नव वर्ष पर आयें सुखलदरी जलप्रपात
Updated at : 27 Dec 2017 8:57 AM (IST)
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धुरकी : धुरकी प्रखंड मुख्यालय से नौ किमी और गढ़वा जिला मुख्यालय से 50 किमी पर स्थित झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा पर अवस्थित सुखलदरी जलप्रपात सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र है. यों तो इस मनोरम स्थल पर आनंद लेने के लिए सालोंभर सैलानी आते रहते हैं, लेकिन दिसंबर महीने और नये साल के […]
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धुरकी : धुरकी प्रखंड मुख्यालय से नौ किमी और गढ़वा जिला मुख्यालय से 50 किमी पर स्थित झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा पर अवस्थित सुखलदरी जलप्रपात सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र है.
यों तो इस मनोरम स्थल पर आनंद लेने के लिए सालोंभर सैलानी आते रहते हैं, लेकिन दिसंबर महीने और नये साल के अवसर पर यहां पिकनिक मनानेवालों की ज्यादा भीड़ होती है. पहले की तुलना में इधर आवागमन सुगम हो जाने से तथा नक्सली सक्रियता समाप्त हो जाने से यहां घुमनेवालों की भीड़ बढ़ गयी है. झारखंड और छत्तीसगढ़ को विभाजित करनेवाले कनहर नदी यहां पर चारों तरफ से हरे-भरे पेड़-पौधे के बीच करीब 100 फीट ऊपर से जब नीचे गिरती है, तो यहां का दृश्य देखते ही बनता है.
सुखलदरी जल प्रपात के पास आसपास काफी क्षेत्र में फैले पत्थर और नदी के एक ओर रेत सैलानियों को पिकनिक मनाने के लिए काफी उपयुक्त लगता है. नदी के किनारे पत्थर और बालू के रेत की खूबसूरती देखते ही बनती है. सुखलदरी जलप्रपात की सबसे बड़ी खासियत है कि करीब 100 फीट ऊपर से झरना की पानी जब नीचे गिरता है, तो दूध की तरह सफेद फव्वारा बनकर उपर उठता है. इस फव्वारे पर जब सूर्य की किरणें पड़ती हैं, तो देखते ही बनता है.
कनहर नदी का पानी इस जलप्रपात के पास कितना गहरा है, अभीतक नापा नहीं जा सका है. पुराने लोग कहते हैं कि इस दह में सात खटिया के बाधी भी पानी नापने में कम पड़ गया था. इसके कारण इसे सतखोटलिया दह भी कहते हैं. इस जलप्रपात को कर्पूरी ठाकुर पर्यटनस्थल के नाम से भी जाना जाता है. यद्यपि पर्यटनस्थल के नाम पर कुछ भी विकास नहीं हुआ है. इसे यदि पर्यटन के दृष्टिकोण से विकसित कर दिया जाय, तो इसका आकर्षण और बढ़ जायेगा. साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल सकेगा.
पर्यटनस्थल के पास गांववाले के सहयोग से पहाड़ पर शंकरजी का मंदिर बना है, जहां पहुंचने के लिए सरकार की ओर से सीढ़ी का निर्माण कराया गया है. साथ ही उपर में कर्पूरी गेट बना है.
वहीं नीचे उतरने के लिए भी सीढ़ी का निर्माण वर्ष 1998 में कराया गया है. साथ ही एक आइबी का भी निर्माण कराया गया था, लेकिन यह देखरेख के अभाव में इस समय खंडहर में तब्दील होकर रह गया है. इस आइबी के सारे सामानों की भी चोरी हो चुकी है. यहां आज के दिन में आसानी से पहुंचा जा सकता है. नगरउंटारी से धुरकी आने पर चार किमी तक मोरम पथ है, जहां अपनी सुरक्षित गाड़ी से पर्यटक आ सकते हैं.
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