Labour Day 2021 : कोयला उद्योग के ठेका मजदूरों की नहीं बदली किस्मत, न स्थायी मजदूरों के समान वेतन मिल रहा, न ही सामाजिक सुरक्षा

Updated at : 01 May 2021 8:58 AM (IST)
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Labour Day 2021  : कोयला उद्योग के ठेका मजदूरों की नहीं बदली किस्मत, न स्थायी मजदूरों के समान वेतन मिल रहा, न ही सामाजिक सुरक्षा

साल 2003-04 से कोयला उद्योग यानी कोल इंडिया में आउटसोर्स के नाम पर ठेका मजदूरों से कोयला उत्पादन का खेल शुरू हुआ. इसके लिए लेबर एक्ट में ढील दी गयी. तब कहा गया था कि ठेका मजदूरों को स्थायी मजदूरों के समान सुविधाएं एवं उनके वेतन के समान वेतन दिया जायेगा.

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labour day 2021 in hindi, Coal Industry Contract Workers Salary धनबाद : कोयला खानों के राष्ट्रीयकरण के 50 साल बाद भी कोयला मजदूर वहीं खड़े हैं, जहां राष्ट्रीयकरण के समय थे. आज कुल उत्पादित कोयले में आधे से अधिक का उत्पादन ठेका मजदूर कर रहे हैं, जिन्हें न स्थायी मजदूरों के समान वेतन मिल रहा है न ही सामाजिक सुरक्षा. स्थायी मजदूरों की संख्या लगातार घटती जा रही है तो ठेका मजदूरों की बढ़ती जा रही है. एक समय जहां कोल इंडिया के कर्मियों की संख्या 660039 थी, वहीं आज घट कर लगभग 2.50 लाख रह गयी है.

साल 2003-04 से कोयला उद्योग यानी कोल इंडिया में आउटसोर्स के नाम पर ठेका मजदूरों से कोयला उत्पादन का खेल शुरू हुआ. इसके लिए लेबर एक्ट में ढील दी गयी. तब कहा गया था कि ठेका मजदूरों को स्थायी मजदूरों के समान सुविधाएं एवं उनके वेतन के समान वेतन दिया जायेगा.

श्रमिक संगठन की भूमिका :

ठेका मजदूरों के मामले में यूनियनों की भूमिका पर भी बड़े सवाल खड़े होते हैं. एक जानकर कहते हैं कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण में यूनियनों के संघर्ष की महत्वपूर्ण भूमिका थी. आज राष्ट्रीयकरण से निजीकरण की ओर ले जाने में भी उनकी प्रमुख भूमिका नजर आ रही है. सिर्फ दिखावे के लिए वे ठेका मजदूरों के पक्ष में बोलते हैं.

अगर ऐसा नहीं है तो आजतक हाई पावर कमेटी की अनुशंसा क्यों नहीं लागू हो पायी ? धनबाद कोलियरी कर्मचारी संघ (बीएमएस) के सह संगठन मंत्री संजीव कुमार श्रीवास्तव कहते हैं कि सरकार कोयला खदानों का व्यवसायिक खनन के नाम पर निजीकरण कर रही है. इसके खिलाफ व्यापक एकता के साथ जो विरोध होना चाहिए था, नहीं हुआ. इस कारण सरकार कोल ब्लॉक्स की नीलामी में सफल रही. वे कहते हैं आने वाले दिनों में कोयला मजदूरों के हालात निजी खदान मालिकों के समय से भी बदतर होने वाले हैं.

जानकारों की मानें तो सरकार ने ट्रेड यूनियनों को एक तरह से हाशिये पर डाल दिया है. 44 श्रम कानूनों को 4 कोड बिल संसद के दोनों से पारित हो गए हैं. गजट प्रकाशित हो गए हैं. इसी अप्रैल से लागू होना था. कोरोना के कारण टल गया. ये लागू हो जाने के बाद यूनियन सिर्फ नाम की बचेगी. इन कोड के तहत श्रमिकों को आंदोलन, हड़ताल करने के अधिकारों की कटौती कर दी गयी है. श्रीवास्तव कहते हैं आने वाले दिनों में श्रमिक वहीं पहुंच जाएंगे, जहां से चले थे.

दिखावे के लिए आउटसोर्स के खिलाफ आंदोलन

आउटसोर्स के खिलाफ तब मजदूर संगठनों ने दिखावे के लिए आंदोलन भी किया था. फिर बाद में यूनियनों के रहनुमाओं ने आउटसोर्स की अनुमति दे दी. शुरू में आउटसोर्स के मजदूरों को न्यूनतम वेतन भी नसीब नहीं होता था और काम 12 घंटे. तब यूनियनों की मांग पर एक हाई पावर कमेटी गठित हुई. इस कमेटी में प्रबंधन और यूनियन प्रतिनिधि शामिल हैं.

साल 2012 में इस कमेटी ने ठेका मजदूरों को चार वर्गों में बाटते हुए वेतन निर्धारित किया. पर ये जमीन पर लागू नहीं हुए. फिर इस कमेटी ने 2018 में वेतन निर्धारित किए. इस कमेटी ने ठेका मजदूरों के सीएमपीएफ, मेडिकल सुविधा आदि की अनुशंसा की. कोल इंडिया ने आदेश भी जारी किए. लेकिन ये अनुशंसा, अनुशंसा ही रहकर रह गयी. आज भी वही 12 घंटे काम और नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं. हर साल ठेका मजदूरों को 8.33 प्रतिशत सलाना बोनस का घोषणा होती है, लेकिन मिलती नहीं.

Posted By : Sameer Oraon

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