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My Mati: कुरमाली भाषा की लिपी, समस्या और समाधान

Updated at : 24 Feb 2023 2:52 PM (IST)
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My Mati: कुरमाली भाषा की लिपी, समस्या और समाधान

1901 के बंगाल प्रांत के जनगणना कमिश्नर मिस्टर ई ए गैट लिखते हैं कि ग्रियर्सन की सलाह पर ही उसने कुरमाली, खोट्टा या खोट्टाही और खोट्टाही बांग्ला को हिंदी परिवार में रखा है.

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ज्ञानेश्वर सिंह, सेवानिवृत विंग कमांडर

रांची जिले से सटे पश्चिम बंगाल सीमांत पुरुलिया जिले में कुरमाली-भाषियों की संख्या बहुल है. ओड़िशा के क्योंझर इत्यादि स्थानों में भी कुरमाली बोलने वालों की संख्या कम नहीं है. ये सभी एक भाषा-भाषी होने के बावजूद लिप्यांतर के कारण एक दूसरे के लिखित विचारों से या साहित्य से अवगत नहीं हो सकते. यदि इनमें समान लिपि का प्रचलन होता तो एक दूसरे के लेखादि को पढ़ने में कोई कठिनाई नहीं होती, भले ही ध्वनीय दृष्टिकोण से थोड़ा-बहुत उच्चारण संबंधी भिन्नता हो सकती है. ग्रियर्सन के लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया (वोल्यूम 5 पार्ट 2-पृष्ठ-166) में साफ-साफ कुरमाली भाषा के बारे लिखा है “मानभूम में बांग्ला लिपि अपनायी गयी है. अत: भाषा को बांग्ला के चश्मे से देखा गया है. फलत: शब्दों का उच्चारण वैसा ही है जैसे बांग्ला में होता है.”

1901 के बंगाल प्रांत के जनगणना कमिश्नर मिस्टर ई ए गैट लिखते हैं कि ग्रियर्सन की सलाह पर ही उसने कुरमाली, खोट्टा या खोट्टाही और खोट्टाही बांग्ला को हिंदी परिवार में रखा है. व्याकरण के स्वरूप के कारण कुरमाली भाषा हिंदी के समकक्ष है. कुरमाली के क्रिया का स्वरूप हिंदी की तरह ही है, न कि बांग्ला में. जर्नल आफ ऐसियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल में ग्रियर्सन ने इसे समझाने के लिये ‘ट्रांसलिटरेशन’शब्द का प्रयोग किया है. भाषा विज्ञान में ‘ट्रांसलिटरेशन’ का अर्थ लिपि के बदलने से शब्द, उच्चारण और व्याकरण के बदलाव से है.

अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि कुरमाली भाषा के सही परिवेश के लिये कौन-सी लिपि का उपयोग होना चाहिये. कुरमाली के लिये संप्रति तीन राज्यों में तीन तरह की लिपियों का प्रयोग हो रहा है- देवनागरी, बांग्ला और उड़िया. कुछ लोग खुदीराम महतो द्वारा प्रकाशित चिस लिपि तथा चक्रधरपुर के कुछ उत्साही कुरमाली प्रेमियों ने रोमन और अरबी लिपि के सम्मिश्रण से कुरमाली के लिये एक अलग लिपि प्रस्तुत करने की कोशिश की है. लिपि बदलने से व्याकरण बदल सकता है. इसे कुरमालीप्रेमियों और साहित्यकारों को समझना जरूरी है. कुरमाली और हिंदी में क्रिया का प्रयोग लिंग के अनुसार होता है, बांग्ला, ओड़िया या रोमन (अंग्रेजी) लिपि में नहीं.

कुरमाली का व्याकरण चूंकि हिंदी व्याकरण की तरह चलता है, अतः देवनागरी लिपि का चयन स्वाभाविक है. अब एक सरल उदाहरण लेते हैं- देवनागरी में हम ‘कुमार’ लिखते हैं. लेकिन बांग्ला लिपि में उसे ‘কুমার ’ लिखना चाहिये, बांग्ला के व्याकरण के कारण ह्रस्व से दीर्घ ऊ हो जाता है, जिससे उच्चारण में फर्क पड़ जाता है, फिर कुरमाली को কুর্মাল. इसका अर्थ है कि अगर बांग्ला या ओड़िया लिपि का प्रयोग कुरमाली भाषा के लिये हो तो इस तरह के परिवर्तनों की सूची बननी पड़ेगी, जिसे भाषाविदों द्वारा स्वीकृति प्राप्त हो, नहीं तो एक अस्त-व्यस्त व्याकरण, भाषा की मर्यादा और सुंदरता को नष्ट कर सकती है. यही कारण हो सकता है कि कुरमाली भाषा में बहुत से लेखक अपना ही नाम विभिन्न पुस्तकों में भिन्न-भिन्न तरह के उच्चारणों में लिखते हैं. आश्चर्य है कि ऐसी पुस्तकें विश्व-विद्यालयों के पाठ्यक्रमों के लिये स्वीकृत है. भाषाविदों को बुलाकर विश्वविद्यालयों को इस पर परामर्श लेना चाहिये.

सभी भाषाविदों के अनुसार कुरमाली हिंदी परिवार की ही भाषा है. पटना हाई कोर्ट ने भी इस पर मुहर लगा दी है. कीर्तिबास महतो बनाम बुधन महताईन के केस में 1925 के फैसले का हिंदी अनुवाद है-

“..पिछली जनगणना बंगाली को दो-तिहाई निवासियों की भाषा के रूप में दिखाती है, लेकिन यह परिणाम कुरमाली बोलने वाले कई लोगों को शामिल करके प्राप्त किया गया था. आदिवासी कुरमियों की आदिवासी भाषा कुरमाली को भाषाई सर्वेक्षण में बिहारी (हिंदी) भाषा के रूप में मान्यता दी गयी है, और जनगणना रिपोर्ट में इसे हिंदी के रूप में वर्गीकृत किया गया है. … लेकिन जैसा कि आम तौर पर बंगाली लिपि में लिखा जाता है और भाषाई सर्वेक्षण को उद्धृत करने से “इसे बंगाली चश्मे के माध्यम से देखा जाता है” …

कुरमाली भाषा के शुभचिंतक मयूरभंज के स्वर्गीय गिरीश चंद्र मोहंता ने अपने एक लेख ‘कुरमाली भाषा का अतीत और भविष्य’ में अपने विचार रखे हैं- “ इस भाषा के लिये किसी अनजान लिपि को अपनाना एक कठिनाई भरा चुनौती होगी. दूसरी तरफ कुरमाली भाषा में ऐसा कोई शब्द नहीं है, जिसे मौजूदा किसी भारतीय भाषा द्वारा उच्चारित न हो. लिपि के चयन में देवनागरी सबसे उपयुक्त होगा जिससे ज्यादातर कुरमाली का पाठन करने वाले परिचित हैं ”

दूसरी, एक महत्वपूर्ण सावधानी करने की बात उनके द्वारा कही गयी है – “ हमें कुरमाली भाषा को एसपेरान्टो भाषा नहीं बनानी चाहिये. पोलैंड देश के रूसी डाक्टर एसपेरान्टो भाषा का निर्माण किया था. उनके अनुसार विभिन्न भाषाओं के व्याकरण अलग- अलग हैं, उन्होंने उनमें एकरूपता लाने के लिये सभी भाषाओं के लिये एक व्याकरण बनाया और नाम दिया ‘एसपेरान्टो भाषा’. लेकिन भाषा दो-तीन सम्मेलनों तक ही सीमित रही और टिक नहीं पायी. उसी तरह अगर हम द्रविड़ व्याकरण के चश्मे से कुरमाली भाषा को देखें तो एक अव्यवस्थित व्याकरण मिलेगा और हम एसपेरान्टो की भाषा के राह पर चले जायेंगे ”

भाषाविज्ञान और व्याकरण के समझ के अभाव आज भी कुरमाली भाषा अपने शैशव काल में अपना एक सर्वसम्मत नाम ही ढूंढ रहा है, जब कि रांची विश्वविद्यालय में औपचारिक पढ़ाई के 41 साल हो चुके हैं.

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