लहरविहीन चुनाव में ‘सिंह’ बनेंगे किंग या लहरेगा ‘कीर्ति’ पताका

Updated at : 11 May 2019 2:23 AM (IST)
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लहरविहीन चुनाव में ‘सिंह’ बनेंगे किंग या लहरेगा ‘कीर्ति’ पताका

धनबाद : छठे चरण चुनाव में धनबाद लोकसभा क्षेत्र में रविवार को वोट डाले जायेंगे. मतदान में महज दो दिन शेष रह गये हैं. शुक्रवार को प्रचार का अंतिम दिन था. मतदाताओं पर जादू चलाने के लिए सभी राजनीतिक दलों ने आखिरी दिन अपना पूरा जोर दिखाया. अपने प्रत्याशियों के पक्ष में बड़े नेताओं ने […]

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धनबाद : छठे चरण चुनाव में धनबाद लोकसभा क्षेत्र में रविवार को वोट डाले जायेंगे. मतदान में महज दो दिन शेष रह गये हैं. शुक्रवार को प्रचार का अंतिम दिन था. मतदाताओं पर जादू चलाने के लिए सभी राजनीतिक दलों ने आखिरी दिन अपना पूरा जोर दिखाया. अपने प्रत्याशियों के पक्ष में बड़े नेताओं ने जनसभाएं और रैलियां कीं.

वैसे चुनाव आयोग की सख्ती के चलते अबकी राजनीतिक दलों के प्रचार का तरीका बदला-बदला दिखा. सड़कों व गली-मुहल्लों में बैनर-पोस्टर नजर नहीं आये. भोंपू का शोर नहीं होने से चुनाव भी लहरविहीन महसूस किया गया. नेताओं का समूचा ध्यान सीधे मतदाताओं से संपर्क करने पर केंद्रित रहा.

आम मतदाता भी मान रहा है कि प्रचार का बदला तरीका सुकून देने वाला रहा. सिंदरी निवासी शिवशंकर साव कहते हैं, ‘अंडरकरंट है. राष्ट्रीय मुद्दे क्या हैं, हमें नहीं लेना-देना. जनता के अपने मुद्दे हैं. हम उसी पर वोट करेंगे.’ साव जैसे अन्य मतदाताओं की बातों तथा उनकी चुप्पी ने राजनीतिक दलों की बेचैनी बढ़ा रखी है. कुछ यही वजहें हैं, जो नेता महीने भर वोटरों की दर-दर की धूल फांकते रहे.
अब चूंकि समय नजदीक आ गया है, सभी दल बूथ मैनेजमेंट को अंतिम रूप देने में जुटे हैं. चुनाव और क्रिकेट संभावनाओं का खेल है. राजनीतिक टीकाकार मानते हैं कि धनबाद के प्रत्याशी अच्छी तरह जानते हैं कि यहां की सियाची पिच पर टी20 गेम हो रहा है. जिसने अच्छा शॉट खेला, वही गेंम चेजर यानी विजेता कहलायेगा. पिच पर महागठबंधन के प्रत्याशी कीर्ति झा आजाद ने जो रंग दिखाये हों, धनबाद की सियासी पिच की समझ उनके लिए चुनौतीपूर्ण है. भारतीय जनता पार्टी के समक्ष भी करो-मरो की स्थिति है. पार्टी के सामने जहां अपना गढ़ बचाने की चुनौती है, तो कांग्रेस के लिए खोयी प्रतिष्ठा पाने का एक सुनहरा मौका.
2014 के लोस चुनाव में कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार अजय कुमार दुबे को हार का मुंह देखना पड़ा था. तब देश की सबसे पुरानी पार्टी को क्षेत्रीय दलों का सहारा नहीं था. आज स्थितियां बदल चुकी हैं. झामुमो, झाविमो, मासस जैसे दल महागठबंधन बना कर चुनाव लड़ रहे हैं. इनका अपना वोट बैंक है. यूपीए के दल आश्वस्त हैं कि वोटों का बिखराव रुकने से साझा उम्मीदवार कीर्ति झा आजाद की राह आसान होगी. उधर, भाजपा प्रत्याशी पशुपतिनाथ सिंह एक बार फिर संसद जाने की कसरत कर रहे हैं.
एनडीए के नेता व कार्यकर्ता पूरा जी-जान लगाये हैं. चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद भी मतदाताओं तक अपनी पहुंच बनाने का हर जतन किया जा रहा है. इन सबके बीच राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मतदाताओं के बीच पसरे सन्नाटे ने सियासी दलों का गणित उलझा कर रख दिया है.
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