स्वास्थ्य सुविधा के लिए दर-दर भटक रहा विस्थापित परिवार

Updated at : 30 Oct 2017 12:44 AM (IST)
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स्वास्थ्य सुविधा के लिए दर-दर भटक रहा विस्थापित परिवार

अमड़ापाड़ा : नक्सल प्रभावित जंगल के गांवों में विस्थापन के दर्द की कौन सुनेगा. मानव अधिकार का यहां खुल्लम खुल्ला उलंघन हो रहा है. अपनी खेत, जमीन, निवास स्थान से विस्थापित आदिवासी मूलभूत सुविधा से भी दूर कर दिये गये हैं. यह हाल है अमड़ापाड़ा में पैनम विस्थापितों का. कोयले के कारोबार ने जहां कई […]

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अमड़ापाड़ा : नक्सल प्रभावित जंगल के गांवों में विस्थापन के दर्द की कौन सुनेगा. मानव अधिकार का यहां खुल्लम खुल्ला उलंघन हो रहा है. अपनी खेत, जमीन, निवास स्थान से विस्थापित आदिवासी मूलभूत सुविधा से भी दूर कर दिये गये हैं.
यह हाल है अमड़ापाड़ा में पैनम विस्थापितों का. कोयले के कारोबार ने जहां कई की तकदीरें, किस्मत बदल दी. वहीं मूल मालिकाना हक रखनेवाले विस्थापित अपनी नसीब पर रो रहे हैं. इनकी सुधि लेने वाला कोई नहीं है. बीते जुलाई 2015 से विस्थापितों को कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी (सीएसआर) के तहत स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर चलनेवाला बरमसिया गांव स्थित अस्पताल बंद पड़ा है.
वर्तमान में व्यवस्था के नाम पर दो सिक्यूरिटी गार्ड सुबह और रात के वक्त तैनात रहते हैं. जानकारों की मानें तो सुप्रीम कोर्ट ने सभी कोल ब्लॉक रद्द करने के साथ यह निर्णय दिया था कि विस्थापन के कारण प्रभावित परिवारों को मिलनेवाली स्वास्थ्य, शिक्षा सहित अन्य सुविधा किसी भी परिस्थिति में बंद नहीं होनी चाहिए. ऐसे में विस्थापितों के लिए स्वास्थ्य सुविधा का बंद होना काफी दुर्भाग्यपूर्ण है.
विस्थापितों के लिए सीएसआर एक्टिविटी के नाम पर अस्पताल बहुत विलंब से खुला और बहुत जल्द बंद हो गया. याद हो कि 2013 में एमटा द्वारा अस्पताल खोला गया. जबकि कोल उत्खनन जनवरी 2006 से ही शुरू हुआ था. जबकि कोयले की ढुलाई सात वर्ष पूर्व से चालू हो चुकी थी. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोल ब्लॉक आवंटन रद्द करने व वर्ष 2016 में केंद्र सरकार ने प्राथमिकता के आधार पर सेंट्रल ब्लॉक को पुनः पीएसपीसीएल को आवंटित किया है.
कोल परियोजना के बाबत एमडीओ मामला कोर्ट में लंबित होने के कारण सीएसआर एक्टिविटी बन्द है. जिससे कि सेंट्रल ब्लॉक से विस्थापित प्रभावित परिवारों की हालत खराब है.
अस्पताल कभी रहता था गुलजार, आज बन गया भूत बंगला
कई गांवों को मिल रहा फायदा
अस्पताल से आमझारी, विशनपुर, न्यू कठालडीह, तालझारी, सिंहदेहरी, दुधाजोर, आलुबेड़ा, विशनपुर, जराकी, पचुवाड़ा, बंधकोईखुर्द, पहाड़पुर, टमकी, छोला पाथर, बाभन मारा, लिट्टीपाड़ा, सियाल पहाड़ी, खंडो काटा, बड़ा बांधकोई, बरमसिया, डांगापाड़ा, अमड़ापाड़ा समेत दो दर्जन से अधिक राइबल गांवों के लोगों को स्वास्थ्य सुविधा मिलती थी.
कई सामान चोरी, कुछ फांक रहे धूल
10 बेड वाले अस्पताल में ओटी, एक्सरे, इमरजेंसी सुविधा सहित एंबुलेंस सुविधा उपलब्ध थी. एक्सरे एलसीडी मॉनिटर, सीपीयू, बेड की चोरी हो चुकी है. मेडिकल रूम में दर्जनों किस्म की दवाइयां सड़ रही है. दरवाजे व खिड़की के शीशे टूट चुके हैं. डीजी खराब हो चुका है. ओटी रूम की हाल खस्ता है. पानी व बिजली व्यवस्था खत्म हो चुकी है. उपलब्ध न होने के कारण हॉस्पिटल बंद हो गयी.
कहते हैं पदाधिकारी
पैनम के अधिकारी गौतम सामंतो ने कहा कि अस्पताल क्षेत्र के लिये संजीवनी के रूप में काम कर रहा था. लोगों का विश्वास कंपनी पर बढ़ा था. हमें न्यायालय पर भरोसा है. जल्द ही क्षेत्र में रौनक लौटेगी.
क्या कहते हैं लोग
अभी इलाज कराने सरकारी अस्पताल, निजी डॉक्टर के पास जाते हैं. यहां अस्पताल रहने से काफी सुविधा होती थी. अधिकारी उदासीन बने हुए हैं.
यहां अस्पताल चालू था तो रात में भी हमलोग इलाज कराने जाते थे. अब तो इमरजेंसी में बहुत दिक्कत होती है. अस्पताल चालू होगा तो यहां के लोगों को इसका लाभ मिलेगा.
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