Murma Jatra 2026: आखिर क्यों खास है 40 पड़हा का जुटना? जानिए झारखंड के ऐतिहासिक मुड़मा जतरा की अनकही कहानियां

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ऐतिहासिक मुड़मा जतरा का खूंटा शक्ति स्थल, Pic Credit- Prabhat Khabar

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मुड़मा जतरा: झारखंड का ऐतिहासिक मेला जहां 40 पड़हा का अनोखा संगम होता है. मांदर की गूंज और आदिवासी एकता की कहानी जानें.

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रांची : झारखंड में लगने वाले मेलों की बात हो और रांची के मांडर इलाके में आयोजित होने वाले ऐतिहासिक 'मुड़मा जतरा' का जिक्र न आए, ऐसा हो नहीं सकता है. मांडर में लगने वाला यह मेला केवल खरीदारी, खानपान या मनोरंजन का ठिकाना भर नहीं है, बल्कि इसके पीछे आदिवासी समाज की सदियों पुरानी परंपराएं, समृद्ध लोककथाएं और गहरी सामुदायिक एकता की अनूठी कहानी जुड़ी हुई है. हर साल यहां जुटने वाली भारी भीड़, मांदर की गूंजती थाप, पारंपरिक वेशभूषा और दूर-दराज के गांवों से आने वाले लोगों की मौजूदगी इस आयोजन को बेहद खास बनाती है. मुड़मा जतरा को लेकर स्थानीय समाज में कई पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यताएं प्रचलित हैं. स्थानीय लोकपरंपराओं में इस मेले को 400 साल से भी अधिक पुराना बताया जाता है. इसकी शुरुआत की कहानी मुख्य रूप से उरांव और मुंडा समुदायों के आपसी संबंधों से जोड़कर सुनाई जाती है.

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जमीन और बसावट को लेकर पैदा हो गए थे मतभेद

प्रचलित लोककथा के मुताबिक, एक समय छोटानागपुर क्षेत्र में इन दोनों समुदायों के बीच जमीन और बसावट को लेकर कुछ मतभेद पैदा हो गए थे. उस विवाद को सुलझाने के लिए जो तरीका अपनाया गया, वह अपने आप में अनोखा था. कहानी के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच लगातार सात दिनों और सात रातों तक एक भव्य नाच-गान की प्रतियोगिता हुई, जिसमें मांदर बजाने और पारंपरिक नृत्य को मुख्य आधार बनाया गया. इस मुकाबले में उरांव समुदाय को जीत मिली, जिसके बाद दुश्मनी को आगे बढ़ाने के बजाय दोनों पक्षों ने मेल-मिलाप, सद्भाव और भाईचारे को प्राथमिकता दी. इसी ऐतिहासिक घटना को मुड़मा जतरा की परंपरा का आधार माना जाता है. हालांकि, इसे प्रमाणित करने के लिए ठोस ऐतिहासिक दस्तावेजों की जरूरत है, फिर भी यह कथा आदिवासी समाज में आपसी सहमति और एकता के महत्व को बखूबी दर्शाती है.

40 पड़हा की परंपरा और जतरा खूंटा का विशेष महत्व

इस आयोजन की पहचान में '40 पड़हा' की व्यवस्था का एक विशेष स्थान है. छोटानागपुर के उरांव समाज में पड़हा पारंपरिक सामाजिक संगठन का एक मजबूत स्तंभ रहा है, जिसके माध्यम से कई गांवों के आपसी संबंध और सामुदायिक मामले व्यवस्थित किए जाते हैं. जतरा के अवसर पर विभिन्न गांवों और पड़हा से जुड़े लोगों का पारंपरिक झंडों और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ जुटना इस बात की याद दिलाता है कि यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के लोगों को आपस में जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है. इसके अलावा, मुड़मा जतरा में 'जतरा खूंटा' का होना इसकी सबसे बड़ी विशेषता है. स्थानीय परंपरा में इसे आस्था, पूर्वजों की स्मृति और सामुदायिक पहचान का केंद्र माना जाता है. मेले के दौरान इससे जुड़े पारंपरिक अनुष्ठान पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न किए जाते हैं, जिसमें सामाजिक और धार्मिक अगुवाओं की भूमिका अहम होती है. प्रकृति और पूर्वजों से जुड़े ये प्रतीक आज भी इस मेले की मूल पहचान को सहेजे हुए हैं.

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मांदर की थाप और बदलते स्वरूप के साथ सामाजिक जुड़ाव

मुड़मा जतरा की चर्चा हो और 'मांदर की थाप' का जिक्र न हो, ऐसा होना असंभव है. झारखंड की लोकसंस्कृति में मांदर का इस्तेमाल हर खुशी, त्योहार और सामूहिक नृत्य में होता आया है. मेले के दौरान गूंजते पारंपरिक वाद्य यंत्रों की आवाज और सामूहिक नृत्य का माहौल लोगों को उनकी जड़ों से जोड़ता है. समय के साथ मुड़मा जतरा के स्वरूप में भी बदलाव आया है. अब पारंपरिक पूजा-पाठ और सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ-साथ यहां बड़ी संख्या में दुकानें, खानपान के स्टॉल और घरेलू सामानों की बाजार सजती है, जिससे स्थानीय कारोबारियों और छोटे दुकानदारों को अच्छी कमाई का अवसर मिलता है.

नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का बेहतरीन जरिया

ग्रामीण आंचल में लगने वाले ऐसे मेलों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे बिसरती जा रही परंपराओं को जीवित रखते हैं. दूर-दराज के गांवों से आने वाले लोग अपने परिचितों और रिश्तेदारों से मिलते हैं, जिससे सामाजिक ताना-बाना मजबूत होता है. मुड़मा जतरा की वास्तविक अहमियत इस बात में है कि आधुनिकता के इस दौर में भी लोग अपनी पुरानी जड़ों से मजबूती से जुड़े हुए हैं. यह आयोजन नई पीढ़ी को उनके समाज के इतिहास, लोककथाओं और रीति-रिवाजों से रूबरू कराने का एक खुला मंच देता है. यह इस बात का प्रमाण है कि किसी समाज की पहचान केवल किताबों में दर्ज लिखित इतिहास से नहीं, बल्कि उसकी लोककथाओं, संगीत और पीढ़ियों से चली आ रही जीवंत परंपराओं से तय होती है.

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