एथेनॉल के कारण महंगी हुई मिठास या कोई और है वजह ? समझिए अचानक क्यों बढ़ गए चीनी के दाम
त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले चीनी की बढ़ती कीमतों ने आम घरों का बजट बिगाड़ना शुरू कर दिया है. अगर यही हालात रहे तो चाय से लेकर मिठाई, हलवा और घर पर बनने वाले दूसरे पकवानों का स्वाद इस बार फीका रह सकता है. चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर त्योहारों की तैयारियों और घरेलू खर्च पर पड़ सकता है.
देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत बढ़कर 52.3 रुपये प्रति किलो पहुंच गई है. यह एक साल पहले के मुकाबले करीब 13 फीसदी ज्यादा है. वहीं, कुछ शहरों में चीनी 60 से 65 रुपये किलो तक बिकने की खबरें हैं. हालांकि, बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने 10 लाख टन रॉ-शुगर के ड्यूटी-फ्री इम्पोर्ट को मंजूरी दी है.
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लेकिन सवाल ये है कि चीनी इतनी महंगी क्यों हो रही है? क्या एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने का इस्तेमाल इसकी सबसे बड़ी वजह है, या कमजोर मौसम, घटता स्टॉक और त्योहारी सीजन में बढ़ती मांग भी इसके पीछे जिम्मेदार हैं? और सबसे अहम सवाल ये है कि सरकार के इस फैसले के बाद आम लोगों को चीनी की कीमतों में राहत कब और कितनी मिलेगी?
बिहार-झारखंड में चीनी के दामों ने बढ़ाई मिठास की कीमत
- उपभोक्ता मामलों के विभाग के मुताबिक 18 अगस्त को देश की औसत खुदरा कीमत 52.3 रुपये किलो थी. वहीं, झारंखड और बिहार के कई प्रमुख शहरों के खुदरा बाजारों में चीनी की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है.
- कई शहरों में चीनी 65 से 70 रुपये किलो के आसपास बिक रही है. बिहार की राजधानी पटना में खुदरा भाव 75 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की खबर है तो रांची में चीनी करीब 65 से 70 रुपये प्रति किलो बिक रही है .
- पटना: ₹70/किलो
- दरभंगा: ₹70–72/किलो
- मुजफ्फरपुर: ₹62–70/किलो
- सासाराम/चेनारी: ₹70/किलो
- पूर्णिया: ₹65–68/किलो
- समस्तीपुर: ₹65–68/किलो
- बेगूसराय: ₹67–68/किलो
- रांची: ₹65–70/किलो
- धनबाद: ₹65–68/किलो
- जमशेदपुर: ₹64–68/किलो
- बोकारो: ₹65–67/किलो
अचानक क्यों बढ़ने लगे चीनी के दाम?
- चीनी की मौजूदा तेजी को समझने के लिए सबसे पहले सप्लाई को देखना होगा. इस समय बाजार में उपलब्ध पुराना स्टॉक सामान्य वर्षों की तुलना में कम है.
- मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 1 अक्टूबर से शुरू होने वाले नए सीजन में चीनी का शुरुआती स्टॉक करीब 35-40 लाख टन रहने का अनुमान लगाया जा रहा है, जबकि सामान्य तौर पर बाजार को ज्यादा आरामदायक बफर की जरूरत होती है. यही वजह है कि मिलों और कारोबारियों के पास स्टॉक को लेकर पहले जैसी गुंजाइश नहीं बची है.
- इसके साथ ही त्योहारी सीजन भी सामने है. रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी से लेकर दशहरा और दिवाली तक मिठाइयों, पेय पदार्थों और दूसरे खाद्य उत्पादों में चीनी की मांग बढ़ती है.
- ऐसे में जब सप्लाई को लेकर पहले से चिंता हो, तो भविष्य की मांग का अनुमान भी मौजूदा कीमतों को और ऊपर ले जा सकता है.
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क्या एथेनॉल की वजह से बढ़ रही हैं कीमतें?
- एथेनॉल को चीनी की बढ़ती कीमतों के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा, लेकिन इसका असर जरूर है. भारत ने पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल करने के लिए गन्ने से एथेनॉल उत्पादन बढ़ाया है.
- इसका मतलब है कि गन्ने का एक हिस्सा चीनी बनाने के बजाय एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हो रहा है. रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा सीजन में करीब 30 लाख टन चीनी के बराबर उत्पादन एथेनॉल की ओर डायवर्ट हुआ है.
- यही वजह है कि सरकार अगले सीजन में गन्ने के जूस और बी-हेवी मोलासिस से एथेनॉल बनाने पर अंकुश लगाने पर विचार कर रही है. इसके बजाय मक्का और चावल जैसे दूसरे फीडस्टॉक से एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की संभावना है. हालांकि, अभी इसे अंतिम नीति फैसला मानना जल्दबाजी होगी.
मौसम ने भी बढ़ाई चिंता
चीनी की कीमतों पर दबाव की दूसरी बड़ी वजह मौसम भी है. महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों में कम बारिश ने अगली फसल को लेकर चिंता बढ़ा दी है. गन्ना पानी पर निर्भर फसल है, इसलिए बारिश कम होने या मौसम में गड़बड़ी का असर आने वाले सीजन में उत्पादन पर पड़ सकता है.
तो चीनी महंगी क्यों हो रही है?
यानी, मौजूदा तेजी को सिर्फ एथेनॉल से जोड़कर देखना सही नहीं होगा. इसके पीछे एथेनॉल के लिए गन्ने का डायवर्जन, मौसम की मार से उत्पादन पर चिंता, शुरुआती स्टॉक में कमी और त्योहारी सीजन में बढ़ने वाली मांग की आशंका,इन सभी का मिला-जुला असर है.
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कीमत को कंट्रोल करने के लिए सरकार क्या कर रही?
- सरकार ने पहले ही चीनी डीलरों पर स्टॉक रखने की सीमा लागू की थी. यह व्यवस्था 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक लागू है और इसका मकसद जमाखोरी तथा सट्टेबाजी पर रोक लगाना है.
- सरकार का कहना है कि कुछ कारोबारियों की जमाखोरी और वास्तविक माल की आवाजाही के बिना होने वाले सौदों ने बाजार में कृत्रिम कमी की धारणा बनाई.
- अब सरकार ने एक और कदम उठाते हुए 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट की अनुमति दे दी है. यह चीनी 31 अक्टूबर तक आयात की जा सकती है. इसके अलावा पोर्ट आधारित रिफाइनरियों से घरेलू बाजार में करीब 3 लाख टन रिफाइंड चीनी उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी की जा रही है.
- साथ ही, बड़े थोक उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक सीमा को भी कड़ा किया गया है. सितंबर से नवंबर के बीच ऐसे खरीदार, जो महीने में 10 टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करते हैं, 15 दिन से अधिक का स्टॉक नहीं रख सकेंगे.
तो क्या आगे चीनी और महंगी होगी?
फिलहाल कीमतों पर दबाव बना रह सकता है, खासकर अगर त्योहारी मांग बढ़ती है और नई फसल की सप्लाई अपेक्षा से कमजोर रहती है. लेकिन सरकार का ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट फैसला बाजार में अतिरिक्त सप्लाई ला सकता है और कीमतों की तेजी पर ब्रेक लगा सकता है. इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि चीनी की कीमतें लगातार बढ़ती ही रहेंगी.
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