पटना : ऑटिज्म डिसॉर्डर पागलपन नहीं, अलग तरह से करें ट्रीट
Updated at : 14 Apr 2019 9:08 AM (IST)
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पटना/फुलवारीशरीफ : आॅटिज्म डिसॉर्डर पागलपन नहीं है. इससे पीड़ित बच्चों काे अलग तरह से ट्रीट करना चाहिए. यह बातें स्पर्श-मेडिवर्सल की रचना किशोरपुरिया ने विश्व ऑटिज्म दिवस पर आयोजित जागरूकता कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहीं. एम्स पटना, स्पर्श मेडिवर्सल हेल्थ केयर और बीएमडब्ल्यू वेंचर्स लिमिटेड के संयुक्त रूप से आयोजित कार्यशाला को संबोधित करते […]
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पटना/फुलवारीशरीफ : आॅटिज्म डिसॉर्डर पागलपन नहीं है. इससे पीड़ित बच्चों काे अलग तरह से ट्रीट करना चाहिए. यह बातें स्पर्श-मेडिवर्सल की रचना किशोरपुरिया ने विश्व ऑटिज्म दिवस पर आयोजित जागरूकता कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहीं. एम्स पटना, स्पर्श मेडिवर्सल हेल्थ केयर और बीएमडब्ल्यू वेंचर्स लिमिटेड के संयुक्त रूप से आयोजित कार्यशाला को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ‘तारे जमीन पर’ नाम से लगातार पटना में विशेष बच्चों के बारे में जागरूकता अभियान चल रहा है.
स्कूल से विशेष अपील की स्कूल अन्य बड़े शहरों के स्कूलों की तरह इंक्लूसिव एजुकेशन पर भी विशेष ध्यान दें. कार्यशाला का उद्घाटन एम्स पटना के निदेशक डॉ प्रभात कुमार सिंह और डीन डॉ प्रेम प्रकाश गुप्ता ने संयुक्त रूप से किया. उन्होंने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम से लोगों में जागरूकता आयेगी. साथ ही डाॅक्टरों को नये विषय पर शोध करने का मौका मिलेगा.
ऑटिज्म पीड़ितों में हर साल पांच प्रतिशत की वृद्धि : कार्यक्रम की संयोजक और फारमालाॅजी विभाग की सहायक प्रोफेसर डाॅ श्रोती सिंह ने कहा कि आॅटिज्म इस दशक में बच्चों को प्रभावित करने वाली एक बड़ी बीमारी के रूप में उभर कर सामने आयी है. हमारे देश में सौ बच्चों में एक बच्चा आॅटिज्म से ग्रस्त पैदा हा रहा है. इसमें हर साल पांच प्रतिशत की वृद्वि हो रही है. दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल डाॅ दीपक गुप्ता ने आॅपिटज्म के लक्षण और इलाज पर विस्तृत प्रकाश डाला.
ऑटिज्म पीड़ित बच्चों के अभिभावकों की सही काउंसेलिंग बहुत जरूरी
पटना एम्स के शिशु रोग के विभागाध्यक्ष डाॅ लोकेश तिवारी ने कहा कि प्रत्येक बच्चे के लिए एएसडी के पैटर्न अलग होते हैं. जन्म से बच्चे का मानसिक विकास धीमा हो जाता है. एम्स के मानसिक रोग के विभागाध्यक्ष डाॅ पंकज कुमार ने कहा कि ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों के अभिभावकों की सही काउंसेलिंग बहुत जरूरी है. अगर पेरेंट्स की सही तरह से काउंसेलिंग की जाये तो बच्चे की परेशानी को समझने और बच्चे को सही से ट्रीटमेंट मिल सकता है.
बेशक, ऑटिज्म की समस्या को पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन बच्चों को उनकी रोजमर्रा के कामों की ट्रेनिंग धीरे-धीरे दी जा सकती है. बच्चे के लिए इलाज के लिए चाइल्ड साइकाइट्रिक्स से काउंसेलिंग भी बहुत जरूरी होती है. मौके पर मेडिवर्सल के नवनीत रंजन, स्पर्श दिल्ली की निदेशक सुरभि वर्मा, बीएमडब्ल्यू के निदेशक नितिन किशोरपुरिया आदि मौजूद थे.
ऑटिज्म ग्रस्त बच्चों के लक्षण
बच्चे जल्दी से दूसरों से आइ कॉन्टेक्ट नहीं कर पाते.
बच्चे किसी की आवाज सुनने के बाद भी रिएक्ट नहीं करते.
भाषा को सीखने-समझने में इन्हें दिक्कत आती है.
बच्चे अपनी ही धुन में अपनी दुनिया में मग्न रहते हैं.
ऐसे बच्चों का मानसिक विकास ठीक से नहीं हुआ होता तो ये बच्चे सामान्य बच्चों से अलग ही दिखते और रहते हैं.
डाॅ दीपक गुप्ता ने ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों के लिए दिये टिप्स
बच्चे को कुछ भी समझाएं तो धीरे-धीरे एक-एक शब्द बोलें और बच्चे के साथ उसे दोहराएं.
बच्चों के साथ खेलें, उन्हें समय दें.
बच्चों को डिफिकल्ट ट्वॉयज ना दें.
बच्चों को फोटो के जरिए चीजें समझाएं.
बच्चों को आउटडोर गेम्स खिलाएं. इससे बच्चे का थोड़ा कॉन्फिडेंस बढ़ेगा.
बच्चे के सामने सामान्य बच्चों की तुलना ना करें.
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