चारपहिया वाहन नहीं, यहां नाव है स्टेट्स सिंबल
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :19 Jun 2017 5:52 AM (IST)
विज्ञापन

सिमरी बख्तियारपुर व सलखुआ प्रखंड के आठ पंचायत के लगभग हर घर में है नाव सिमरी बख्तियारपुर : साल के 12 महीने कोसी सहित छोटी बड़ी उपनदियों से व बाढ़ से घिरे रहने वाले सिमरी बख्तियारपुर व सलखुआ प्रखंड की आठ पंचायत के लगभग हर घर में नाव है. जिनके पास अपनी नाव नहीं, वह […]
विज्ञापन
सिमरी बख्तियारपुर व सलखुआ प्रखंड के आठ पंचायत के लगभग हर घर में है नाव
सिमरी बख्तियारपुर : साल के 12 महीने कोसी सहित छोटी बड़ी उपनदियों से व बाढ़ से घिरे रहने वाले सिमरी बख्तियारपुर व सलखुआ प्रखंड की आठ पंचायत के लगभग हर घर में नाव है. जिनके पास अपनी नाव नहीं, वह किराये की नाव से काम चलाते हैं. यहां शादी से लेकर अंतिम संस्कार तक नाव पर होता है. नाव से इन पंचायतों में अमीरी गरीबी तय होती है.
जिसके पास जितना बड़ा नाम, वह उतना अमीर आदमी माना जाता है. सलखुआ के अलानी, चानन, सामहरखुर्द, उटेसरा, सिमरी बख्तियारपुर के धनुपरा, कठडुमर, घोघसम, बेलवारा की आबादी लगभग 35 हजार है. यहां के लोगों ने प्रकृति के साथ जीने की कला सीख ली है. कोसी कमला बलान की धारा और उप धाराओं से उन्होंने बेहतर तालमेल मिलाया है. सामान्य बाढ़ में घर बथान सुरक्षित रहते हैं. जैसे ही पानी बढ़ता है. यहां के लोगों की परेशानी बढ़ जाती है.
दहेज में दी जाती है नाव: शादी में दहेज की जगह कार, मोटरसाइकिल नहीं लेकर दहेज में नाव दी जाती है. बेलवारा निवासी पूर्व मुखिया रामसागर यादव ने बताया कि सालों भर पानी से घिरा रहने के कारण आने जाने का एकमात्र साधन ना होने के कारण दहेज में कई परिवारों को नाव दी गयी. बाढ़ के समय शादी हो या किसी की मौत, एक मात्र सहारा नाव रहता है. हालांकि बाद के समय शादी स्थगित कर दी जाती है. लेकिन कई बार लड़के की जिद पर शादी होती है तो जहां लड़के वाले नाव पर ही सवार होकर बारात आते हैं. वहीं बाढ़ के समय जमीन सूखा कम रहने के कारण नाव पर ही बारातियों को ठहरने के लिए मचान बना दिया जाता है. हालात और तब खराब हो जाते हैं. जब बाढ़ के समय मौत हो जाती है. मरने पर अंतिम संस्कार भी नाव पर ही कर दिया जाता है. क्रिया-कर्म की रस्म अदायी कर 950 कर लाश को बीच धारा में ले जाकर कोसी मैया में प्रवाहित कर देते हैं.
कम आय वाले लोग मिल-जुल कर बनाते हैं नाव
कम आय वाले लोग मिलजुल कर गांव आने जाने के लिए नाव बनाते हैं. जिनके पास नाव नहीं, वह जरूरत पड़ने पर 30 से 50 रुपये प्रतिदिन की दर से किराया पर नाव लेते हैं. यहां हर गांव में 10 से 40 छोटी बड़ी नाव है. 80 के दशक से इन गांव के लोगों ने नाव बनाना शुरू की. लगभग 10 साल पहले लकड़ी की नाव में मोटर लगायी गयी. इससे नाव की स्पीड बढ़ गयी. इसी के बाद नाव में मोटर लगाने का चरण शुरू हुआ. अब छोटी व बड़ी सभी नाव में मोटर लगाया जा रहा है.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
विज्ञापन
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए
विज्ञापन




