अब सहरी के लिए मोबाइल बना सहारा

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भभुआ सदर : ”उठो ऐ मोमिनो माहे रमजान आ गया, रहमतो का मगफिरतो का महीना आ गया” रमजान के रातों में गूंजनेवाले ये सदा मोबाइल की दुनिया अब खामोश हो गयी है. रमजान का महीना आते ही गांव से लेकर शहर तक में आधी रात के बाद मोमिनो का काफिला निकला करता था. ठेले व […]

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भभुआ सदर : ”उठो ऐ मोमिनो माहे रमजान आ गया, रहमतो का मगफिरतो का महीना आ गया” रमजान के रातों में गूंजनेवाले ये सदा मोबाइल की दुनिया अब खामोश हो गयी है. रमजान का महीना आते ही गांव से लेकर शहर तक में आधी रात के बाद मोमिनो का काफिला निकला करता था. ठेले व रिक्शे पर निकाले गये काफिले की सुरीली आवाज में रमजान की अजमत बयान करते तराने सुन कर रोजेदार नींद से जग कर सहरी की तैयारी में जुट जाते थे.
घर-घर जाकर जगाने का कार्य काफिला करता था. मुहल्ले में कुछ लोगों की टोली बनती थी. जो पूरे महीने इस काम को बड़ी जिम्मेदारी से पूरा करती थी. लेकिन, बदलते समय की आधुनिकता ने इस उल्लासवाले कार्य को पूरी तरह से निगल लिया. अब इसकी सदा नहीं सुनायी देती. शहर के छावनी मुहल्ला निवासी 60 वर्षीय खलीली राइन कहते हैं कि रात को जब काफिला निकलता था तो लोग इसका इंतजार करते थे.
जैसे-जैसे लोगों के हाथों में मोबाइल आता गया, लोग सेहरी के लिए जगानेवाली सदाएं भुलते गये. मोबाइल की आदत ने जिंदगी से मिठास को दूर कर दिया है. रमजान में भी अब अधिकतर इसी मोबाइल पर निर्भर हो गये हैं. सहरी में उठने के लिए लोग अब अधिकतर इसी का प्रयोग कर रहे हैं. मोबाइल के अलार्म के सहारे ही इनकी नींद खुल रही है.
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