सुनिए झारखंड के नायकों को : सबसे अहम मुद्दा रोजगार, पिछले 18 साल में खेल कोटे से 18 खिलाड़ियों को भी नौकरी नहीं मिली

Updated at : 04 Nov 2019 7:23 AM (IST)
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सुनिए झारखंड के नायकों को : सबसे अहम मुद्दा रोजगार, पिछले 18 साल में खेल कोटे से 18 खिलाड़ियों को भी नौकरी नहीं मिली

रांची की रहनेवाले उमा रानी पालित 2008 में सायना नेहवाल के साथ बैडमिंटन खेल चुकी हैं. इसके अलावा सात साल लगातार स्टेट चैंपियन रही है. वहीं वेटरन कैटेगरी में दो बार वर्ल्ड चैंपियनशिप खेल चुकी हैं. जबकि 2015 में राष्ट्रीय स्तर का खिताब भी जीत चुकी हैं. – उमा रानी पालित चुनाव तो हर पांच […]

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रांची की रहनेवाले उमा रानी पालित 2008 में सायना नेहवाल के साथ बैडमिंटन खेल चुकी हैं. इसके अलावा सात साल लगातार स्टेट चैंपियन रही है. वहीं वेटरन कैटेगरी में दो बार वर्ल्ड चैंपियनशिप खेल चुकी हैं. जबकि 2015 में राष्ट्रीय स्तर का खिताब भी जीत चुकी हैं.
– उमा रानी पालित
चुनाव तो हर पांच साल में होता है. लेकिन हम जिस विकास के लिए वोट देते हैं वो कभी पूरा नहीं होता है. मैं एक खिलाड़ी हूं और हमारे जैसे झारखंड के खिलाड़ियों का सबसे बड़ा मुद्दा है नौकरी. राज्य के बने हुए 18 साल हो गये हैं. लेकिन खेल कोटे से 18 खिलाड़ियों को भी नौकरी अभी तक नहीं मिली है. इससे बड़ा र्दुभाग्य और क्या हो सकता है. बिजली, पानी और सड़क ये समस्या कॉमन है लेकिन राज्य के युवा खिलाड़ियों के रोजगार पर अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया है. इसकी जरूरत इस राज्य में है. हम जब किसी दूसरे राज्य में खेलने जाते हैं और वहां के खिलाड़ियों को देखते हैं तो हमें दुख होता है.
दूसरे राज्य जिसमें हरियाणा और पंजाब शामिल हैं वहां के खिलाड़ियों को रोजगार तो मिलता ही है इसके साथ ही कैश अवार्ड और स्कॉलरशिप भी समय से मिल जाता है. लेकिन हमारे राज्य में खिलाड़ी इन्हीं चीजों के लिए तरसते हैं. इससे खिलाड़ियों के उत्साह में कमी आती है. खेलते वक्त भी उनके मन में यही चल रहा होता है कि अगर हमने स्वर्ण पदक भी जीत लिया तो क्या होगा. हमे रोजगार मिलेगा भी या नहीं. इसी सोच के कारण हमारे झारखंड के खिलाड़ी कई खेलों में पिछड़ जाते हैं.
वे जानते हैं कि जीत कर यहां आने पर हमें कुछ नहीं मिलेगा. यही नहीं हमारे लिए कैश अवार्ड की घोषणा हो भी जाती है, लेकिन ये कितने सालों में मिलेगा इसका कोई ठिकाना नहीं है. कई सरकारें आयीं और चली गयीं, लेकिन किसी ने भी हमारे जैसे खिलाड़ियों के लिए नहीं सोचा. हम आज भी इसी आस में बैठे हैं कि कब कोई ऐसी सरकार आयेगी, जो खिलाड़ियों के हित के बारे में सोचेगी.
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