कांग्रेस-माकपा के गढ़ में सेंध लगायेगी तृणमूल!

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सिलीगुड़ी : इस बार तृणमूल कांग्रेस ने पहली बार यहां से पूर्णेंदु दे को अपना उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस को चुनौती देने के लिए मोर्चा खोल दिया है. जबकि कांग्रेस ने मौजूदा विधायक मोहित सेनगुप्त को फिर मैदान में उतारा है. वाम मोरचा इस सीट पर कांग्रेस का समर्थन करेगा. वहीं भाजपा ने प्रदीप कुमार सरकार […]

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सिलीगुड़ी : इस बार तृणमूल कांग्रेस ने पहली बार यहां से पूर्णेंदु दे को अपना उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस को चुनौती देने के लिए मोर्चा खोल दिया है. जबकि कांग्रेस ने मौजूदा विधायक मोहित सेनगुप्त को फिर मैदान में उतारा है. वाम मोरचा इस सीट पर कांग्रेस का समर्थन करेगा. वहीं भाजपा ने प्रदीप कुमार सरकार को उम्मीदवार बनाया है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, समाजवादी पार्टी की ओर से अरुण सिंह भी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं.
रायगंज विधानसभा सीट रायगंज लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत ही है. तृणमूल उम्मीदवार पूर्णेंदु दे ने जोर-शोर से चुनाव प्रचार शुरू तो कर दिया है, लेकिन मतदाताओं का रुझान कांग्रेस की ओर ही झुका हुआ नजर आ रहा है.
कांग्रेस प्रत्याशी मोहित सेनगुप्त रायगंज नगरपालिका के चेयरमैन भी हैं. वहीं पूर्णेंदु दे जिला परिषद के सभाधिपति हैं. मजे की बात यह है कि पूर्णेंदु दे कांग्रेस से ही जीत कर जिला परिषद पहुंचे थे, लेकिन जीत के बाद तृणमूल में शामिल हो गये. कांग्रेस से विजयी होकर तृणमूल में शामिल होने का नुकसान पूर्णेंदु को उठाना पड़ सकता है. नारद कांड से तृणमूल की साख पर जो बट्टा लगा है, उसके चलते भी उन्हें नुकसान हो सकता है.मौजूदा कांग्रेसी विधायक मोहित सेनगुप्त का पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रियरंजन दास मुंशी के परिवार के साथ गहरा नाता है. इस परिवार का इलाके में काफी असर है. इसके अतिरिक्त एक नेता के रूप में उनकी छवि साफ-सुथरी है.
पिछले पांच वर्षों में मोहित सेनगुप्त ने विधायक और नगरपालिका चेयरमैन के रूप में इलाके का काफी विकास किया है. सड़क, जल निकासी की व्यवस्था के साथ-साथ शहरी सौंदर्यीकरण, पार्क आदि का निर्माण कराया है. उनके कार्य से मतदाता प्रसन्न हैं. इसके बाद भी तृणमूल समर्थकों का कहना है कि एक विधायक के रूप में मोहित सेनगुप्त विफल रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस वाम मोरचा व कांग्रेस के बीच हुए गंठबंधन को मुद्दा बनाकर प्रचार में उतरी है, जबकि मोहित सेनगुप्त अपने विकास कार्य को लेकर समर्थन मांग रहे हैं.
रायगंज सीट पर कांग्रेस के दबदबे को पुराने रिकॉर्ड से आसानी से समझा जा सकता है. वर्ष 1951 के चुनाव में कांग्रेस के श्याम प्रसाद वर्मन यहां से विधायक बने थे. 1957 के चुनाव में कांग्रेस के हाजी बदरूद्दीन अहमद व 1962 में कांग्रेस से ही रमेंद्रनाथ दत्त विजयी हुए.
अब तक के इतिहास में मात्र एक बार 1967 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से विजयी होकर एन एन कुंडू विधायक बने. कांग्रेस की जीत का सिलसिला टूटने का फायदा 1969 के चुनाव में माकपा को मिला और मानस राय विजयी हुए. 1971 के चुनाव में कांग्रेस ने माकपा से छीन कर इस सीट पर फिर से कब्जा जमाया. दूसरी बार विजयी होकर रमेंद्रनाथ दत्त 1977 तक विधायक रहे. माकपा व कांग्रेस में इस सीट को लेकर छीना-झपटी का खेल 1996 तक चला.
इस बीच 1977 के चुनाव में माकपा के खगेंद्रनाथ सिन्हा विजयी हुए, फिर 1982 में कांग्रेस के दीपेंद्र वर्मन. वर्ष 1987 में माकपा के खगेंद्रनाथ सिन्हा कांग्रेस को हराकर 1996 तक इस सीट से विधायक बने रहे. वर्ष 1996 में कांग्रेस के दिलीप कुमार दास विजयी हुये. वर्ष 2001 से लकेर 2011 तक कांग्रेस के ही चित्तरंजन राय लगातार दो बार इसी सीट से विजयी हुए. वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में ममता की परिवर्तन की आंधी भी कांग्रेस की जड़ को नहीं हिला पायी.
वर्ष 2011 के चुनाव में कुल 1 लाख 49 हजार 300 मतदाताओं में से 1 लाख 26 हजार 506 मतदाताओं ने मतदान किया. इसमें कांग्रेस के मोहित सेनगुप्ता को 49.69 प्रतिशत एवं समाजवादी पार्टी को 45.42 प्रतिशत मत मिले. इसके अतिरिक्त भाजपा, बीएसपी, एसयूसीआई, आईपीएफबी एवं निर्दलीय उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गयी.
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