हाजीपुर में 191 साल पुरानी बड़ी दुर्गा पूजा की धूम, 1835 से चली आ रही परंपरा आज भी बरकरार

Updated:
विज्ञापन

संस्कृत महाविद्यालय परिसर में बन रहा पंडाल

WhatsApp चैनल से जुड़ेंगूगल पर प्रभात खबर चुनें

हाजीपुर में 1835 से 191 साल पुरानी बड़ी दुर्गा पूजा का उत्सव 1835 से जारी है. जानें इस ऐतिहासिक परंपरा और इस साल की खास सजावट के बारे में.

विज्ञापन

Navratri Hajipur: शहर में शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं. विभिन्न पूजा समितियों के सदस्य और श्रद्धालु आयोजन को भव्य बनाने में जुटे हैं. शहर के राजेंद्र चौक, सुभाष चौक, स्टेशन चौक, अनवरपुर चौक, डाकबंगला रोड, गांधी चौक, कौनहारा घाट रोड, जौहरी बाजार, बागमली, अंजानपीर चौक, पासवान चौक, दिग्घी, हथसारगंज, जढुआ, रामजीवन चौक और युसुफपुर सहित कई इलाकों में पूजा की तैयारियां चल रही हैं.

विज्ञापन

पूजा पंडालों के निर्माण में कारीगर दिन-रात जुटे हैं, वहीं मूर्तिकार देवी प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में लगे हैं. इस बार विभिन्न स्थानों पर भव्य और आकर्षक पंडाल बनाए जा रहे हैं. इनमें श्रद्धालुओं को देश के कई प्रसिद्ध मंदिरों की प्रतिकृतियां देखने को मिलेंगी.

मां कूष्मांडा की पूजा-अर्चना में जुटे श्रद्धालु

शारदीय नवरात्र के चौथे दिन भक्तों और साधकों ने देवी भगवती के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कूष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी. इसी कारण उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति या आदिस्वरूपा कहा जाता है.

आचार्य सुमंत तिवारी ने बताया कि मां कूष्मांडा अष्टभुजा हैं, यानी उनकी आठ भुजाएं हैं. उनके सात हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत से भरा कलश, चक्र और गदा होते हैं, जबकि आठवें हाथ में जपमाला रहती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, उनका निवास सूर्यमंडल के भीतर है, जहां से वे सूर्यलोक को ऊर्जा प्रदान करती हैं.

मान्यता है कि मां कूष्मांडा की उपासना करने से भक्तों को आयु, यश, बल और आरोग्य की प्राप्ति होती है. नवरात्र के दौरान मंदिरों और पूजा स्थलों में देवी की आराधना के लिए श्रद्धालु पहुंच रहे हैं.

1835 में हुई थी हाजीपुर में दुर्गा पूजा की शुरुआत

हाजीपुर शहर में दुर्गा पूजा की परंपरा करीब 191 साल पुरानी बताई जाती है. जानकारों के अनुसार, वर्ष 1835 में कौनहारा घाट पर दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई थी. शहर में मां दुर्गा की पहली प्रतिमा स्थापित होने के कारण यह स्थान बड़ी दुर्गा पूजा के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

इसके बाद मस्जिद चौक पर दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई, जिसे छोटी दुर्गा पूजा के नाम से जाना जाता है. दोनों स्थानों पर पूजा के दौरान एक ही रूप-रंग की दो मंजिली प्रतिमाएं बनाई जाती हैं. हालांकि, प्रतिमाओं के आकार में अंतर होता है. कौनहारा घाट पर बड़ी प्रतिमा और मस्जिद चौक पर अपेक्षाकृत छोटी प्रतिमा स्थापित की जाती है.

छह पीढ़ियों से प्रतिमा निर्माण कर रहा मूर्तिकार परिवार

कौनहारा घाट स्थित बड़ी दुर्गा पूजा की एक खास परंपरा प्रतिमा निर्माण से भी जुड़ी है. यहां गोरौल प्रखंड के मजिया गांव का एक मूर्तिशिल्पी परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी देवी प्रतिमाओं का निर्माण करता आ रहा है. इस परिवार की छठी पीढ़ी भी इस बार बड़ी दुर्गा की प्रतिमा को आकार देने में जुटी है.

बड़ी दुर्गा पूजा स्थल लंबे समय से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है. दशहरे के अवसर पर शहर आने वाले अनेक श्रद्धालु यहां दर्शन करने पहुंचते हैं. पूजा समिति के सदस्य भी आयोजन को भव्य बनाने के लिए तैयारियों में जुटे हुए हैं.

एलईडी लाइट की सजावट होगी खास आकर्षण

कौनहारा घाट की बड़ी दुर्गा पूजा में इस बार एलईडी लाइट की विशेष सजावट आकर्षण का केंद्र रहेगी. वहीं, शहर के अन्य पूजा स्थलों पर भी आकर्षक पंडाल और साज-सज्जा की तैयारी चल रही है. पूजा समितियां श्रद्धालुओं के लिए भव्य आयोजन की तैयारियों में लगी हैं.

यह भी पढ़ें... सीतामढ़ी: चोरौत में पॉल्ट्री फार्म से मुर्गा और गल्ले से नकदी चुराने वाले दो शातिर गिरफ्तार

आपके शहर में

विज्ञापन

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन