प्लास्टिक के दीपक, चाइनीज लाइटें समाप्त कर रही मिट्टी के दीयों की परंपरा

पानागढ़ : रंग-बिरंगी चाइनीज लाइटों के बाजार में उपलब्ध होने से मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों की स्थिति दिन-प्रतिदिन दयनीय होती जा रही है. मिट्टी के दीपों के खरीदारी घटती जा रही है. कुम्हारों ने कहा कि इसमें लाभ नहीं होने के कारण इसे टिकाये रखने के लिए उन्हें सरकारी मदद की आवश्यकता है. […]
पानागढ़ : रंग-बिरंगी चाइनीज लाइटों के बाजार में उपलब्ध होने से मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों की स्थिति दिन-प्रतिदिन दयनीय होती जा रही है. मिट्टी के दीपों के खरीदारी घटती जा रही है. कुम्हारों ने कहा कि इसमें लाभ नहीं होने के कारण इसे टिकाये रखने के लिए उन्हें सरकारी मदद की आवश्यकता है. यदि ऐसा नहीं होगा तो मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों का परंपरा समाप्त हो जायेगी.
पानागढ़ बाजार दक्षिण कैनलपाड़ा निवासी कृष्णा पंडित ने कहा कि दीपावली से पहले मिट्टी के दीपक बनाने का कार्य शुरू हो जाता है. उनका परिवार इसी पेशे से परंपरागत रूप से जुड़ा है. उनके पिता तथा उनके पितामह भी इसी परंपरा से जुड़े थे. बाजार में मिट्टी के दीपक के खरीदारों की संख्या प्रतिदिन कम हो रही है. उन्होंने कहा कि चाइनीज लाइटों के बाजार में आने तथा सस्ते दर पर उपलब्ध होने से उन लोगों को बाजार में चाइनीस लाइट के साथ टक्कर लेने में काफी दिक्कते हो रही हैं. मिट्टी की समस्या अलग से है. कोयले की बढ़ती कीमत और अन्य सामानों की कीमतों के कारण ही दीपकों की कीमत बढ़ रही है. इससे जीविका चलाना मुश्किल हो गया है.
कृष्णा ने कहा कि सरकार प्लास्टिक के दीपकों तथा विदेशी लाइटों पर प्रतिबंध लगाये तो एक बार फिर कुम्हारों का जीवन तथा इस धरोहर को बचाया जा सकता है. उन्होंने कहा कि पहले लोग एक सौ, दो सौ, पांच सौ या हजारों दीपक खरीदते थे. दीपावली पर अपने घर तथा मंदिरों में दीपक जलाकर दीपावली मनाते थे. अब बाजार में मोमबत्ती तथा चाइनीज झालरों और दीयों के आने से मिट्टी के दीयों का बाजार काफी गिरा है. इसके साथ ही मशीनों ने भी चाक पर हमला बोला है. सरकार इसको बचाना चाहती है तो आर्थिक रूप से उनकी मदद करनी होगी. चाइनीज तथा प्लास्टिक के दीपों पर पाबंदी लगानी होगी.
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