टुंडी के मनियाडीह से दिल्ली तक जुड़ा रहा रिश्ता, रूपी सोरेन को चाची कहते थे पूर्व सांसद संजीव कुमार
रूपी सोरेन के साथ पूर्व सांसद संजीव कुमार
रूपी सोरेन और पूर्व सांसद संजीव कुमार का रिश्ता चाची-भतीजे जैसा था. शिबू सोरेन के संरक्षण में संजीव दिल्ली में पढ़े और सुप्रीम कोर्ट के वकील बने.
धनबाद. टुंडी के मनियाडीह गांव से निकला एक रिश्ता सत्ता और राजनीति की सीमाओं से कहीं आगे था. पूर्व राज्यसभा सांसद संजीव कुमार और रूपी सोरेन के बीच यही रिश्ता उनकी आखिरी मुलाकात तक बना रहा. संजीव कुमार, रूपी सोरेन को चाची कहते थे और सोरेन परिवार में उनके साथ बड़े बेटे जैसा व्यवहार होता था.
आंदोलन में जो घर उजाड़ा, उसे संवार भी दिया गुरुजी ने
इस रिश्ते की जड़ें महाजनी आंदोलन के दौर तक जाती हैं. आंदोलन के दौरान मनियाडीह के रघु दा के परिवार को काफी नुकसान हुआ था. उनके खेत-खलिहान तक उजड़ गये थे. बाद में रघु दा और गुरुजी यानी शिबू सोरेन के बीच नजदीकी बढ़ी, तो जिस परिवार को आंदोलन के दौर में नुकसान पहुंचा था, उसके जीवन को संवारने की कोशिश भी हुई.

रघु दा के बड़े बेटे मुरलीधर दा बाद में गुरुजी के साथ आंदोलन में शामिल हो गये. उनके पुत्र वरीय अधिवक्ता विदेश कुमार बार एसोसिएशन के पूर्व महामंत्री रह चुके हैं.
संजीव को दिल्ली ले गये अपने साथ
इसी परिवार से जुड़े संजीव कुमार को शिबू सोरेन अपने साथ दिल्ली ले गये. उनके संरक्षण में रहकर संजीव ने पढ़ाई की. आगे चलकर वह सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता बने और शिबू सोरेन के मुकदमों की पैरवी भी की. बाद में संजीव कुमार राज्यसभा सांसद बने. मनियाडीह जैसे गांव के एक साधारण परिवार से निकलकर उनका संसद तक पहुंचना टुंडी के लिए भी एक यादगार प्रसंग रहा.
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दिल्ली में रहने के दौरान रूपी से बना आत्मीय रिश्ता
दिल्ली में सोरेन परिवार के साथ लंबे समय तक रहने के कारण संजीव कुमार का रूपी सोरेन से आत्मीय रिश्ता बन गया था. राजनीति के बदलते दौर में दोनों परिवारों के बीच दूरी जरूर आयी, लेकिन पुराने रिश्ते की गर्माहट पूरी तरह खत्म नहीं हुई.
गुरु जी के बाद रूपी सोरेन का गुजरने से गहरा आघात
पूर्व सांसद संजीव कुमार ने बताया कि करीब पांच-छह माह पहले रांची आने पर उनकी रूपी सोरेन से मुलाकात हुई थी. उस मुलाकात की स्मृति अब उनके लिए बेहद खास है. अपने संरक्षक गुरुजी के बाद रूपी सोरेन का गुजर जाना, उन्हें गहरे तक आहत किया.
उनके लिए यह केवल एक राजनीतिक परिवार की सदस्य के निधन की खबर नहीं, बल्कि उस रिश्ते के टूटने का दुख है, जिसे उन्होंने परिवार के बड़े बेटे और चाची के रिश्ते की तरह जिया था.
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