कई वर्ष बाद रोहिणी नक्षत्र और वृष लग्न का मिलेगा संयोग
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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कल साधुओं का व्रत सोमवार को
कई वर्ष बाद रोहिणी नक्षत्र और वृष लग्न का मिलेगा संयोग जहानाबाद : कृष्ण जन्माष्टमी को लेकर तैयारी शुरू हो गयी है. पर्व को लेकर बच्चों में जहां उत्साह है, वहीं ठाकुरबाड़ी और गोपाल मंदिरों में जन्मोत्सव को लेकर तैयारी शुरू कर दी गयी है. इस साल अद्भुत संयोग के बीच कान्हा का जन्म होगा. […]
जहानाबाद : कृष्ण जन्माष्टमी को लेकर तैयारी शुरू हो गयी है. पर्व को लेकर बच्चों में जहां उत्साह है, वहीं ठाकुरबाड़ी और गोपाल मंदिरों में जन्मोत्सव को लेकर तैयारी शुरू कर दी गयी है. इस साल अद्भुत संयोग के बीच कान्हा का जन्म होगा. भाद्रपद अष्टमी तिथि को श्रीकृष्ण के जन्म को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है. इस साल अष्टमी तिथि दो सितंबर को है. पर्व के बारे में ज्योतिषाचार्य पं उमेश गौड़ ने बताया कि इस बार कृष्ण के जन्म का अद्भुत संयोग बन रहा है. एक साथ अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और वृष राशि मिल रहे हैं, जो भगवान के जन्म का समय माना गया है. उन्होंने कहा कि कृष्ण का जन्म लग्न वृष है.
गृहस्थ रविवार को, साधु रखेंगे सोमवार को व्रत
रविवार की रात्रि वृष लग्न 10:07 बजे से 12:03 तक है, वहीं रोहिणी नक्षत्र रविवार की शाम 6:29 से अगले दिन 5:34 बजे तक है. जबकि, अष्टमी तिथि 5:08 से अगले दिन 3:23 तक है. ऐसे में यह पावन पर्व रविवार को शुभ है. उन्होंने कहा कि गृहस्थ रविवार को पर्व करेंगे. चूंकि मंदिर-मठों में उदयाकालिन व्रत किया जाता है, इसलिए साधु-संत सोमवार को व्रत करेंगे. इस बार त्रिपुष्कर योग बन रहा है, इसलिए यह व्रत सबके लिए खास है. यदि घर में कान्हा की पुरानी मूर्तियां हैं तो जन्माष्टमी के दिन उनकी भी पूजा कर माखन-मिसरी का भोग लगाएं. भगवान हरि विष्णु को तुलसी बहुत प्रिय है. विष्णु पुराण के अनुसार भगवान के भोग में तुलसी का पत्ता अवश्य होना चाहिए. इसलिए भोग में तुलसी जरूर डालें.
पूजा का शुभ मुहूर्त
जन्माष्टमी के दिन निशिता पूजा का समय : 23:57 से 24:43+ तक
जन्माष्टमी में मध्यरात्रि का क्षण : 24:20+
तीन सितंबर को पारण का सम : 08:05 के बाद
पारण के दिन अष्टमी तिथि के समाप्त होने का समय : 19:19
पारण के दिन रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने का समय : 20:05
वैष्णव कृष्ण जन्माष्टमी : तीन सितंबर, 2018
वैष्णव जन्माष्टमी के लिए अगले दिन का पारण समय : 06:04 (सूर्योदय के बाद)
पारण के दिन अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्योदय से पहले समाप्त हो जायेंगे.
क्यों मनायी जाती है जन्माष्टमी
आचार्य अरुण कुमार मिश्रा की मानें तो कंस की एक बहन थी, जिसका नाम देवकी था. कंस देवकी से बहुत स्नेह करता था. देवकी का विवाह यदुवंशी राजकुमार वसुदेव से हुआ. विवाह के पश्चात वे दोनों घर ही आ रहे थे कि अचानक आकाशवाणी हुई, जिसमें कहा गया कि देवकी की आठवीं संतान ही कंस का वध करेगा. ऐसा सुनकर कंस ने बहन को मारने के लिए तलवार निकाल लिया. वसुदेव ने उसे शांत किया और वादा किया कि वे अपने सारे पुत्र उसे सौंप दिया करेंगे.
इसके बाद वासुदेव ने देवकी से जन्म लेने वाले सभी संतानों को कंस के हवाले करने का वचन दिया. इसके बाद एक-एक कर सात बच्चों को मारने के बाद आठवें पुत्र के रूप में श्रीहरि ने स्वयं देवकी के उदर से पूर्णावतार लिया तथा योगमाया को यशोदा के गर्भ से जन्म लेने का आदेश दिया. श्रीकृष्ण जन्म लेकर, देवकी तथा वसुदेव को अपने विराट रूप का दर्शन देकर, पुन: एक साधारण बालक बन गये. यह अवतार उन्होंने भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधी रात में लिया था. तभी से इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाने लगा.
बताते हैं रंगरामानुजाचार्य जी महाराज
हुलासगंज. लक्ष्मीनारायण मंदिर के मठाधीश स्वामी रंगरामानुजाचार्यजी महाराज ने बताया कि जन्माष्टमी व्रत तीन सितंबर (सोमवार) को मनाया जायेगा. श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मास, पक्ष, तिथि, नक्षत्र आदि पर विचार करके निर्णय लिया गया है कि भाद्रपद कृष्ण पक्ष सर्वमान्य है. उन्होंने बताया कि अष्टमी तिथि सप्तमी विद न हो तथा रोहिणी कृतिका विद न हो. अगर अष्टमी के दिन सूर्याेदय का सप्तमी और रोहिणी से पहले कृतिका हो तो उस दिन वैष्णव को व्रत नहीं करना चाहिए. संयोग से इस वर्ष दो सितंबर को भाद्रपद कृष्ण पक्ष सप्तमी के बाद अष्टमी आता है. उसी तरह कृतिका के बाद रोहिणी नक्षत्र आता है. ऐसे में तीन सितंबर को शुद्ध अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र है. इसी दिन कृष्ण जन्माष्टमी मनाना श्रेष्ठकर होगा.
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