जंगल के जामुन और खजूर बनेंगे रोजगार का आधार, खूंटपानी के विद्यार्थियों ने दिखाई नवाचार की राह

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कार्यक्रम में शामिल विद्यार्थी.

खूंटपानी के उद्यान महाविद्यालय के छात्रों ने जामुन और खजूर से उत्पाद बनाकर ग्रामीण स्वरोजगार और उद्यमिता की नई राह दिखाई है। जानें पूरी खबर।

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शचिंद्र कुमार दाश

आपके शहर में

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खरसावां. बरसात के मौसम में जंगलों और गांवों में बड़ी मात्रा में मिलने वाले जामुन और खजूर अक्सर समय पर उपयोग नहीं होने के कारण खराब हो जाते हैं. ऐसे में बड़ा हिस्सा यूं ही बर्बाद हो जाता है. अब इस समस्या का समाधान खोजने की दिशा में उद्यान महाविद्यालय, खूंटपानी ने एक नई पहल की है. HELP-423 मॉड्यूल के तहत विद्यार्थियों ने स्थानीय फलों का वैज्ञानिक तरीके से मूल्य संवर्धन कर यह साबित किया कि इन्हीं फलों से पौष्टिक, आकर्षक और बाजार में बिकने वाले उत्पाद तैयार कर ग्रामीणों की आय बढ़ाई जा सकती है. महाविद्यालय परिसर में आयोजित प्रायोगिक गतिविधि के दौरान विद्यार्थियों ने जामुन रेडी-टू-सर्व (आरटीएस) पेय, जामुन फ्रूट लेदर और खजूर की चटनी तैयार की.

प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल उत्पाद बनाना नहीं था, बल्कि विद्यार्थियों को यह समझाना भी था कि स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग से स्वरोजगार और ग्रामीण उद्यमिता को कैसे बढ़ावा दिया जा सकता है. शिक्षकों ने बताया कि झारखंड के जंगलों में उपलब्ध जामुन और खजूर जैसे फलों का यदि वैज्ञानिक ढंग से प्रसंस्करण किया जाए तो इन्हें पूरे वर्ष बाजार में उपलब्ध कराया जा सकता है. कृत्रिम रंग और प्रिजर्वेटिव से पूरी तरह मुक्त है जामुन पेय प्रयोग के दौरान तैयार किए गए जामुन आरटीएस पेय का वैज्ञानिक परीक्षण भी किया गया. इसमें कुल घुलनशील ठोस (टीएसएस) 13.25 डिग्री ब्रिक्स, अम्लता 0.27 प्रतिशत तथा पीएच 3.85 दर्ज किया गया.

विशेष बात यह रही कि इस पेय में किसी भी प्रकार के कृत्रिम रंग या रासायनिक परिरक्षक का उपयोग नहीं किया गया. विशेषज्ञों ने बताया कि जामुन में मौजूद प्राकृतिक गुण रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं तथा यह हृदय स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है. खजूर की चटनी में स्वाद के साथ सेहत का भी खजाना विद्यार्थियों ने खजूर, गुड़, इमली, सौंफ, जीरा और अन्य मसालों के मिश्रण से पौष्टिक खजूर की चटनी भी तैयार की. परीक्षण में इसका टीएसएस 62 डिग्री ब्रिक्स, अम्लता 2.1 प्रतिशत तथा पीएच 2.4 पाया गया.

विशेषज्ञों के अनुसार यह चटनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, हीमोग्लोबिन में सुधार करने और शरीर को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराने में सहायक हो सकती है. इसके साथ ही जामुन फ्रूट लेदर भी तैयार किया गया, जिसे बच्चों और युवाओं के लिए एक पौष्टिक स्नैक के रूप में विकसित किया गया. किसानों और ग्रामीण युवाओं के लिए खुलेंगे स्वरोजगार के नए अवसर विशेषज्ञों का कहना है कि यदि स्वयं सहायता समूह, किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) और ग्रामीण युवा इस तकनीक को अपनाएं तो कम लागत में मूल्य संवर्धित उत्पाद तैयार कर स्थानीय बाजार के साथ बड़े शहरों तक पहुंच बना सकते हैं. इससे फलों की बर्बादी कम होगी और किसानों को बेहतर मूल्य भी मिलेगा.

झारखंड में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध वन उत्पादों के संरक्षण और उपयोग की दिशा में यह पहल महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. व्यावहारिक प्रशिक्षण से विद्यार्थियों को मिला नया अनुभव यह गतिविधि डॉ. ए.के. सिंह, डॉ. कोयल डे एवं डॉ. अर्केंदु घोष के मार्गदर्शन में आयोजित की गई. इसमें सोनिया, संगीता, श्रुति, पूजा, प्रिया, मधु, आकांक्षा, बादल, संजीत और आदर्श सहित कई विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई. प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों ने फल प्रसंस्करण, गुणवत्ता नियंत्रण, पैकेजिंग और विपणन की व्यावहारिक बारीकियां सीखीं. महाविद्यालय का मानना है कि इस तरह की पहल भविष्य में स्थानीय संसाधनों पर आधारित ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा देने और आत्मनिर्भर गांवों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.


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