीन के गदाधर नदी में समा जाने के बाद नदी के तट पर बांध बनाने की मांग ने जोर पकड़ लिया है. हालांकि नगरपालिका इस दिशा में कोई कदम नहीं उठा रही है. स्थानीय लोगों का कहना है कि इस सरकारी जमीन पर डंपिंग ग्राउंड नहीं बनने के बाद स्कूल आदि बनाकर इसका उपयोग हो सकता है. बरसात के समय जिस तरह से गदाधर नदी में जल स्तर बढ़ जाता है उससे आने वाले दिनों में इस जमीन को बचा पाना संभव नहीं है.
दूसरी तरफ नगरपालिका अध्यक्ष असीत दत्ता का कहना है कि वर्ष 2010 में तत्कालीन कांग्रेस बोर्ड के समय जमीन खरीदी गई थी. इसकी पूरी जिम्मेदारी वर्तमान बोर्ड पर डाल देना ठीक नहीं है. फिर भी नगरपालिका की ओर से जमीन को बचाने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने इसके लिए तत्कालीन कांग्रेस बोर्ड पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि बगैर किसी योजना के ही लाखों रुपये की जमीन खरीद ली गई. इस जमीन का कोई फायदा नहीं है. स्थानीय लोगों की विरोध की वजह से वहां डंपिंग ग्राउंड बनाना संभव नहीं है. दूसरी तरफ माकपा ने भी इस मुद्दे को लेकर नगरपालिका पर निशाना साधा है.
नगरपालिका में विरोधी दल के नेता माकपा के अनिंद भौमिक ने कहा है कि वाम बोर्ड के समय जमीन पर डंपिंग ग्राउंड बनाने की कोशिश की गई थी, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली. उन्होंने कांग्रेग बोर्ड के जमीन खरीदने पर भी सवालिया निशान लगाया. फिर भी उन्होंने कहा है कि जमीन नगरपालिका की है. इसलिए नदी कटाव से जमीन को बचाने की जिम्मेदारी भी नगरपालिका की ही है. उन्होंने भी अलीपुरद्वार नगरपालिका से कंक्रीट की दीवार बनाने की मांग की.