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Majdoor Diwas 2021 : बोकारो का गांधी मैदान आखिर कैसे बना मजदूर मैदान, जानें इसके पीछे की कहानी और मैदान से जुड़े रोचक लम्हें

By Prabhat Khabar Print Desk
Updated Date
मजदूर  मैदान से "मजदूर" गायब, बच गया है "मैदान"
मजदूर मैदान से "मजदूर" गायब, बच गया है "मैदान"
Prabhat Khabar
  • एटक के गया सिंह ने "मजदूर मैदान" का किया था नामकरण

  • स्व. अकलू राम महतो ने "गांधी मैदान" नामकरण के लिए लिखा था पत्र

Jharkhand News, Bokaro News बोकारो : तब रामाकृष्णन बोकारो स्टील प्लांट के एमडी थे. बोकारो के पूर्व विधायक स्व. अकलू राम महतो ने सेक्टर - 04 के मैदान का नाम "गांधी मैदान" करने संबंधी पत्र प्रबंधन को लिखा, क्योंकि उस समय तक चौक पर गांधी जी की प्रतिमा स्थापित हो चुकी थी. उस समय एटक के गया सिंह ने उस मैदान में मजदूरों की सभा की. श्री सिंह ने ही मैदान को "मजदूर मैदान" कहना शुरू किया. उसके बाद धीरे-धीरे सभी इस मैदान को मजदूर मैदान से ही पुकारने लगे. तभी से इसका नाम मजदूर मैदान पड़ गया.

बोकारो स्टील सिटी में कभी मजदूर एकता की मिसाल बना सेक्टर- 04 का "मजदूर मैदान" वर्तमान में अपने नाम के मतलब को तलाश रहा है. मजदूर मैदान में अब मजदूरों से संबंधित कोई प्रोग्राम नहीं हो रहा है. न कोई बैठक न कोई चर्चा. मैदान का प्रयोग सिर्फ व्यावसायिक कारणों से किया जा रहा है. एक मई यानी आज मजदूर दिवस है. हर ओर मजदूरों के अधिकार की चर्चा हो रही है. मजदूर दिवस के इतिहास का बखान हो रहा है. ऐसे में मजदूर मैदान की स्थिति की चर्चा समसामयिक है.

मजदूरों की कई ऐतिहासिक सभा का गवाह मैदान

80 के दशक में मजदूर मांग पूर्ति व विरोध के लिए एडीएम भवन के पास एकत्रित होते थे. ऐसे में ट्रैफिक समस्या उत्पन्न होती थी. तत्कालीन एमडी आर रामकृष्णन ने विरोध-प्रदर्शन के लिए सेक्टर 04 में खाली स्थान को चयनित किया. मजदूर नेता ने भी इसका समर्थन किया. प्रबंधन ने बाकायदा मंच व शेड की व्यवस्था कर दी. सौंदर्यीकरण के लिए प्रबंधन ने मैदान की घेराबंदी कर दी. इसके बाद विरोध प्रदर्शन का यह क्षेत्र मैदान का आकार लेने लगा. मैदान मजदूरों की कई ऐतिहासिक सभा का गवाह बना.

मजदूरों की कई ऐतिहासिक सभा का गवाह मैदान

80 के दशक में मजदूर मांग पूर्ति व विरोध के लिए एडीएम भवन के पास एकत्रित होते थे. ऐसे में ट्रैफिक समस्या उत्पन्न होती थी. तत्कालीन एमडी आर रामकृष्णन ने विरोध-प्रदर्शन के लिए सेक्टर 04 में खाली स्थान को चयनित किया. मजदूर नेता ने भी इसका समर्थन किया. प्रबंधन ने बाकायदा मंच व शेड की व्यवस्था कर दी. सौंदर्यीकरण के लिए प्रबंधन ने मैदान की घेराबंदी कर दी. इसके बाद विरोध प्रदर्शन का यह क्षेत्र मैदान का आकार लेने लगा. मैदान मजदूरों की कई ऐतिहासिक सभा का गवाह बना.

कर्पूरी ठाकुर, लालू यादव, शिबू सोरेन, नरेंद्र सिंह तोमर...

मजदूर मैदान राजनीतिक दलों का अखाड़ा के रूप में भी चर्चा में रहा. 1987 में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर, 1995 में तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, 2015 में वर्तमान इस्पात मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, बोकारो के पूर्व विधायक समरेश सिंह आदि मजदूर मैदान में सभा को संबोधित कर चुके हैं. दिशोम गुरु शिबू सोरेन हर साल यहां बच्चों की चित्रकला प्रतियोगिता में हिस्सा लेने आते हैं. इसके अलावा 2010 में झामुमो नेता दुर्गा सोरेन का प्रथम पुण्यतिथि समारोह का आयोजन यहीं किया गया था.

समय के साथ अपनी पहचान को खोने लगा मैदान

मजदूर मैदान समय के साथ अपनी पहचान को खोने लगा. मैदान में अब सिर्फ मेला का आयोजन होता है. मेला का दौर नवंबर से शुरू होकर मार्च तक चलता है. स्वदेशी जागरण मंच की ओर से आयोजित स्वदेशी मेला सबसे ज्यादा सात दिन तक रहता है. इसके अलावा क्राफ्ट मेला, पुस्तक मेला, व्यापार मेला व शिक्षा मेला महत्वपूर्ण हैं. दुर्गापूजा व काली पूजा में मैदान भक्तिमय बन जाता है. पूजा के दौरान मीना बाजार लगता है. साल के छह महीने मैदान किसी न किसी मेला का गवाह बनता है.

नयी पहचान बनाने की ओर अग्रसर है मैदान

मजदूर मैदान नयी पहचान बनाने की ओर अग्रसर है. 1994 से मैदान में हर साल सखा सहयोग सुरक्षा समिति की ओर से चित्रकला प्रतियोगिता होती है. इसमें विभिन्न स्कूल के विद्यार्थी हिस्सा लेते हैं. कंपीटीशन महज 60 बच्चों से शुरू हुई थी. 2015 में प्रतिभागी बच्चों की संख्या 17,660 हो गयी. मैदान में समय-समय पर बड़े-बड़े धार्मिक कार्यक्रम भी होते रहते हैं. बाबा रामदेव, आशा राम बापू, विहंगम योग के संत स्वतंत्र देव व संत विज्ञान देव सहित कई बड़े धर्मगुरु की सभा यहां हो चुकी है. मतलब, अब यह मैदान अब केवल नाम का मजदूर मैदान है.

विरोध जताने के लिए हल जोतो कार्यक्रम भी हुआ

2009 में विस्थापित नेता फूलचंद महतो ने प्रबंधन के खिलाफ विरोध जताने के लिए मजदूर मैदान में "हल जोतो" कार्यक्रम आयोजित किया. रोकने के लिए पुलिस को बल का भी प्रयोग करना पड़ा था. अब तो सिर्फ नाम का हीं मजदूर मैदान रह गया है. मैदान का मजदूर से कुछ लेना देना नहीं है. मजदूर भी पहले की तुलना में कम हो गये हैं. प्रबंधन मैदान को कॉमर्शियल इस्तेमाल कर रहा है. आये दिन कोई ना कोई मेला मैदान की शोभा बढ़ाती है. अभी भी मैदान में मेला लगा हुआ है, जो कोरोना के कारण अभी बंद है.

Posted By : Sameer Oraon

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