सदर अस्पताल में ट्रॉमा सेंटर होता, तो बच जातीं कई जानें

Published at :09 Apr 2015 6:47 AM (IST)
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सदर अस्पताल में ट्रॉमा सेंटर होता, तो बच जातीं कई जानें

कु व्यवस्था : ट्रॉमा सेंटर नहीं रहने के कारण घायल को रेफर किया जाता है पटना या बनारस जिले में ट्रॉमा सेंटर का अभाव है, जिस कारण सड़क हादसे या प्राकृतिक आपदा में गंभीर रूप से घायल लोगों की मौत होने का सिलसिला थम नहीं रहा है. यहां उचित इलाज की व्यवस्था न होने से […]

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कु व्यवस्था : ट्रॉमा सेंटर नहीं रहने के कारण घायल को रेफर किया जाता है पटना या बनारस
जिले में ट्रॉमा सेंटर का अभाव है, जिस कारण सड़क हादसे या प्राकृतिक आपदा में गंभीर रूप से घायल लोगों की मौत होने का सिलसिला थम नहीं रहा है. यहां उचित इलाज की व्यवस्था न होने से घायलों को पटना या बनारस रेफर किया जाता है. ज्यादा दूरी के कारण इनमें से ज्यादातर लोगों की मौत रास्ते में ही हो जाती है. आखिर यहां क्यों ट्रॉमा सेंटर की व्यवस्था नहीं है, इसका जवाबदेह कौन है-यहां के प्रशासन.
बक्सर : बक्सर जिले में ट्रॉमा सेंटर का अभाव है. हादसे रोज होते हैं, मगर त्वरित इलाज नहीं हो पाता, जिस कारण जिले में असामयिक मौतों का सिलसिला नहीं रूक पा रहा है. पूरे जिले में अनियंत्रित गाड़ियां, ओवरलोडिंग गाड़ियां, बाइक पर तीन सवार और कारों में सुरक्षा बेल्ट नहीं लगाने और ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करने के कारण लगातार घटनाएं घट रही हैं. हादसों के शिकार लोग बेहतर चिकित्सा के लिए या तो पटना जाते हैं या फिर पड़ोस के राज्य उत्तरप्रदेश के बनारस जिले में जाते हैं. जो गरीब-गुरबा होते हैं, उन्हें सदर में अस्पताल लाया जाता है और वहीं इलाज होता है.
घायलों की होती है इलाज
ट्रॉमा सेंटर में इलाज मात्र दुर्घटनाग्रस्त लोगों की होती है, जिसमें विशेषज्ञ चिकित्सक एवं कर्मी मौजूद होते हैं. सजर्री के विशेषज्ञ चिकित्सक का रहना ट्रॉमा सेंटर में जरूरी होता है. साथ ही ऑपरेशन थियेटर भी अत्याधुनिक संसाधनों से लैस होना जरूरी होता है, तभी दुर्घटना के मरीजों का बेहतर इलाज संभव हो सकता है. अगर बक्सर और आसपास के क्षेत्रों में ट्रॉमा सेंटर बेहतर हो, तो निश्चित रूप से हादसे में मरनेवालों की संख्या काफी कम हो जायेगी.
कैसे होने चाहिए कर्मी
ट्रॉमा सेंटर में दुर्घटना से पीड़ित लोग ही पहुंचते हैं. इसलिए ट्रॉमा सेंटर में विशेषज्ञ सजर्न की मौजूदगी आवश्यक होती है. साथ ही कर्मी भी पूर्णत: प्रशिक्षित होना चाहिए, जिससे कि गंभीर स्थिति में पहुंचे पीड़ितों के शीघ्र इलाज में अपना हाथ बटा सके. ट्रॉमा सेंटर के कर्मी को 24 घंटे सेवा के लिए तैयार होना होता है. हड्डी रोग विशेषज्ञ भी अति आवश्यक होता है.
आइसीयू वार्ड
प्रत्येक ट्रॉमा सेंटर में आइसीयू की व्यवस्था होनी चाहिए. ऐसे सेंटरों पर गंभीर स्थिति के मरीज ही पहुंचते हैं. जिनको बेहतर एवं तुरंत चिकित्सा सेवा की आवश्यकता होतीहै. इस केंद्र पर पहुंचनेवाले मरीजों के जीवन का खतरा बहुत ज्यादा होती है. इसलिए संक्रमण रहित आइसीयू वार्ड जरूरी है.
जांच केंद्र
गंभीर हालत में पहुंचे मरीजों की जांच के लिए अल्ट्रासाउंड,एक्स-रे एवं सिटी स्कैन की व्यवस्था होती है, जिससे कि मरीज को कम समय में जांच के साथ बेहतर इलाज मिल सके.
ऑपरेशन थियेटर
विशेष मानक स्तर का होना चाहिए. इसे समयानुसार आधुनिकतम तकनीक से सुसज्जित होना चाहिए. 24 घंटे कर्मी व संबंधित विशेषज्ञ चिकित्सक एवं हड्डी रोग विशेषज्ञ को आकस्मिक सेवा के लिए तत्पर रहना चाहिए. सदर अस्पताल में कार्यरत चिकित्सक डॉ राजेश कुमार ने बताया कि यह आकस्मिक सेवा अस्पताल होता है. ऐसे सेंटर के कर्मी को 24 घंटे सेवा के लिए तत्पर रहना होता है. अन्य सुविधाओं के साथ ब्लड चढ़ाने एवं ब्लड बैंक की व्यवस्था होती है. ऐसे सेंटर पर आनेवाले मरीजों की हालत गंभीर होती है, जिसको बचाना चिकित्सकों के लिए चुनौती होती है.
सांसद ने उठाया संसद में मामला
बक्सर के सांसद अश्विनी कुमार चौबे ने सड़क दुर्घटनाओं में लगातार हो रही मौतों को लेकर बीते संसद सत्र में बक्सर जिले में ट्रॉमा सेंटर खोलने की मांग की. इसके लिए उन्होंने कहा कि बक्सर जिले में ट्रॉमा सेंटर न रहने से लोगों को पटना और बनारस ले जाना पड़ता है और लंबी दूरी के कारण घायलों की मौत रास्ते में ही हो जाती है. ध्यान आकृष्ट करते हुए कई एनएच से जुड़े बक्सर में ट्रॉमा सेंटर खोलने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव डाला.
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