बिजली के बिना गांवों का विकास नहीं

Published at :16 Jul 2013 1:30 PM (IST)
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बिजली के बिना गांवों का विकास नहीं

प्रखंड के आधे से अधिक गांवों के लोगों को नहीं मिल रही सुविधावारिसलीगंज : बिजली के बगैर गांवों को विकसित करना संभव नहीं है. महज खेती से ही जीविकोपाजर्न करने वाले लोगों को अगर बिजली ही न मिले तो कृषि को बढ़ावा व किसानों की उन्नति का सरकारी दावे की कोई अहमियत नहीं रह जायेगी. […]

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प्रखंड के आधे से अधिक गांवों के लोगों को नहीं मिल रही सुविधा
वारिसलीगंज : बिजली के बगैर गांवों को विकसित करना संभव नहीं है. महज खेती से ही जीविकोपाजर्न करने वाले लोगों को अगर बिजली ही न मिले तो कृषि को बढ़ावा व किसानों की उन्नति का सरकारी दावे की कोई अहमियत नहीं रह जायेगी.

स्थिति यह है कि वारिसलीगंज प्रखंड के 80 राजस्व गांवों में महज 32 गांवों को ही बिजली की सुविधा मिली है. बाकी गांवों के लोग आज भी लालटेन युग में जीने को विवश हैं. वहीं, जिन गांवों में बिजली की व्यवस्था है भी वहां विद्युत विभाग की लचर व्यवस्था के कारण आपूर्ति ठप है.

कहीं बिजली के तार जजर्र हैं तो कहीं ट्रांसफॉर्मर नहीं है जिसके कारण लोगों को समुचित बिजली नहीं मिल पाती है. वैसे, वारिसलीगंज विद्युत विभाग का अवर प्रमंडल कार्यालय है, जहां से वारिसलीगंज सहित कतरी सराय, काशीचक, पकरीबरावां, कौआकोल के इलाकों में बिजली की आपूर्ति की जाती है.

पूरे क्षेत्र को मकरनपुर, दरियापुर, कतरीसराय, मोकामा, सांबे व नगर फीडरों में बांट कर 32 गांवों में बिजली आपूर्ति की जा रही है. जजर्र बिजली तारों, पुराने खंभों व लचर बिजली आपूर्ति ने बिजली की सुविधा बहाल इन गांवों में भी आपूर्ति न के बराबर है. वहीं, ठेरा, सफीगंज, सौर, दौलतपुर, राजापुर, पचवारा, हेमदा, हैवतपुर, बेल्ढा आदि दर्जनों गांवों में पिछले कई वर्षो से बिजली की व्यवस्था नहीं किये जाने से अंधेरे में जीने को विवश होना पड़ रहा है.

जिन गांवों में बिजली व्यवस्था है भी वहां के कृषक बिजली का लाभ खेती बाड़ी के तौर पर नहीं करते. बिजली महज रोशनी बिखेरने तक ही सिमट कर रह जाती है. इसका मूल कारण आपूर्ति की लचर व्यवस्था है. महंगे डीजल की खरीदारी कर किसान खेती करने को विवश हैं. बिजली से वंचित गांवों के लोगों ने बताया कि बिजली सुविधा के लिए कई बार उच्च अधिकारियों से मांग की गयी, जिस पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी.

कार्यालयों का चक्कर लगाते-लगाते लोगों का धैर्य टूट गया. चुनावी मौसम में गांव आकर वोटर मांगने वाले सभी प्रत्याशियों से इस समस्या को सुलझाने की मांग की जाती है लेकिन, चुनाव समाप्त होते ही विजयी प्रत्याशी इसे भूल जाते हैं. इससे कारण निकट भविष्य में गांवों को विकसित करने का दावा सच होता नहीं दिखायी दे रहा है.

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