शोपीस बने ठाकुरगंज स्टेशन के डिजिटल इंडिकेटर, जानिए क्यों अमृत भारत योजना की जमीनी हकीकत पर उठ रहे हैं सवाल
भारतीय रेल का प्रतीकात्मक फोटो
ठाकुरगंज स्टेशन पर अमृत भारत योजना के तहत आधुनिक सुविधाओं के दावों की पोल खुली. डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड शोपीस बने, यात्रियों को हो रही भारी परेशानी.
Thakurganj Railway Station Coach Display Board: भारतीय रेलवे को आधुनिक बनाने और यात्रियों के सफर को आरामदायक बनाने के लिए 'अमृत भारत स्टेशन योजना' का जोर-शोर से ढोल पीटा जा रहा है. रेलवे स्टेशनों का कायाकल्प करने और वहां विश्वस्तरीय डिजिटल सुविधाएं देने के लंबे-चौड़े दावे किए जाते हैं. लेकिन जब हकीकत की कसौटी पर इन व्यवस्थाओं को परखा जाता है, तो दावों की हवा निकल जाती है. कुछ ऐसा ही मंजर बिहार के किशनगंज जिले अंतर्गत ठाकुरगंज रेलवे स्टेशन पर देखने को मिल रहा है.
जहां ट्रेन के प्लेटफॉर्म पर पहुंचते ही डिजिटल कोच डिस्प्ले बोर्ड सफेद हाथी साबित होने लगते हैं. जिस समय यात्रियों को सही कोच पोजिशन जानने की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, ठीक उसी समय डिस्प्ले बोर्ड पर अंधेरा छाया रहता है या फिर गलत जानकारी दिखती है. इससे पूरे प्लेटफॉर्म पर भगदड़ और अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है.
अमृत भारत योजना के वादों के बीच दावों की खुली पोल
ठाकुरगंज रेलवे स्टेशन को अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत आधुनिक सुविधाओं से लैस करने की सूची में शामिल किया गया है. योजना का मुख्य मकसद स्टेशन परिसर को आकर्षक बनाने के साथ-साथ डिजिटल इंडिकेटर, कोच डिस्प्ले बोर्ड और अत्याधुनिक यात्री सुविधाएं प्रदान करना है ताकि यात्रियों को कोई असुविधा न हो. लेकिन जमीनी धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आती है. लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके प्लेटफॉर्म पर लगाए गए डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड सिर्फ शोपीस बनकर रह गए हैं. जब ट्रेन स्टेशन पर आती है, तब यह बोर्ड चालू ही नहीं रहते. ऐसे में सवाल उठता है कि जब जरूरत के वक्त यह उपकरण यात्रियों के काम ही न आएं, तो इतनी भारी-भरकम राशि खर्च करने का आखिर क्या फायदा हुआ.
बुजुर्गों, महिलाओं और मासूम बच्चों पर पड़ता है सीधा असर
ट्रेन आने के समय कोच इंडिकेटर का चालू न होना कोई मामूली तकनीकी खराबी नहीं है, बल्कि यह सैकड़ों यात्रियों की परेशानी से जुड़ा एक बड़ा मानवीय पहलू है. सोचिए कि हाथों में भारी-भरकम सूटकेस और बैग थामे, साथ में छोटे-छोटे रोते बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता को लेकर प्लेटफॉर्म पर दौड़ना कितना कष्टदायी होता है. जब ट्रेन के आने का अनाउंसमेंट होता है और डिस्प्ले बोर्ड पर कोच का नंबर नहीं दिखता, तो यात्री बेतहाशा एक छोर से दूसरे छोर तक भागने को मजबूर हो जाते हैं. रिजर्व कोच में बुकिंग कराने के बावजूद अपनी बोगी ढूंढने के चक्कर में कई बार यात्रियों की ट्रेन छूटने की नौबत आ जाती है. विशेषकर महिलाओं और दिव्यांगजनों के लिए यह स्थिति बेहद खौफनाक और तनावपूर्ण बन जाती है.
क्या सो रहे हैं जिम्मेदार रेलवे अधिकारी और सुरक्षा एजेंसियां
ठाकुरगंज स्टेशन पर फैली इस अव्यवस्था ने रेलवे प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. आखिर स्टेशन पर तैनात जिम्मेदार अधिकारियों की नजर इन बंद पड़े डिस्प्ले बोर्ड पर क्यों नहीं पड़ती. क्या इन उपकरणों की कार्यप्रणाली की कोई नियमित जांच या मेंटेनेंस नहीं होता. जब ट्रेन के आगमन के समय कोच की सही स्थिति की जानकारी ही स्क्रीन पर उपलब्ध नहीं रहती, तो इस लापरवाही का जिम्मेदार कौन है. कागजों में तो आधुनिकता की तारीफें बटोरी जा रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर यात्रियों की सुविधाओं की निगरानी करने वाला कोई नहीं दिखता.
Thakurganj Railway Station Coach Display Board: कागजी दावों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने की मांग
ठाकुरगंज और आसपास के क्षेत्र के लोगों तथा नियमित रेल यात्रियों की मांग है कि अमृत भारत योजना केवल विज्ञापनों और सरकारी कागजों तक सीमित न रहे. सुविधाएं ऐसी होनी चाहिए जो जरूरत पड़ने पर वास्तव में काम आएं. अब गेंद पूरी तरह से रेलवे प्रशासन और संबंधित रेल मंडल के पाले में है. स्थानीय यात्रियों ने मांग उठाई है कि वरीय अधिकारी तुरंत ठाकुरगंज स्टेशन का जायजा लें और कोच डिस्प्ले बोर्ड की तकनीकी खराबी को दुरुस्त कराकर इसे नियमित रूप से चालू रखना सुनिश्चित करें. जब तक यात्रियों को रियल टाइम और सटीक जानकारी नहीं मिलेगी, तब तक अमृत भारत स्टेशन योजना का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा.
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