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नया अंदाज, पुराना स्वाद

चौक-चौराहे और बाजार में नजरें फेरे, तो इन दिनों गन्ने के जूस और बादाम-शेक व फालूदा के आकर्षक स्टॉल नजर दिख जा रहे हैं.

रांची के बाजार में मुंबई और राजस्थान का कंसेप्टअभिषेक रॉय. तपती गर्मी में लोग शीतल पेय पदार्थ, जूस, आइसक्रीम, फालूदा जैसे विकल्पों को चुनते हैं. चौक-चौराहे और बाजार में नजरें फेरे, तो इन दिनों गन्ने के जूस और बादाम-शेक व फालूदा के आकर्षक स्टॉल नजर दिख जा रहे हैं. दिन में चमकीले रंगों वाले पोस्टर और रात में नियॉन लाइट के साथ बॉलीवुड तराना बजाने वाली गाड़ियों के कारण इन्हें दूर से पहचाना जा सकता है. इन्हें देखने मात्र से पारंपरिक व्यवसाय का नया बिजनेस मॉडल दिखता है. खास बात यह है कि अब गन्ने के जूस निकालने के लिए हाथ चक्का मशीन की जगह इलेक्ट्रिक जूसर का इस्तेमाल होने लगा है. वहीं, आइसक्रीम, फालूदा व बादाम-शेक का पारंपरिक साइकिल ठेला अब चारपहिया वाहन में बदल गया है. नये बिजनेस मॉडल को शहरवासी मुंबई और राजस्थान के तर्ज पर अपना रहे हैं.

मुंबई से मंगायी जा रही जूसर मशीन

शहर के भीड़-भाड़ वाले इलाके में गर्मी के दिनों में गन्ने का रस आसानी से उपलब्ध हो जाता है. पहले जहां गन्ने का रस हाथ चक्का मशीन से निकालने में दो लोग परिश्रम करते थे. वहीं, अब एक व्यक्ति इवी जूसर मशीन से आसानी से गन्ने का रस निकाल रहा है. गन्ने का यह जूसर मशीन खास तौर पर पिंपरी नवी मुंबई से मंगायी जा रही है. कोरोना काल के बाद बेरोजगार हो चुके युवा इस मशीन के सहारे बेहतर रोजगार कर रहे हैं. एदलहातू मोरहाबादी के नीतेश मेहता बताते हैं कि उन्होंने 70 हजार रुपये में मशीन खरीदी और ट्रांसपोर्ट कर रांची मंगाया. फिर पांच हजार रुपये के अतिरिक्त खर्च पर इसे ठेले में लगाया. स्थानीय फलमंडी से गन्ना खरीद कर अब इसका जूस बेच रहे हैं. मशीन की खासियत है कि यह एक ही बार में गन्ने का पूरा रस कंटेनर में जमा कर देती है. एक गन्ने से करीब तीन से चार ग्लास जूस निकल जाता है.

खाद निर्माता खरीद रहे गन्ने का डंठल

गन्ने की जूसर मशीन के इस्तेमाल से विक्रेता को दोहरा फायदा मिल रहा है. गन्ने से रस निकलने के बाद बचनेवाला डंठल खाद निर्माता खरीद रहे हैं. इन्हें किलो के भाव में खरीदा जा रहा है. एक गन्ना जूस विक्रेता ने बताया कि वे रातू के एक खाद निर्माता को गन्ने का डंठल सात रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेच देते हैं. इससे जूस के अलावा गन्ने के डंठल से भी मुनाफा हो रहा है. जबकि पहले डंठल में रस बचने के कारण डंठल खराब हो जाता था, जिससे इसका उपयोग खाद के रूप में नहीं हो पाता था.

रांची में मेवाड़ और भीलवाड़ा का स्वाद

शाम ढलते ही शहर के चौक-चौराहे व भीड़ वाले इलाके में आकर्षक चार पहिया वाहन दिख जा रहे हैं. इनमें बड़े-बड़े अक्षरों में मेवाड़ बादाम शेक या फालूदा आइसक्रीम लिखे दिखते हैं. नियॉन लाइट से सजी इन गाड़ियों के पास पहुंचने पर बॉलीवुड तराने भी सुनायी देते हैं. इन गाड़ियों में काेन शॉफ्टी, बादाम-शेक, आइसक्रीम और फालूदा बेचे जा रहे है. खास बात यह है कि यह गाड़ियां करीब 1500 किमी दूर राजस्थान के भीलवाड़ा और मेवाड़ से लायी गयी हैं. आइसक्रीम विक्रेता भी राजस्थान के ग्रामीण इलाकों से आये हैं, जो शहरवासियों को राजस्थान के पारंपरिक बादाम शेक और घर में बननेवाली फालूदा आइसक्रीम का स्वाद चखा रहे हैं. गर्मी के दिनों में बादाम शेक के स्वाद को लोग स्वास्थ्य लाभ से भी जोड़ रहे हैं.

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