पटना : दो साल में मोह भंग, निकाय प्रमुखों पर बढ़ा पंचायत प्रतिनिधियों का ''अविश्वास''

Updated at : 28 Sep 2018 8:10 AM (IST)
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पटना : दो साल में मोह भंग, निकाय प्रमुखों पर बढ़ा पंचायत प्रतिनिधियों का ''अविश्वास''

सुमित कुमार पावर पॉलिटिक्स. सत्ता में बने रहने का खेल या विकास का उठ रहा है मुद्दा पटना : पंचायती राज के निकाय प्रमुखों पर ‘अविश्वास’ का दौर चालू है. पंचायती राज चुनाव के दो साल पूरा होते ही उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की बाढ़ आ गयी है. अब तक 276 से अधिक निकाय प्रमुखों […]

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सुमित कुमार
पावर पॉलिटिक्स. सत्ता में बने रहने का खेल या विकास का उठ रहा है मुद्दा
पटना : पंचायती राज के निकाय प्रमुखों पर ‘अविश्वास’ का दौर चालू है. पंचायती राज चुनाव के दो साल पूरा होते ही उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की बाढ़ आ गयी है. अब तक 276 से अधिक निकाय प्रमुखों के खिलाफ लाये गये अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान कराया जा चुका है. इनमें अधिकतर जगहों पर नये निकाय प्रमुख चुन कर आये, जबकि कुछ जगहों पर पुराने ने ही जोड़-तोड़ कर सत्ता बनाये रखी. कई निकायों में सेटिंग-गेटिंग के चलते नोटिस वापस होने से मतदान ही नहीं हो सका.
पुन: जीते निकाय प्रमुख अगले तीन साल के लिए सुरक्षित : जानकारी के मुताबिक किसी भी निकाय प्रमुख के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए कार्यपालक पदाधिकारी को नोटिस दी जाती है.
इसके बाद जिलाधिकारी के माध्यम से राज्य निर्वाचन आयोग को इसकी सूचना देते हैं. आयोग के स्तर पर चुनाव की तिथि तय की जाती है. राज्य निर्वाचन आयोग के मुताबिक अविश्वास प्रस्ताव पर हुए मतदान के बाद पुन: चुन कर आने वाले निकाय प्रमुख अगले तीन साल के लिए सुरक्षित हो जायेंगे.
अविश्वास के पीछे पैसे और पावर की लड़ाई!
पंचायती राज अधिनियम के मुताबिक किसी भी निकाय प्रमुख के चुनाव के ठीक दो साल बाद उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है. चूंकि पंचायती राज के चुनाव जून 2016 में हुए थे.
इनमें चुन कर आये जन प्रतिनिधियों ने अगस्त 2016 तक जिला परिषद अध्यक्ष-उपाध्यक्ष, प्रखंड प्रमुख-उप प्रमुख, उपमुखिया व उपसरपंच का चुनाव किया. इसलिए अगस्त 2018 होते ही अविश्वास की नोटिस का दौर शुरू हो गया. उस वक्त इन पदों पर चुने गये निकाय प्रमुखों का समर्थन करने वाले पार्षदों का दो साल बाद ही मोहभंग होने के पीछे पैसे और पावर की लड़ाई बतायी जाती है. कई जगह पर विपक्ष के संगठित होने से पहले ही निकाय प्रमुखों ने खुद पर अविश्वास की नोटिस करा ली, ताकि फिर से चुनाव करा कर खुद को अगले तीन साल तक के लिए सुरक्षित करा लें. वहीं, कुछ जगहों पर संगठित विपक्ष की नोटिस मिलते ही पार्षदों को लुभाने का दौर खूब चला.
276 से अधिक जिप अध्यक्ष-उपाध्यक्ष, प्रखंड प्रमुख-उप प्रमुख, उप मुखिया व उप सरपंच के खिलाफ लाये गये अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान कराया गया है. दोबारा जीत कर आये निकाय प्रमुखों के खिलाफ अब उनके इस पूरे कार्यकाल के दौरान दोबारा अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकेगा.
—दुर्गेश नंदन, सचिव, राज्य निर्वाचन आयोग
आठ दर्जन प्रखंड प्रमुखों पर अविश्वास
पंचायत राज प्रतिनिधियों ने सबसे अधिक अविश्वास प्रखंड प्रमुख पद को लेकर जताया है. जिलाधिकारियों से मुख्यालय को मिली रिपोर्ट के मुताबिक करीब आठ दर्जन प्रखंड प्रमुख के खिलाफ उनको चुनने वाले पंचायत समिति सदस्यों ने ही अविश्वास प्रस्ताव लाया.
इसी तरह करीब सात दर्जन उप मुखिया, पांच दर्जन उप प्रमुख, डेढ़ दर्जन उप सरपंच एवं चार-चार जिला परिषद अध्यक्ष-उपाध्यक्ष के खिलाफ लाये गये अविश्वास प्रस्ताव पर भी मतदान हो चुका है. मुखिया व सरपंच की नियुक्ति सीधे जनता के वोट से होती है, इसलिए इनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सका.
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