लाखों रुपयों की किताबें हो रही बेकार
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :22 Nov 2016 6:50 AM (IST)
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उदासीनता. स्वर्णिम अतीत से स्याह भविष्य की ओर जा रहा जन पुस्तकालय पुस्तकालय प्रतिनिधियों एवं अपने उपयोगकर्ता पाठकों शुभचिंतकों की उपेक्षा के कारण आठ आठ आंसू बहा रहा है. जिले के सांस्कृतिक धरोहर के रूप में ख्याति प्राप्त परबत्ता प्रखंड के इस पुस्तकालय का हाल बेहाल है. परबत्ता : प्रखंड के माधवपुर पंचायत अंतर्गत स्थित […]
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उदासीनता. स्वर्णिम अतीत से स्याह भविष्य की ओर जा रहा जन पुस्तकालय
पुस्तकालय प्रतिनिधियों एवं अपने उपयोगकर्ता पाठकों शुभचिंतकों की उपेक्षा के कारण आठ आठ आंसू बहा रहा है. जिले के सांस्कृतिक धरोहर के रूप में ख्याति प्राप्त परबत्ता प्रखंड के इस पुस्तकालय का हाल बेहाल है.
परबत्ता : प्रखंड के माधवपुर पंचायत अंतर्गत स्थित जन पुस्तकालय स्वर्णिम अतीत को अपने आंचल में समेटे हुए है. लेकिन यह पुस्तकालय प्रतिनिधियों एवं अपने उपयोगकर्ता पाठकों शुभचिंतकों की उपेक्षा के कारण आठ आठ आंसू बहा रहा है. जिले के सांस्कृतिक धरोहर के रूप में ख्याति प्राप्त परबत्ता प्रखंड के इस पुस्तकालय का हाल बेहाल है. वर्ष 1954 में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ कृष्ण सिंह के द्वारा उद्घाटन किये जाने के बाद राज्य तथा देश के महान विभूतियों ने इस पुस्तकालय का दौरा किया. इन दौरों की निशानियां आज भी पुस्तकालय के अतिथि संवाद पुस्तिका में दर्ज है.
बिहार के तत्कालीन वित्त मंत्री अनुग्रह नारायण सिंह, तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद के सचिव व परबत्ता के प्रथम विधायक त्रिवेणी कुंवर, मुंगेर के तत्कालीन जिला पदाधिकारी राफेउल होदा, कैलाश झा आदि ने पुस्तकालय का दौरा किया और अपने अतिथि आगमन पुस्तिका में अपने बहुमूल्य शब्द अंकित किये. इस पुस्तकालय को अपना भवन, बड़ा सा परिसर, वाचनालय तथा बड़ा कुंआं है. पुस्तकालय का बहुमूल्य फर्नीचर रख रखाव के अभाव में दीमक की भेंट चढ़ रही है. कीमती और महत्वपूर्ण पुस्तकें भी खराब होने के कगार पर हैं. इसमें पवित्र वेद, पुराण, कल्याण, रामायण, महाभारत, गांधी साहित्य, हिन्दी साहित्य के अलावा स्थानीय सैनिक उमेश प्रसाद सिंह के द्वारा दिया गया वह पवित्र कुरान शामिल है जो उन्होंने 1971 में हुए भारत पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान के सीमावर्ती गांव से लाया था. अब इंन्टरनेट तथा केवल टीवी के इस दौर में इस पुस्तकालय की तरफ कोई झांकने भी नहीं आता है. इससे पूर्व पिछली बार वर्ष 1997 में तत्कालीन जिला शिक्षा पदाधिकारी ने यहां का दौरा कर हाल जानने का प्रयास किया था. इसके बाद किसी ने इस पुस्तकालय की ओर अपना रुख नहीं किया. माधवपुर के लोग अभी भी इसकी साफ सफाई तथा देख रेख नि:शुल्क करते हैं. विभिन्न पवित्र धर्मग्रंथों तथा लाखों रुपयों के मूल्य के ऐतिहासिक पुस्तकें बर्बाद होने के कगार पर हैं.
स्थानीय समाजसेवी डॉ सुखदेव सिंह द्वारा स्थापित इस पुस्तकालय को पूर्व में बिहार सरकार के द्वारा अनुदान भी दिया जाता था. लेकिन कालांतर में यह पुस्तकालय सरकार तथा जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का शिकार बन कर अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है. ज्ञान और साम्प्रदायिक सद्भाव का यह मंदिर अपने सुनहरे अतीत पर गर्व करता हुआ स्याह भविष्य की ओर अग्रसर है.
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