कलाकारों की कलाबाजियाें की बदौलत जिंदा है सर्कस
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 01 Jan 2020 6:16 AM
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कोलकाता : आज भले ही कंप्यूटर और मोबाइल का युग हो. बंद हो रहे सिंगल स्क्रीन सिनेमा के दौर में मल्टीप्लेक्स का बोलबाला है. विपरीत परिस्थितियों, सर्कस में जानवरों पर प्रतिबंध के बावजूद कलाकारों की कलाबाजियों ने सर्कस का वजूद जिंदा रखा है और बड़ी संख्या में अभी भी लोग सर्कस देखने पहुंच रहे हैं. […]
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कोलकाता : आज भले ही कंप्यूटर और मोबाइल का युग हो. बंद हो रहे सिंगल स्क्रीन सिनेमा के दौर में मल्टीप्लेक्स का बोलबाला है. विपरीत परिस्थितियों, सर्कस में जानवरों पर प्रतिबंध के बावजूद कलाकारों की कलाबाजियों ने सर्कस का वजूद जिंदा रखा है और बड़ी संख्या में अभी भी लोग सर्कस देखने पहुंच रहे हैं.
मध्यम वर्ग के एक बड़े वर्ग का मनोरंजन का साधन बना हुआ है. कोलकाता में इन दिनों टाला पार्क में अंजता सर्कस चल रहा है. सर्कस में प्रतिदिन तीन शो होते हैं, जिनमें लोगों की उपस्थिति सर्कस के प्रति लोगों के रुझान को दिखाती है.
अजंता सर्कस के मैनेजिंग डॉयरेक्टर रवि कुमार ने प्रभात खबर को बताया कि 1990 में सर्कस में जंगली जानवरों के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. इस कारण सर्कस में अब केवल कुछ घरेलू जानवर व पक्षी ही रह गये हैं.
श्री कुमार ने बताया कि सर्कस मूलत: जिमनास्टिक खेल पर आधारित मनोरंजक शो हो गया है. सर्कस के दौरान तरह-तरह के जिमनास्टिक और करतब दिखाये जाते हैं. इस वर्ष रूस व इथोपिया के राष्ट्रीय स्तर के पांच जिमनास्टिक भी अपने करतब दिखा रहे हैं.
इथोपिया के कलाकारों का एक्रोबेटिक्स देखते ही बनता है. रशियन कलाकारों के हैरतअंगेत करतब से दर्शक दांतों तले अंगुलियां दबाने के लिए बाध्य हो जाते हैं. उन्होंने कहा कि सर्कस में अभी भी सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र जोकर बने हुए हैं. बच्चे उनका इंतजार करते रहते हैं. जब वे मंच पर आते हैं, तो अपनी हरकतों से दर्शकों को लोटपोट होने के लिए मजबूर कर देते हैं.
श्री कुमार ने बताया कि हंसी की दुनिया में सर्कस के कलाकारों का दर्द भी छिपा है. उनलोगों ने पार्क सर्कस में सर्कस लगाने की अनुमति मांगी थी, लेकिन यह नहीं मिली, जबकि नियमित रूप से वहां कोई न कोई कार्यक्रम होता रहता है. इस कारण उन लोगों को बाध्य होकर टाला पार्क में सर्कस आयोजित करना पड़ रहा है.
अन्य लोक कलाओं की तरह सर्कस भी एक लोक कला है और इससे बंगाल में हजारों लोग जुड़े हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मांग की कि जिस तरह से पश्चिम बंगाल सरकार अन्य लोक कलाओं और कलाकारों को मदद कर रही हैं. कलाकारों को भत्ता दे रही हैं. उसी तरह से सर्कस के कलाकारों काे भी मदद दें, ताकि सर्कस की कला जिंदा रह सके.
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