रांची : संताल हूल और सिपाही विद्रोह का जीवंत दस्तावेज

Updated at : 11 Jun 2019 9:11 AM (IST)
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रांची : संताल हूल और सिपाही विद्रोह का जीवंत दस्तावेज

रांची : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में झारखंड क्षेत्र के आदिवासी आैर गैर-आदिवासियाें ने बड़ी भूमिका अदा की है. अनेक पुस्तकाें में इनसे जुड़ी घटनाआें का जिक्र है, लेकिन जिस गहराई से फ्रॉम रीजन टू नेशन, द ट्राइबल रिवाेल्ट्स इन झारखंड 1855-58 में घटनाआें का उल्लेख किया गया है, उतनी गहराई से जानकारी अन्य पुस्तकाें में […]

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रांची : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में झारखंड क्षेत्र के आदिवासी आैर गैर-आदिवासियाें ने बड़ी भूमिका अदा की है. अनेक पुस्तकाें में इनसे जुड़ी घटनाआें का जिक्र है, लेकिन जिस गहराई से फ्रॉम रीजन टू नेशन, द ट्राइबल रिवाेल्ट्स इन झारखंड 1855-58 में घटनाआें का उल्लेख किया गया है, उतनी गहराई से जानकारी अन्य पुस्तकाें में उपलब्ध नहीं है.
इस पुस्तक काे रांची विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्राे इंद्र कुमार चाैधरी ने लिखा है. प्राे चाैधरी राष्ट्रीय स्तर के इतिहासकार हैं, जिनकी अनेक पुस्तकें आैर शाेध पत्र देश-दुनिया में प्रकाशित हाे चुके हैं. इस पुस्तक काे दिशा इंटरनेशनल पब्लिसिंग हाउस, ग्रेटर नाेयडा ने प्रकाशित किया है.
पुस्तक में झारखंड क्षेत्र में 1855 आैर 58 के बीच यानी तीन साल की अवधि में आदिवासी विद्राेह के साथ-साथ सिपाही विद्राेह से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख है.
कहानी शुरू हाेती है संताल हूल से. 1955 में भाेगनाडीह से कैसे सिदाे-कान्हू की अगुवाई में अंगरेजाें के खिलाफ विद्राेह हुआ, उसका विस्तार से विवरण है. इसकी खासियत है कि इसमें विद्राेह के वैसे नायकाें के नामाें का भी उल्लेख है, जिन्हें इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला. कई लाेगाें के नाम ताे पहली बार सार्वजनिक हुए हैं. प्राे चाैधरी ने ऐसे नायकाें का उल्लेख कर उन्हें उचित सम्मान दिया है. पुस्तक में नाै अध्याय हैं. इनमें संताल हूल के साथ-साथ 1857 में रांची में हुए विद्राेह, पलामू में नीलांबर-पीतांबर की अगुवाई में हुए विद्राेह के साथ-साथ सिंहभूम के विद्राेह (1857) की विस्तृत जानकारी है.
आठवें अध्याय में यह बताने का प्रयास किया गया है कि कैसे 1857 में छाेटानागपुर में हुए विद्राेह का संबंध वीर कुंवर सिंह से था. कैसे छाेटानागपुर के विद्राेही अंगरेज सैनिकाें से लड़ते हुए कुंवर सिंह की सेना से मिलना चाहते थे, ताकि वे साथ हाेकर दिल्ली की आेर कूच कर सकें.
यह पुस्तक संताल हूल आैर छाेटानागपुर में सिपाही विद्राेह के समर्थन में हुए आंदाेलन का दस्तावेज है. इसमें यह बताने का प्रयास किया गया है कि कैसे स्थानीय स्तर पर हुए इन विद्राेहाें का राष्ट्रीय महत्व भी है.
1857 में विद्राेहियाें ने बहादुर शाह जफर काे अपना राष्ट्रीय नेता मान लिया था आैर उनका उद्देश्य बहादुर शह काे दिल्ली की सत्ता पर बैठाना था. इसके लिए देश के कई इलाकाें में विद्राेह हुए थे. झारखंड क्षेत्र भी इसमें एक प्रमुख था. इस पुस्तक में इस बात का भी दस्तावेजाें के माध्यम से उल्लेख है कि कैसे 1857 के विद्राेह की जमीन दाे साल पहले यानी 1855 में संताल हूल ने तैयार कर दी थी. यह संताल हूल के राष्ट्रीय महत्व काे बताता है.
दरअसल इस पुस्तक के माध्यम से लेखक प्राे चाैधरी ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि झारखंड में हुए विद्राेह (इनकी संख्या कई थी) का साेच-आधार बड़ा व्यापक था आैर इसका बड़ा लाभ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम काे मिला. संताल हूल आैर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाआें के याेगदान के बारे में भी पुस्तक में उल्लेख किया गया है. गुमनाम नायकाें का भी जिक्र है. जिससे विशेष जानकारी मिलती है. यह स्वतंत्रता सेनानियाें के साथ बड़ा न्याय है.
पुस्तक का नाम : फ्रॉम रीजन टू नेशन, द ट्राइबल रिवाेल्ट्स इन झारखंड 1855-58
लेखक : प्राे इंद्र कुमार चाैधरी
प्रकाशक : दिशा इंटरनेशनल पब्लिशिंग हाउस
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