निर्भया गैंगरेप : दोषी अक्षय की पुनर्विचार याचिका खारिज, राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका के लिए मांगा वक्त

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 18 Dec 2019 9:22 AM

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नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने साल 2012 के दिसंबर में दिल्ली के एक बस में युवती से हुए सामूहिक बलात्कार मामले के दोषियों में से एक बिहार के अक्षय कुमार सिंह उर्फ अक्षय ठाकुर की समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया है. इसके बाद अक्षय के अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट से राष्ट्रपति के समक्ष […]

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नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने साल 2012 के दिसंबर में दिल्ली के एक बस में युवती से हुए सामूहिक बलात्कार मामले के दोषियों में से एक बिहार के अक्षय कुमार सिंह उर्फ अक्षय ठाकुर की समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया है. इसके बाद अक्षय के अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट से राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर करने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा. इसके बाद साॅलिसिटर जनरल तुषार मेहता का कहना है कि समीक्षा के लिए सात दिन दिये जा सकते हैं. राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर करने के लिए एक सप्ताह का समय निर्धारित है.

मालूम हो कि इससे पहले मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे के केस की सुनवाई इनकार करने के बाद नयी बेंच गठितकी गयी. इस बेंच का नेतृत्व न्यायमूर्ति आर भानुमति ने किया. उनके साथ जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एएस बोपन्ना बेंच में शामिल थे. अदालत ने दोनों पक्षों को दलीलें पेश करने के लिए 30-30 मिनट का समय दिया. दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद फैसला एक बजे सुनाने की बात कही गयी.

दोषी अक्षय के अधिवक्ता ने दलील पेश करते हुए अदालत से कहा कि भारत में मृत्युदंड को समाप्त किया जाना चाहिए. अक्षय को मामले में झूठा फंसाया गया है.साथ ही कहा कि मृत्युदंड दंड की एक पुरातन विधि है. यह अपराध को मारता है. अपराधी को नहीं. मृत्युदंड का उपयोग अपराधियों और दोषियों के लिए एक हानिकारक प्रभाव नहीं लगता है.

मालूम हो किदिल्ली में 16 दिसंबर, 2012 को हुए निर्भया सामूहिक बलात्कार और हत्याकांड के दोषी करार दिये गये चार मुजरिमों में से एक दोषी बिहार के औरंगाबाद जिले के टंडवा थाना क्षेत्र के लहंगकर्मा गांव निवासी अक्षय कुमार सिंह उर्फ अक्षय ठाकुर की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रही है.बेंच ने अक्षय के वकील एपी सिंह को दलील के लिए आधे घंटे का वक्त दिया है.

मालूम हो कि अक्षय कुमार सिंह उर्फ अक्षय ठाकुर की पुनर्विचार याचिका को लेकर मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है. अक्षय की पुनर्विचार याचिका आने के बाद मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि मामले की सुनवाई दूसरी उचित पीठ करेगी. उन्होंने कहा कि उनके एक रिश्तेदार मामले में पीड़ित की मां की ओर से पहले पेश हो चुके हैं. ऐसी स्थिति में बेहतर होगा कि अन्य पीठ पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करे.

दिसंबर, 2012 में हुए निर्भया कांड में सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में चारों मुजरिमों की मौत की सजा के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया था. इससे पहले, हाईकोर्ट ने चारों को मौत की सजा के निचली अदालत के फैसले की पुष्टि कर दी थी. दक्षिण दिल्ली में 16-17 दिसंबर, 2012 की रात चलती बस में छह व्यक्तियों ने 23 वर्षीय छात्रा के साथ गैंग रेप के बाद उसे बुरी तरह जख्मी करके सड़क पर फेंक दिया था. निर्भया का बाद में 29 दिसंबर, 2012 को सिंगापुर में माउन्ट एलिजाबेथ अस्पताल में निधन हो गया था. इस प्रकरण में 33 वर्षीय अक्षय ने अभी तक पुनर्विचार याचिका दायर नहीं की थी, जबकि तीन अन्य दोषियों की पुनर्विचार याचिका न्यायालय पहले ही खारिज कर चुका है.

अक्षय ने अपने वकील एपी सिंह के माध्यम से दायर पुनर्विचार याचिका में मौत की सजा के संभावित अमल के खिलाफ दलीलें दी हैं. याचिका में कहा गया है, ‘शासन को सिर्फ यह साबित करने के लिए लोगों की मौत की सजा पर अमल नहीं करना चाहिए कि वह आतंक या महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर हमला कर रहा है. उसे बदलाव के बारे में सुनियोजित तरीके से सुधार के लिए काम करना चाहिए. फांसी की सजा पर अमल सिर्फ अपराधी को मारता है, अपराध को नहीं.’ शीर्ष अदालत ने पिछले साल नौ जुलाई को इस बर्बरतापूर्ण अपराध के तीन दोषियों 30 वर्षीय मुकेश, 23 वर्षीय पवन गुप्ता और 24 वर्षीय विनय शर्मा की पुनर्विचार याचिकाएं खारिज कर दी थीं.

न्यायालय ने कहा था कि इनमें 2017 के फैसले पर पुनर्विचार का कोई आधार नहीं है. इस समय दिल्ली की एक जेल में बंद अक्षय ने अपनी याचिका में कहा है कि मौत की सजा ‘बेरहमी से हत्या’ है और यह दोषियों को सुधरने का अवसर प्रदान नहीं करती है. याचिका में मौत की सजा खत्म करने की कारणों का जिक्र करते हुये कहा है कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे पता चलता हो कि इस दंड का भय पैदा करने का कोई महत्व हो. याचिका में पूर्व प्रधान न्यायाधीश पीएन भगवती की टिप्पणियों का भी जिक्र किया गया है कि गरीब पृष्ठभूमि वाले अधिकतर दोषियों को फांसी के फंदे तक भेजने की संभावना अधिक रहती है.

याचिका में दिल्ली में प्रदूषण के बढ़ते स्तर से स्वास्थ्य को उत्पन्न खतरे का जिक्र करते हुए कहा गया है कि जीवन छोटे से छोटा होता जा रहा है, तो फिर मृत्यु दंड क्यों? याचिका में मौजूदा दौर में मनुष्य के जीवनकाल का जिक्र करते हुए कहा गया है कि मौत की सजा को कानून की किताब में रखने की कोई वजह नहीं है. इस वारदात को अंजाम देनेवाले छह अपराधियों में से एक राम सिंह ने तिहाड़ जेल में कथित रूप से आत्महत्या कर ली थी, जबकि छठा आरोपी किशोर था और उसे किशोर न्याय बोर्ड ने दोषी ठहराया था. इस किशोर को तीन साल की सजा पूरी करने के बाद सुधार गृह से रिहा कर दिया गया था. पुनर्विचार याचिका के बाद दोषियों के पास सुधारात्मक याचिका दायर करने का विकल्प होता है. इसमें भी सफलता नहीं मिलने पर वे राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर कर सकते हैं. दया याचिका खारिज होने के बाद ही प्रशासन स्थानीय अदालत से ऐसे दोषी की मौत की सजा पर अमल के लिये आवश्यक वारंट प्राप्त कर सकता है.

कौन है अक्षय कुमार सिंह उर्फ अक्षय ठाकुर?

निर्भया गैंग रेप मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोषी ठहराये गये अभियुक्तों में से एक अक्षय कुमार सिंह उर्फ अक्षय ठाकुर बिहार के औरंगाबाद जिले के टंडवा थाना क्षेत्र के लहंगकर्मा गांव का रहनेवाला है. अक्षय ठाकुर साल 2011 में पढ़ाई छोड़ कर घर से भागा और दिल्ली पैसे कमाने पहुंचा था. ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं होने के कारण उसे ठंग का काम नहीं मिला. इसी दौरान वह राम सिंह के करीब आ गया. राम सिंह ने अक्षय को बस कंडक्टर के काम में लगा दिया. राम सिंह के सहारे वह फल बेचनेवाले पवन गुप्ता से भी घुल-मिल गया था. निर्भया कांड के बाद अक्षय भागकर अपने गांव आ गया था. अक्षय ठाकुर को दिल्ली पुलिस ने बिहार के औरंगाबाद से गिरफ्तार कर अपने साथ लायी थी.

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