प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार हो रहा है ऐतिहासिक बिनोवा मैदान

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पिपरा : एक ओर जहां सूबे के सभी प्रखंडों में सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण कर स्टेडियम व खेल मैदान निर्माण की दिशा में प्रयास किया जा रहा है. ताकि बिहार के सुदूर क्षेत्र के युवा भी खेल की विभिन्न विद्याओं में अपने प्रतिभा का परचम लहरा सके. लेकिन स्थानीय बाजार स्थित 1956 में स्थापित विनोबा […]

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पिपरा : एक ओर जहां सूबे के सभी प्रखंडों में सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण कर स्टेडियम व खेल मैदान निर्माण की दिशा में प्रयास किया जा रहा है. ताकि बिहार के सुदूर क्षेत्र के युवा भी खेल की विभिन्न विद्याओं में अपने प्रतिभा का परचम लहरा सके.

लेकिन स्थानीय बाजार स्थित 1956 में स्थापित विनोबा मैदान जनप्रतिनिधि एवं प्रशासनिक उपेक्षा के कारण बदहाल स्थिति में है. इस ऐतिहासिक मैदान की दुर्दशा को लेकर स्थानीय लोगों में काफी आक्रोश व्याप्त है.

वर्ष 1920 में जमींदार स्व भगवती प्रसाद सिंह द्वारा 65 खाता के खतियानी रैयत चंद्र साह वगैरह से जमीन विक्रय पत्र केवाला के माध्यम से लिया गया. इसके बाद इस पर हाट लगाना आरंभ हुआ जिसकी तिथि सप्ताह में दो दिन मंगलवार एवं शुक्रवार को निर्धारित की गयी.वहीं स्थानीय युवकों द्वारा इस मैदान का उपयोग खेल के लिए भी किया जाने लगा.

इस बात से नाराज जमींदार द्वारा स्थानीय युवकों एवं ग्रामीणों के विरुद्ध अनुमंडल पदाधिकारी के समक्ष मामला दर्ज कराया.इसके पीछे उनका तर्क था कि इस मैदान में खेल से हाट प्रभावित होता है.मामले की सुनवाई के बाद अनुमंडल पदाधिकारी ने अपने आदेश में कहा कि मंगलवार एवं शुक्रवार को छोड़ सप्ताह के शेष दिन यहां खेल का आयोजन किया जा सकता है. 1956 के अंत में आर्चाय विनोबा भावे इसी हाट पर अपना प्रथम भाषण दिये और उसी दिन से इस हाट का नाम विनोबा मैदान रखा गया.

इसलिए इस हाट को सार्वजनिक संपत्ति माना जाता है. स्थानीय लोगों ने बताया कि सार्वजनिक संपत्ति इस लिए माना जाता है कि रिटर्न दाखिल करने के बाद जमींदार द्वारा अपने पास रखे गये भूस्वामित्व का ब्योरा उन्होंने सरकार को नहीं दिया. कहते हैं स्थानीय लोग खिलाड़ी देवेंद्र प्रसाद गुप्ता, योगेंद्र मंडल, शब्बीर आलम, अंगद चौधरी आदि ने बताया कि अब तक किसी भी जनप्रतिनिधि इस ओर ध्यान नहीं दिया. उन्होंने बताया कि इस मैदान में मंच भी स्थापित है, जिस कारण विभिन्न कार्यक्रमों के लिए इस मैदान का उपयोग करते हैं.

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