1930 से ही बक्सर सेंट्रल जेल में बन रहा फांसी का फंदा
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 08 Jan 2020 6:17 AM
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बक्सर : बक्सर में फांसी की रस्सियां 1930 से बनायी जा रही हैं. यहां बनी रस्सी से जब भी फांसी दी गयी तो वो कभी फेल नहीं हुई. दरअसल ये जो रस्सी होती है, ये खास तरह की होती है. इसे मनीला रोप या मनीला रस्सी कहते हैं. माना जाता है कि इससे मजबूत रस्सी […]
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बक्सर : बक्सर में फांसी की रस्सियां 1930 से बनायी जा रही हैं. यहां बनी रस्सी से जब भी फांसी दी गयी तो वो कभी फेल नहीं हुई. दरअसल ये जो रस्सी होती है, ये खास तरह की होती है. इसे मनीला रोप या मनीला रस्सी कहते हैं. माना जाता है कि इससे मजबूत रस्सी होती ही नहीं.
इसीलिए पुलों को बनाने, भारी बोझों को ढोने और भारी वजन को लटकाने में इसी का इस्तेमाल किया जाता है. चूंकि ये रस्सी सबसे पहले फिलिपींस के एक पौधे से बनाये गये थे. लिहाजा इसका नाम मनीला रोप या मनीला रस्सी पड़ा. ये खास तरह की गड़ारीदार रस्सी होती है.
पानी से इस पर कोई असर नहीं पड़ता बल्कि ये पानी को सोख लेती है. इससे लगायी गयी गांठ पुख्ता तरीके से अपनी पकड़ को दमदार बनाकर रखती है. गत कुछ दशकों में देश में जहां कभी भी फांसी हुई है. वहां फांसी का फंदा बनाने के लिए रस्सी बक्सर जेल से ही गयी है.
चाहे वो अजमल कसाब को पुणे जेल में दी गयी फांसी हो या फिर वर्ष 2004 में कोलकाता में धनजंय चटर्जी को दी गयी फांसी. अफजल गुरु को भी फांसी बक्सर जेल की ही रस्सी से दी गयी.
क्लाइमेट भी यहां की रस्सी को बनाती है दमदार
बक्सर जेल में इस तरह की रस्सी बनानेवाले एक्सपर्ट हैं. यहां के कैदियों को भी इसे बनाने का हुनर सिखाया जाता है. यहां के खास बरामदे में इसे बनाने का काम किया जाता है. पहले तो रस्सी बनाने के लिए जे-34 कॉटन यार्न खासतौर पर भटिंडा पंजाब से मंगाया जाता था, लेकिन अब इसे गया या पटना से ही प्राइवेट एजेसियां सप्लाइ करती हैं.
कहा जाता है कि जेल के करीब गंगा नदी के बहने से वहां से आनेवाली आर्द्रता भी इसकी मजबूती और बनावट पर खास असर डालती है.
रस्सी में होता है कई चीजों का इस्तेमाल
फांसी के लिए रस्सी को और खास तरीके से बनाते हैं. इसमें मोम का भी इस्तेमाल करते हैं. इसको बनाने में सूत का धागा, फेविकोल, पीतल का बुश, पैराशूट रोप का भी इस्तेमाल होता है. जेल के अंदर एक पावरलुम मशीन लगी है, जो धागों की गिनती कर अलग-अलग करती है. एक फंदे में 72 सौ धागों का इस्तेमाल होता है.
7200 धागों से तैयार की जाती है रस्सी
फांसी के फंदेवाली रस्सी आज भी पंजाब में उत्पादित होने वाली जे-34 गुणवत्ता वाली रूई के सूत से तैयार की जाती है. इसमें चार बंच होते हैं. एक में 900 धागे होते हैं. कुल 7200 धागों से रस्सी तैयार की जाती है.
रस्सी निर्माण के बाद जेल में ही बनी विशेष रॉड में 100 किलो वजन का सामान बांधा जाता है और झटके से गिराकर इसका परीक्षण किया जाता है. यह देखा जाता है कि निर्धारित वजन रस्सी उठा पा रही है या नहीं. इसका वजन 3 किलो 950 ग्राम और लंबाई 60 फुट होती है.
इस रस्सी की क्षमता 184 किलो वजन उठाने की होती है. जेल सूत्रों की मानें तो इस रस्सी की कीमत 1725 रुपये है, लेकिन कच्चे धागे की कीमतों में वृद्धि और उसके इस्तेमाल किये जाने वाले पीतल के खास बुश का भी रेट ज्यादा होने से कीमत में इजाफा किया जायेगा. रस्सी तैयार होने के बाद इसे सील पैक कर भेज दिया जाता है.
इस्तेमाल होने से पहले इसमें पका केला रगड़कर मस्टर्ड ऑयल में डुबाया जाता है, जिससे यह रस्सी बहुत मुलायम हो जाती है.
निर्भया के दोषियों को डेथ वारंट पर महिलाओं में खुशी
दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट ने निर्भयाकांड के दोषियों को डेथ वारंट जारी कर दिया है. ऐसे में 22 जनवरी को फांसी दिया जाना तय है. जिले की महिलाओं में इसकी सूचना पर हर्ष है और इस फैसले का सबने प्रशंसा और सराहना की. प्रभात खबर अखबार ने इस विषय पर महिलाओं से उनका राय जाना.
बहुत अच्छा फैसला है. देर से ही सही परंतु दुरुस्त फैसला आया है. ऐसे अपराधियों को खुले जगह पर फांसी दी जानी चाहिए. कानून के नजरिये में ऐसा प्रावधान नहीं है.
डॉ हींगमणि, पूर्व प्रधानाध्यापिका, बक्सर
संतोषजनक फैसला है. इस फैसले से निर्भया के मम्मी-पापा और हम सभी को खुशी है. यह बहुत जरूरी था. ऐसे अपराधियों के लिए केवल फांसी ही सजा हो सकती है.
यादव रंजना, अधिवक्ता
फैसले में थोड़ी देर हुई लेकिन सही फैसला आया है. हम सभी को इसी की उम्मीद थी. ऐसे फैसले से अपराधियों पर अंकुश लगेगा. यह फैसला स्वागत योग्य है.
शीला देवी, शिक्षिका
निर्भया के इस मामले में जो फैसला आया है. उससे सभी महिलाओं और छात्रों में खुशी है. अभी और ऐसे पीड़ितों के मामले हैं, जिनमें हम कोर्ट से ऐसे ही फैसले की उम्मीद करते हैं.
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