खुशखबरी : नक्सलियों के गढ़ में ए, बी, सी की गूंज

Published at :09 Dec 2015 8:09 AM (IST)
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खुशखबरी : नक्सलियों के गढ़ में ए, बी, सी की गूंज

बरडीह में शिक्षा का अलख जगा रहा चिल्ड्रेन पब्लिक स्कूल बरडीह से लौट कर दुर्जय पासवान ए से एप्पल, बी से ब्वॉय, सी से कैट…अंगरेजी के इन शब्दों की आवाज नक्सलियों के गढ़ बरडीह गांव में गूंज रही है. बरडीह, चैनपुर प्रखंड से 30 किमी दूर है. यहां बेकार व अधूरे पड़े सामुदायिक भवन में […]

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बरडीह में शिक्षा का अलख जगा रहा चिल्ड्रेन पब्लिक स्कूल
बरडीह से लौट कर दुर्जय पासवान
ए से एप्पल, बी से ब्वॉय, सी से कैट…अंगरेजी के इन शब्दों की आवाज नक्सलियों के गढ़ बरडीह गांव में गूंज रही है. बरडीह, चैनपुर प्रखंड से 30 किमी दूर है. यहां बेकार व अधूरे पड़े सामुदायिक भवन में चिल्ड्रेन पब्लिक स्कूल संचालित हो रहा है. इसे गुमला व बारडीह गांव के कुछ पढ़े-लिखे बेरोजगार युवक चला रहे हैं. स्कूल के सामने से हर 10 से 12 दिन में नक्सली गुजरते हैं. उस समय बच्चे पढ़ते रहते हैं. बच्चों की माने तो नक्सली स्कूल के समीप रूकते हैं. इसके बाद हंसते हुए चले जाते हैं. कल तक जो बच्चे ठीक ढंग से हिंदी नहीं बोल पाते थे, अब गांव के कई बच्चे अंगरेजी में बात करते हैं.
एसपी व एएसपी ने प्रशंसा की
कुछ दिन पूर्व नक्सलियों की खोज में निकली पुलिस सिविल गांव जाने के क्रम में बरडीह गांव रुकी थी. हल्की बारिश हो रही थी. एसपी भीमसेन टुटी, एएसपी पवन कुमार सिंह, सीआरपीएफ के कमांडेंट वीपी सिंह, सहायक कमांडेंट पीआर झा थे. उस समय पुलिस अधिकारियों ने नक्सली क्षेत्र में इस प्रकार के स्कूल संचालन पर प्रशंसा किये थे. स्कूल संचालन समिति से बात भी की थी.
बच्चों को बेकार घूमता देख स्कूल खोला
पहले गांव के बच्चे बेकार घूमते रहते थे. किसी को पढ़ाई से मतलब नहीं था. गुमला के सुरेश मिंज की नानी का घर बरडीह गांव में है. 2010 में अर्थशास्त्र में स्नातक किया है. सुरेश ने बताया : गांव में बेकार घूमते बच्चे को देखकर बड़ा दुख हुआ. मैंने सोचा नौकरी करने से अच्छा है. गांव में ही स्कूल खोल कर बच्चों को शिक्षा दें. नक्सलियों का डर था. लेकिन सोचा शुरूआत करने में क्या जाता है. अभिभावकों से गांव में बैठक की. शुरू में आठ बच्चों का नामांकन हुआ. फिर धीरे-धीरे 70 बच्चे हो गये.
ग्रामीणों के सहयोग से चल रहा स्कूल
स्कूल में सुरेश मिंज के साथ गुमला के गुंजन पन्ना, बरडीह गांव के अबस्तुक एक्का, रीना लकड़ा व पुनई उरांव बच्चों को पढ़ाते हैं. सभी बेरोजगार हैं. स्कूल के खर्च व पॉकेट खर्च की जरूरत को देखते हुए प्रत्येक छात्र के अभिभावक सहयोग करते हैं. अभिभावक अपने से एक छात्र के लिए महीने में डेढ़ सौ रुपये फीस देते हैं. शिक्षकों के अनुसार यह स्कूल ग्रामीणों के सहयोग से चल रहा है.
न सड़क है न स्वास्थ्य सुविधा
बरडीह गांव में लगभग 100 परिवार हैं. लेकिन यहां सरकारी सुविधा न के बराबर है. न चलने लायक सड़क है और न स्वास्थ्य सुविधा. सोलर प्लेट लगा है, पर बेकार है. चारों ओर घने जंगल व पहाड़ है. नक्सलियों का डेरा रहता है. समरदन तिर्की व इसाइया तिग्गा ने कहा : सड़क बन जाये और स्वास्थ्य सुविधा हो, तो यह गांव खुशहाल होगा. पीने का स्वच्छ पानी की भी जरूरत है.
सरकारी स्कूल है, पर सुविधा नहीं
गांव में एक सरकारी स्कूल है. एक से छह तक की पढ़ाई होती है. पर यहां संसाधन का अभाव है. पढ़ाई भी ठीक ढंग से नहीं होती. इस कारण बच्चे स्कूल जाना नहीं चाहते.
आठ से अब 70 बच्चे हो गये
स्कूल वर्ष 2003 में खुला है. शुरू में स्कूल में आठ बजे थे. लेकिन जैसे-जैसे लोगों में शिक्षा के प्रति रूझान आया. सभी ने अपने बच्चों को स्कूल में दाखिला कर दिया. आज इस स्कूल में 70 बच्चे हैं. यहां नर्सरी से लेकर वर्ग चार तक पढ़ाई होती है.
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