खुले पड़े यार्ड में ट्रेनों की सुरक्षा दांव पर
Updated at : 07 Sep 2019 1:27 AM (IST)
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महानगरों के लिए रवाना होतीं महत्वपूर्ण ट्रेनें माओवाद प्रभावित इलाका रहा है जिला, आतंकी घटनाओं से जुड़ते रहे हैं तार आरपीएफ के एक जवान के भरोसे एक किमी लंबे यार्ड की सुरक्षा का भार दरभंगा : नये संशोधन की वजह से भले ही दरभंगा जंक्शन का ग्रेड बदल गया हो, लेकिन अभी भी समस्तीपुर रेल […]
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महानगरों के लिए रवाना होतीं महत्वपूर्ण ट्रेनें
माओवाद प्रभावित इलाका रहा है जिला, आतंकी घटनाओं से जुड़ते रहे हैं तार
आरपीएफ के एक जवान के भरोसे एक किमी लंबे यार्ड की सुरक्षा का भार
दरभंगा : नये संशोधन की वजह से भले ही दरभंगा जंक्शन का ग्रेड बदल गया हो, लेकिन अभी भी समस्तीपुर रेल मंडल का सर्वाधिक राजस्व देनेवाला स्टेशन होने के नाते इसकी अहमियत सबसे अधिक है. हालांकि यह भी इतना ही सही है कि रेल प्रशासन यहां यात्री सुविधा उपलब्ध कराने के नजरिये से इसको उस अनुपात में तवज्जो नहीं देता.
यात्री सुविधा के प्रति उदासीनता ही नहीं सुरक्षा के प्रति भी विभाग लापरवाह है, वर्ना एक दशक पूर्व बर्निंग ट्रेन बनी बागमती एक्सप्रेस की घटना के बाद भी यार्ड खुला पड़ा नहीं रहता. यह मुद्दा स्थानीय रेल महकमा से लेकर आम यात्रियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है.
जंक्शन के उत्तर करीब एक किमी में यार्ड फैला हुआ है. इस बीच दो-दो वाशिंग पिट हैं. यार्ड से सटे उत्तर बेला गुमटी के पास रेक प्वाइंट भी है, जहां महीने में 10 से 15 रेक पहुंचते हैं. इतने बड़ा यार्ड दोनों तरफ (पूरब-पश्चिम) से खुला पड़ा है. इससे होकर आम राहगीर आते-जाते हैं. इससे स्थिति और विकट है.
मालूम हो कि शहर को रेल लाइन दो भागों में बांटती है. लाइन से पूरब शहर की बड़ी आबादी निवास करती है. जंक्शन तथा यार्ड के पूरब के अधिकांश मुहल्लेवासी लाइन पार कर आवागमन करते हैं. इसे देखते हुए रेलवे ने कटहलवाड़ी गुमटी पर रोड ओवर ब्रिज (आरओबी) का निर्माण करा दिया. आमजन के आवागमन के लिए पुल पर दोनों तरफ सीढ़ियां भी बना दी, बावजूद लोग पुल के नीचे से लाइन पार कर ही आते-जाते हैं. इस बीच वाशिंग के लिए तथा वाशिंग के बाद गणतव्य के लिए प्रस्थान करने से पूर्व लंबी दूरी की ट्रेनों के रेक लगे रहते हैं.
मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, कोलकाता, पुणे, अहमदाबाद, अमृतसर, वाराणसी सरीखे सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण शहरों के लिए गाड़ियां इस यार्ड में खड़ी रहती हैं. इतने लंबे यार्ड में एक से दो आरपीएफ के जवान की ड्यूटी लगायी जाती है. ऐसे में अगर कोई रेल संपत्ति की चोरी करता नजर भी आता है, तो चाह कर भी जवान कुछ खास नहीं कर पाता.
कारण जब तक जवान पहुंचता है, तब तक अपराधी उसकी पहुंच से दूर निकल चुका होता है. ऐसे में अगर किसी दिन ट्रेन में कुछ विस्फोटक रख दिये जायें तो कोई आश्चर्य नहीं. गौरतलब है कि यह इलाका माओवादी प्रभावित क्षेत्र रहा है. दूसरी ओर नेपाल की सीमा से सटा भी हुआ है. देश के विभिन्न हिस्सों में होनेवाली आतंकी घटनाओं से भी इस इलाके का तार जुड़ते रहने से यह क्षेत्र और भी संवेदनशील है.
जानकार बताते हैं कि नियमत: पूरा यार्ड पैक होना चाहिए. यानी बंद होना चाहिए. दोनों तरफ उंची दीवारों के साथ किसी के प्रवेश पर रोक के लिए कटीले तार भी लगाया जाना जरूरी होता है. दीवारों की उंचाई इतनी होनी चाहिए कि कोई एक तरफ से दूसरी तरफ आ-जा नहीं सके. सूत्रों की मानें तो इसके लिए आरपीएफ की ओर से विभाग को कई बार पूर्व में लिखा भी गया, लेकिन आज तक धरातल पर कुछ नहीं हुआ. अब देखना है कि संपर्क क्रांति के बर्निंग ट्रेन बनने के बाद महकमा संजीदा होता है, या इस घटना की जांच के बाद फिर से प्रशासन इससे बेफिक्र हो जाता है.
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