Nisha Bhagat: गुमला से रांची तक 40 किमी चलीं, पेसा कानून के लिए उठायी आवाज
निशा भगत (फाइल फोटो)
निशा भगत ने पेसा कानून की मांग को लेकर 40 किलोमीटर पदयात्रा की. जल-जंगल-जमीन और स्वशासन के लिए उनकी आवाज़ ने आदिवासी समाज को प्रेरित किया.
रांची. आदिवासी नेत्री निशा भगत की पहचान केवल सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं थी, बल्कि वह आदिवासी अधिकारों के लिए सड़क पर उतरकर संघर्ष करने वाली आंदोलनकारी भी थीं. आदिवासी समाज के अधिकार, जल-जंगल-जमीन और स्वशासन से जुड़े मुद्दों को लेकर वह लगातार आवाज उठाती थीं. इसी संघर्ष के तहत जुलाई 2025 में उन्होंने गुमला से रांची तक करीब 40 किलोमीटर की पदयात्रा की थी.
पेसा कानून लागू कराने के लिए निकाली थी पदयात्रा
निशा भगत के नेतृत्व में केंद्रीय सरना समिति ने गुमला जिले के सिसई प्रखंड स्थित लिट्टा टोली से राजभवन, रांची तक पदयात्रा शुरू की थी. इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य झारखंड में पेसा कानून लागू कराने की मांग को सरकार तक पहुंचाना था. पदयात्रा शुरू करने से पहले लिट्टा टोली में पूर्व सांसद कार्तिक उरांव और उनकी पत्नी सुमति उरांव के समाधि स्थल पर पूजा-अर्चना की गयी थी. इसके बाद श्रद्धांजलि अर्पित कर यात्रा शुरू हुई.
आदिवासी स्वशासन और अधिकारों की करती थीं मांग
निशा भगत का मानना था कि आदिवासी समाज को अपनी परंपराओं, संस्कृति और स्वशासन व्यवस्था के अनुरूप अधिकार मिलने चाहिए. पेसा कानून को प्रभावी ढंग से लागू कराने की मांग इसी लड़ाई का हिस्सा थी. इसके अलावा वह सरना धर्म कोड, आदिवासी अस्मिता और जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी मुखर रहती थीं.
विधानसभा चुनाव भी लड़ चुकी थीं
निशा भगत ने 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में गुमला सीट से झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के टिकट पर चुनाव लड़ा था. सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी और आदिवासी मुद्दों पर मुखरता ने उन्हें अलग पहचान दिलायी थी.
उनकी मौत के बाद 40 किलोमीटर की यह पदयात्रा उनके सार्वजनिक जीवन के उन संघर्षों की याद दिलाती है, जिनके जरिये वह आदिवासी समाज के अधिकारों और स्वशासन की मांग को सरकार तक पहुंचाना चाहती थीं.
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