अब तो दाल-रोटी पर भी हो गयी है आफत
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :11 Dec 2014 2:04 PM (IST)
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सोनवर्षाराज : वर्ष 2008 में आयी कुसहा त्रसदी से कोसी की जनता उबर भी नहीं पायी थी कि खगड़िया जिला स्थित डुमरी में बीपी मंडल सेतु के क्षतिग्रस्त होने से क्षेत्र के लोगों की कमर ही टूट गयी. कोसी के लोगों का न केवल सूबे की राजधानी से सीधा सड़क संपर्क टूट गया, बल्कि भवन […]
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सोनवर्षाराज : वर्ष 2008 में आयी कुसहा त्रसदी से कोसी की जनता उबर भी नहीं पायी थी कि खगड़िया जिला स्थित डुमरी में बीपी मंडल सेतु के क्षतिग्रस्त होने से क्षेत्र के लोगों की कमर ही टूट गयी. कोसी के लोगों का न केवल सूबे की राजधानी से सीधा सड़क संपर्क टूट गया, बल्कि भवन निर्माण सामग्री सहित कई अन्य वस्तुओं के मूल्य चौगुने हो गये.
उसराहा से सोनवर्षा एनएच 107 के किनारे विभिन्न तरह के रोजगार करने वाले सैकड़ों लोग भुखमरी के कगार पर पहुंच गये हैं. सूबे की सरकार ने करोड़ों रुपये की लागत से वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में स्टील पाइल ब्रिज का निर्माण करवाया, लेकिन वह भी कारगर नहीं हो पाया. क्योंकि नदी के जलस्तर बढ़ने के साथ ही इस ब्रिज को स्थायी रूप से बंद कर दिया जाता. अर्थात वर्ष में मात्र छह माह ही सही तरीके से पुल पर हल्के वाहनों का परिचालन हो पाता था. लेकिन अब वह भी बंद हो चुका है.
बीपी मंडल सेतु के नाकाम होने की परिणति यह हुई कि पूरा का पूरा कोसी इलाका 20 वर्ष पीछे चला गया. पुल के नाकाम होने से भवन निर्माण सामग्री के मूल्यों में बढ़ोतरी के बाबत शारदा ट्रेडर्स के प्रोपराइटर्स राजीव कुमार सिंह उर्फ मुन्ना जी बताते हैं कि बीपी मंडल सेतु पर परिचालन बंद होने के फलस्वरूप जो लाल बालू 18 सौ रुपया प्रति सीएफटी बिकता था. उसका मूल्य रातों रात पांच हजार सीएफटी पहुंच गया. इसी तरह 45 सौ रुपये बिकने वाला मेंटल 82 सौ रुपये प्रति क्विंटल को पार कर गया. इसी तरह छड़ आदि के मूल्यों में भी अप्रत्याशित वृद्धि हुई. इस अप्रत्याशित मूल्य वृद्धि ने स्पष्ट रूप से इंदिरा आवास या गृहक्षति अनुदान राशि से मिलने वाले घरों के निर्माण को प्रभावित किया. दूसरी तरफ एनएच 107 के किनारे सैकड़ों ऐसे परिवार भुखमरी के कगार पर पहुंच गये है.
जो लाइन होटल, परचून की दुकान या फिर गैरज जैसे दुकानदारी कर अपने बाल बच्चों का भरण-पोषण करते थे. मनौरी चौक के करीब एनएच 107 के बगल में लाइन होटल चलाने वाले गंगा प्रसाद साह बताते हैं कि पुल के क्षतिग्रस्त होने से पूर्व दस हजार रुपये तक मासिक आमदनी हो जाती थी. लेकिन पुल क्षतिग्रस्त होने के बाद तो रोटी दाल पर आफत है. इसी तरह मैना गांव के करीब स्थित पेट्रोल पंप प्रिंस ऑटो सर्विस के प्रोपराइटर अनिल सिंह बताते हैं कि पुल के क्षतिग्रस्त होने से डीजल-पेट्रोल की बिक्री आधी हो चुकी है. किसी भी पुल के निर्माण के लिए पांच वर्षो का समय कम नहीं होता है. लेकिन सूबे की सरकार हो या केंद्र सरकार किसी ने 2008 के कुसहा में बरबाद हुए कोसी तथा 2010 में क्षतिग्रस्त बीपी मंडल सेतु के निर्माण की इच्छा शक्ति नहीं दिखायी. हालांकि वक्त-वक्त पर जनप्रतिनिधियों ने इसे मुद्दा बनाने के लिए जरूर नाम लिया. लेकिन सक्रिय रूप से कोई आगे नहीं आया. फिलवक्त स्थिति यह है कि तीन बार टेंडर हो चुका है. कभी रोप वे पुल तो कभी पुराने पुल को ही फिर से मरम्मत करने तो कभी उसके समानांतर नये पुल बनाने की बात की जा रही है. लेकिन पांच वर्ष से आश्वासन पर जी रहे कोसी के लोगों को अब ये बातें बेमानी लगने लगी है.
भागलपुर जाने में लगता है पूरा दिन
सड़क मार्ग से भागलपुर जाने में फिलहाल पूरा दिन निकल जाता है. सहरसा से जाने वाली कुछ बसें तो डुमरी पुल के पास तक जाती हैं, फिर यात्रियों को सामान लेकर पुल पर पैदल चलते दूसरी ओर जाना पड़ता है. जहां दूसरी बस लगी होती है. दूसरा मार्ग मधेपुरा, सरसी व कुरसैला होते भागलपुर का है. सहरसा से इस मार्ग से जाने में लगभग छह से सात घंटे का समय लगता है. रेल मार्ग पर नजर डालें तो एकमात्र ट्रेन हाटे बजारे एक्सप्रेस है, जो दोपहर बाद चलती है और देर शाम नवगछिया पहुंचती है. जहां से भागलपुर के लिए ऑटो जैसी छोटी गाड़ियां चलती है. इसके अलावा सहरसा से मानसी और फिर दूसरी ट्रेन पकड़ भागलपुर जाने के लिए लोग बाध्य हैं.
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