बिहार में 'गूगलाइटिस' से गंभीर रोगों की चपेट में आ रहे लोग, बढ़ रही मरीजों की तादाद, डॉक्टर भी परेशान

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 04 Jan 2023 11:16 AM

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जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के टीबी एडं चेस्ट विभाग के एचओडी डॉ शांतनु घोष ने कहा कि गूगल पर लोग लक्षण के आधार पर दवा तो ले लेते हैं, पर साइड इफेक्ट होने पर चिकित्सक के पास आते हैं. ऐसे लोगों का बाद में इलाज बेहद मुश्किल हो जाता है.

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पटना: गुगल सर्च इंजन जो अब बोलता भी है, उसका फायदा लोग सवाल पूछ कर उठाते हैं. इसकी इसी खासियत से युवा जीवन की हर समस्या का समाधान यहां खोजते हैं. सिर में दर्द हो या दिल में, गूगल पर टाइप कर लक्षण लिख बीमारी की जानकारी लेने लगते हैं.

छोटी-मोटी बीमारी गुगल की दवा से हो रही बड़ी

गूगल मेडिकल के सारे टर्म, जांच एवं दवा के बारे में जानकारी तो देता है, लेकिन उसके पास क्लिनिकल जानकारी नहीं है. परिणाम मुफ्त चिकित्सा सलाह के चक्कर में लोग गूगल सिंड्रोम का शिकार हो रहे हैं. स्थिति यह है कि छोटी-मोटी बीमारी गुगल की दवा से बड़ी हो जाती है. ऐसे गूगलाइटिस (आम बोलचाल में गूगल से ज्ञान लेनेवालों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द) से डॉक्टर भी परेशान हैं.

हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ संजय निराला बोले

केस 1 – हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ संजय निराला बताते हैं कि बरारी से सौरभ कुमार बदला हुआ नाम इलाज कराने आया. चोट से हड़डी में हेयर क्रेक था. इससे पैर में उसके सूजन हो गया था. वह सामने आया तो अपनी बीमारी पर कम, पर जो दवा जो उसने खायी थी उसके बारे में ज्यादा बात करने लगा. दवा जब हमने देखी तो वह हेयर क्रेक की नहीं थी, बल्कि दूसरे हड्डी रोग की थी. दवा के बारे में सौरभ से पूछे तो पता चला कि उसने गुगल कर दवा लिया था. अब दवा का साइड इफैक्ट होने लगा था. इसके बाद वह क्लिनिक आया. अब उसे सही दवा के साथ-साथ साइड इफेक्ट खत्म करने के लिए दवा दी गयी.

वरीय चिकित्सक डॉ. अमित आनंद बोले

केस 2 – वरीय चिकित्सक डॉ अमित आनंद कहते हैं कि सबौर के जयंत कुमार बदला हुआ नाम खांसी से परेशान था. गूगल पर लक्षण लिखा, तो पता चला उसे टीबी रोग हो गया है. जानकारी होने के बाद परिवारवाले भी परेशान हो गये. वह डर गया और करीब तीन हजार रुपये खर्च कर गूगल के बताए जांच को करा लिया. जब उसका रोग कम नहीं हुआ, तो थक हार कर हमारे पास आया. रोग के हिसाब से हमने सामान्य जांच करायी, तो उसे टीबी नहीं था. दवा देने पर वह इसके साइड इफेक्ट पर सवाल करने लगा. अंत में उसे सही जानकारी दी गयी. दवा देकर समय पर खाने के लिए कहा गया.

वरीय चिकित्सक डॉ. विनय कुमार झा बोले

केस 3 – वरीय चिकित्सक डॉ विनय कुमार झा कहते हैं कि तिलकामांझी इलाके से श्याम यादव बदला हुआ नाम आया. उसे मधुमेह रोग था, जो अनियंत्रित हो चुका था. बिना किसी डॉक्टर से मिले वह दवा और कई तरह के पत्ते का रस पीने लगा. इससे श्याम का मधुमेह और बढ़ गया. साइड इफेक्ट हुआ, तो हमारे पास पाया. उसने बताया कि गूगल से जानकारी लेकर हमने दवा खानी शुरू कर दी. रोग अनियंत्रित हो गया. साइड इफेक्ट भी होने लगा है. अंत में श्याम की जांच करायी गयी, तो पता चला किडनी में भी इसका असर होने लगा है. इसके बाद उसकी दवा शुरू की गयी. इसके बाद राेग नियंत्रण में है.

कहते हैं एक्सपर्ट

जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के टीबी एडं चेस्ट विभाग के एचओडी डॉ शांतनु घोष कहते हैं कि गूगल पर मेडिकल के सारे टर्म, जांच एवं दवा की जानकारी तो उपलब्ध है, लेकिन इसमें क्लिनिकल जानकारी नहीं है. डॉक्टर कठिन मेहनत कर इसकी जानकारी लेते हैं. गूगल पर लोग लक्षण के आधार पर दवा तो ले लेते हैं, पर साइड इफेक्ट होने पर चिकित्सक के पास आते हैं. दरअसल, अगर सिर में दर्द है, तो यह कई वजह से हो सकता है. गूगल पर सर्च कर लोग दवा खा लेते हैं. इसके बाद साइड इफेक्ट लेकर आते हैं. तब तक रोग बढ़ चुका होता है. ऐसे लोगों का इलाज करना भी बेहद मुश्किल होता है.

गूगल भी करता है सावधान

रोग होने पर डॉक्टर से सलाह लें. गूगल महज एक जानकारी का प्लेटफाॅर्म है. सही रोग एवं दवा चिकित्सक जांच करने के बाद ही बता या दे सकते हैं. ऐसे में गूगल से जानकारी लेकर दवा खाना हानिकारक हो सकता है.

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