IN PICS : श्रावण माह शुरू, शिव नगरी गुमला में आज से बम बम भोले

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date

दुर्जय पासवान

गुमला : झारखंड राज्य के गुमला जिला में चारों ओर शिव मंदिर व शिवलिंग स्थापित हैं. इसलिए गुमला को शिव नगरी भी कहते हैं. यहां कई धरोहर हैं, जहां भगवान शिव का वास है. हर प्रखंड व पंचायत में शिवलिंग या शिव मंदिर तो है ही, कई प्राचीन मंदिर भी हैं. कहते हैं कि रामायण और महाभारत तक से इन मंदिरों का नाता है. जिला में सातवीं व आठवीं शताब्दी के भी मंदिर व शिवलिंग हैं.

IN PICS : श्रावण माह शुरू, शिव नगरी गुमला में आज से बम बम भोले

गुमला के अधिकांश लोग, जो जंगलों में और पहाड़ों पर रहते हैं, खुद को शिव का सबसे बड़ा भक्त मानते हैं. यही वजह है कि श्रावण माह में यहां शिव की पूजा पूरे उत्साह के साथ होती है. पूरे एक माह तक शिवालयों में और शिव लिंगों पर जलाभिषेक के लिए भक्तों की भीड़ लगी रहती है.

IN PICS : श्रावण माह शुरू, शिव नगरी गुमला में आज से बम बम भोले

गुमला के प्रमुख शिवमंदिरों व शिव लिंगों में टांगीनाथ धाम, देवाकीधाम, बुढ़वा महादेव मंदिर करमटोली, वासुदेव कोना, देवगांव समेत कई मंदिर हैं. आइए, हम आपको एक-एक कर उन मंदिरों के दर्शन कराते हैं...

IN PICS : श्रावण माह शुरू, शिव नगरी गुमला में आज से बम बम भोले

मां देवकी के नाम पर पड़ा देवाकीधाम का नाम

घाघरा प्रखंड से तीन किमी दूर केराझरिया नदी के तट पर देवाकी बाबाधाम मंदिर है. यह धार्मिक स्थल के रूप में विख्यात है. यहां अति प्राचीन शिव मंदिर है. श्रावण माह में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. कई जिला से श्रद्धालु आते हैं. घाघरा-नेतरहाट के मुख्य पथ के ठीक किनारे स्थित इस मंदिर में आसानी से पहुंचा जा सकता है. सुबह छह बजे से शाम छह बजे तक वाहनों का परिचालन होता है.

यहां गुमला, सिमडेगा, लोहरदगा, पलामू, लातेहार, रांची व खूंटी सहित छत्तीसगढ़ राज्य से भी भक्त आते हैं. जनश्रुति के अनुसार महाभारत काल में पांडव के अज्ञातवास के समय भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पांच शिवलिंग की स्थापना की गयी थी. इसमें से एक शिवलिंग देवाकीधाम में है. इसलिए इस स्थल का नाम श्रीकृष्ण की मां देवकी के नाम पर देवाकीधाम पड़ा. पांडवों का अज्ञातवास खत्म होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने देवाकीधाम में ही शंख बजाया था.

पालकोट के देवगांव में बसते हैं स्वयं भगवान शिव

पालकोट प्रखंड का प्राचीन नाम पंपापुर है. यह धार्मिक स्थलों से पटा हुआ है. पालकोट पौराणिक, धार्मिक व ऐतिहासिक धरोहरों का जीता-जागता उदाहरण प्राचीन ऋष्यमुख पर्वत है. यहां कई प्राचीन धरोहर और रामायण युग के अवशेष हैं. गुमला-सिमडेगा मार्ग पर स्थित यह क्षेत्र बिहार, ओड़िशा, छत्तीसगढ़, बंगाल व झारखंड राज्य का प्रमुख ऐतिहासिक स्थल है. पालकोट में सावन माह में भक्तों की भीड़ उमड़ती है.

ओड़िशा से भी भारी संख्या में भक्त यहां आते हैं. देवगांव में भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है. इसके अलावा मां दसभुजी महारानी मंदिर, मां पंपा भवानी पर्वत शिखर, बाबा बूढ़ा महादेव मंदिर, बाघलता भवानी, बनजारिन देवी, बेंगपाट, शीतलपुर, मलमलपुर, पवित्र निर्झर, घोड़लत्ता, हनुमान मंडा, केवड़ा लत्ता, गोपाल साईं मंडा, नवरत्न मंडा, गोबरसिल्ली, राकस टंगरा, मड़वालत्ता, मुनीडेरा, राकस टुकू, पंपा सरोवर, सुग्रीव टुकू, शबरी गुफा, लालगढ़, शेष नाग, योगी टोंगरी, मंतगमुनी का शंख, तरंगन गढ़ा, दलदली पोखर, त्रिवेणी देवराहा बाबा, कौरव पांडव पहाड़, देवगांव हैं.

अद्भुत प्राकृतिक छटा है टांगीनाथ में

डुमरी प्रखंड के टांगीनाथ धाम में कई राज्यों से शिवभक्त जलाभिषेक करने पहुंचते हैं. यहां कई पुरातात्विक व ऐतिहासिक धरोहर आज भी मौजूद हैं. यहां की कलाकृतियां व नक्कासी, देवकाल की कहानी बयां करती है. कई ऐसे स्रोत भी हैं, जो हमें 7वीं व 9वीं शताब्दी में ले जाता है. यह धार्मिक स्थल के रूप में भी विख्यात है. गुमला से 70 किमी दूर डुमरी प्रखंड के टांगीनाथ धाम में साक्षात भगवान शिव निवास करते हैं. भक्तों को यहां धर्म-कर्म के अलावा सुंदर व मनमोहक प्राकृतिक दृश्य भी देखने को मिलता है.

टांगीनाथ धाम में सैकड़ों शिवलिंग हैं. यह मंदिर शाश्वत है. कहते हैं कि स्वयं विश्वकर्मा ने टांगीनाथ धाम की रचना की थी. वर्ष 1989 में खुदाई में जमीन से आभूषण मिले थे. भगवान शिव का त्रिशूल जमीन के नीचे कितना गड़ा है, कोई नहीं जानता. जमीन के ऊपर स्थित त्रिशूल के अग्र भाग में कभी जंग नहीं लगता. यहां कई प्राचीन धरोहर भी हैं, जिसे लोग देख सकते हैं.

नागफेनी गांव में भी भगवान

सिसई प्रखंड का नागफेनी गांव जिला मुख्यालय से 16 किलोमीटर दूर है. यह अपने अंदर कई ऐतिहासिक व धार्मिक धरोहर समेटे हुए है. यह जिला के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से एक है. नागवंशी राजाओं के गढ़ रहे इस गांव में भवनों के अवशेष आज भी मौजूद हैं. यहां जगन्नाथ मंदिर, शिवलिंग पर लिपटे अष्टधातु से बने नाग, अष्टकमल दल, पाटराजा व नागसंत्थ देखने योग्य हैं. नदी के किनारे शिवलिंग होने के कारण आसपास के गांव के लोग नदी में स्नान करके ही यहां जलाभिषेक करते हैं.

बाघमुंडा में है भगवान शिव की मंदिर

गुमला से 50 किमी दूर बसिया प्रखंड में है बाघमुंडा. यहां जो एक बार आता है, उसका मन बार-बार आने को करता है. तीन दिशाओं से निकलने वाली नदी की धारा देखने का आनंद ही कुछ और होता है. हालांकि, यह नजारा सिर्फ बरसात के दिनों में ही देखा जा सकता है. पहाड़ के ऊपर से नदी को देखने से दिल को अलग तरह का सुकून मिलता है. यहां स्थित शिव मंदिर में श्रद्धालु श्रावण के पूरे एक महीने तक जल चढ़ाने आते हैं.

आंजनधाम में भी है शिवलिंग और मंदिर

गुमला प्रखंड से 20 किमी दूर है आंजनधाम. यहीं भगवान हनुमान का जन्म हुआ था. अंजनी मां का निवास स्थान था. पहाड़ की चोटी पर भगवान हनुमान का मंदिर है. इसे देश का पहला मंदिर माना जाता है, जहां बजरगंबली हनुमान अपनी माता अंजनी की गोद में बैठे हैं. हनुमान की जन्मस्थली आंजनधाम में जगह-जगह भगवान शिव के मंदिर व शिवलिंग भी हैं. सावन भर यहां भक्तों का आना-जाना लगा रहता है.

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