बगैर मानक दौड़ रहीं बसें

Published at :27 May 2017 8:14 AM (IST)
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बगैर मानक दौड़ रहीं बसें

आरा : भोजपुर जिले में यात्री बसों के परिचालन में नियमों की अनदेखी की जाती है. नियम कानून को ताक पर रखकर बसों और यात्री वाहनों का परिचालन होता है. सबसे बड़ी बात है कि सूबे में कोई बड़ी घटना होने के बाद भी सीख नहीं ली जाती है. नालंदा के हरनौत में हुए भीषण […]

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आरा : भोजपुर जिले में यात्री बसों के परिचालन में नियमों की अनदेखी की जाती है. नियम कानून को ताक पर रखकर बसों और यात्री वाहनों का परिचालन होता है. सबसे बड़ी बात है कि सूबे में कोई बड़ी घटना होने के बाद भी सीख नहीं ली जाती है. नालंदा के हरनौत में हुए भीषण बस हादसे के बाद भी जिले में नियम कानून को ताक पर रखकर यात्री वाहनों का परिचालन हो रहा है.
आलम यह है कि जिले में बगैर फिटनेस सर्टिफिकेट और सुरक्षा संसाधनों के ही यात्री बसें सड़कों पर दौड़ती हैं. इससे रोजाना यात्रा करने वाले हजारों लोगों की जिंदगी राम भरोसे रहती है. क्षेत्र में चलने वाली अधिकतर बसों में नियमों की अनदेखी हो रही है. कई बस संचालकों के पास बीमा और फिटनेस सर्टिफिकेट तक नहीं है.
बावजूद इसके बसों का परिचालन हो रहा है. परिवहन विभाग द्वारा ठोस कार्रवाई नहीं करने से सड़कों पर उम्र समाप्त हो चुकीं बसें दौड़ रहीं है, जिनसे यात्रियों की जान को खतरा बना रहता है. बसों की फिटनेस जांच नहीं होने से उम्र पूरा कर चुकीं वाहनों में सफर करने से दुर्घटनाएं होने पर यात्रियों की जान का खतरा बना रहता है. वहीं, एक दरवाजे वाली बसों में सफर आपातकाल स्थिति में असुविधाजनक बना हुआ है. बसों में आगजनी से बचाव के लिए अग्निशमन यंत्र भी नहीं लगे हैं. बसों में फर्स्ट एड बॉक्स तक नहीं होने से किसी भी यात्री के दुर्घटना होने पर उसे प्राथमिक उपचार भी नहीं मिल सकता है.
सरकारी बसों में भी नहीं होता है नियमों का पालन : सरकारी बसों में भी नियमों का पालन नहीं होता है. आरा से गुजरने वाली सरकारी बसों की भी हालत काफी खराब है. एक तो खटारा बसें, दूसरे नियम के अनुसार उसमें भी कोई व्यवस्था नहीं है.
कई राज्यों व ग्रामीण इलाकों के लिए चलती हैं 250 बसें
जिले में विभिन्न राज्यों के साथ ग्रामीण इलाकों के लिए लगभग 250 बसें रोजाना चलती है. इसमें से शायद ही किसी बस में नियमों का सौ फीसदी पालन किया जाता होगा. आरा से पटना, रांची, टाटा, बोकारो, मोहनियां, बक्सर, सासाराम, डेहरी, धनबाद, कोलकाता व वाराणसी जैसे शहरों के लिए लंबी रूट की बसें गुजरती हैं. लंबी दूरी की बसों में व्यवस्था के नाम पर स्थिति कुछ ठीक भी है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में चलने वाली बसों की हालत बद से बदतर है. शहर से जिले के अन्य प्रखंडों व बाजारों में पहुंचने के लिए बसें चलती हैं. इन बसों में प्रतिदिन हजारों यात्री सफर करते हैं. इन बसों में क्षमता से अधिक सवारियों को बैठाया जाता है.
महिला सीट का भी नहीं रखा जाता ध्यान
यात्री बसों में यात्रा करने के लिए महिलाओं को बैठने के लिए रिजर्व सीट देने का नियम है, जिससे महिलाएं सुविधा से अपनी यात्रा कर सकें, परंतु बसों में इसका पालन नहीं किया जाता है. नियमानुसार महिला सीट तो है, परंतु इनका लाभ महिलाओं को नहीं मिल पाता है. बस संचालक इन पर किसी भी व्यक्ति को बैठा देते हैं, चाहे महिलाएं खड़ी होकर ही क्यों न यात्रा करें.
छत पर भी लाद लिये जाते हैं यात्री
मुख्यालय से विभिन्न मार्गों पर बस संचालकों द्वारा ओवरलोड कर वाहनों का संचालन किया जा रहा है. परिवहन विभाग की गाइडलाइन के विपरीत चल रहे इन वाहनों पर संबंधित विभाग का नियंत्रण न होने से यात्रियों की जान-माल का खतरा हमेशा बना रहता है. यात्री वाहनों में बस, सीटी राइड, 407 या फिर कमांडर ही क्यों न हो, हर वाहन पर लोगों को छत पर भी लाद दिया जाता है.
जिला सड़क सुरक्षा समिति भी नहीं कर रही काम
जिले में सड़क सुरक्षा समिति भी निष्क्रिय बनी हुई है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के आलोक में 26 जून, 2016 को परिवहन विभाग के प्रधान सचिव ने सभी जिलों के डीएम को पत्र भेज कर जिला सड़क सुरक्षा समिति का गठन करने का निर्देश दिया था. सड़क हादसों व उससे होने वाली मौतों को मद्देनजर समिति का गठन करने को कहा गया था, जिसका पदेन अध्यक्ष डीएम हैं. प्रधान सचिव के आदेश में कहा गया था कि समिति की त्रैमासिक बैठक कर सड़क सुरक्षा की विभिन्न बिंदुओं पर समीक्षा की जाये. हालांकि जिले में समिति के द्वारा इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की जाती है.
किराया सूची नहीं होने से यात्रियों से होती है बहस
ग्रामीण इलाकों की ओर बसों के संचालन पर कोई ध्यान नहीं देने से बस मालिक अपनी मनमर्जी करते हैं. बसों में नियम का पालन नहीं होने से यात्रियों की फजीहत हो रही है. बसों में किराया सूची नहीं होने से कंडक्टर और यात्रियों के बीच बहस होना आम बात है. बहसबाजी ज्यादा होने से यात्रियों को बस से नीचे उतार दिया जाता है. कई बार तो किराया को लेकर विवाद यहां तक बढ़ जाता है कि बस में तोड़फोड़ तक कर दी जाती है.
ऐसे हो रहा है नियमों का उल्लंघन
ग्रामीण अंचलों में चल रही बसों में अधिकतर बसों में एक ही दरवाजा है
बसों पर न तो बीमा का उल्लेख है और न ही फिटनेस सर्टिफिकेट अंकित है
बसों के अंदर और गेट के पास किराया सूची भी नहीं लगी हुई है
बस ड्राइवर और कडंक्टर ड्रेस भी नहीं पहनते
बसों में आग से बचाव के लिए अग्निशमन यंत्र भी नहीं रखे हैं
महिला और बुजुर्गों के आरक्षित सीट का भी नहीं होता है पालन
यात्री बसों के लिए ये हैं जरूरी नियम
बसों में ड्राइवर की सीट के पीछे अग्निशमन यंत्र जरूरी है
32 सीटर या उससे अधिक सीटों वाली बसों में दो गेट होना आवश्यक
बस चलने के समय गेट का लॉक होना आवश्यक है
बस के आगे कांच पर बस का बीमा और फिटनेस सर्टिफिकेट की प्रति चस्पा होना अनिवार्य
बस के ड्राइवर और कंडक्टर को ड्रेस पहनना जरूरी
बसों में फर्स्ट एड बॉक्स का होना भी जरूरी
बस के रूट के अनुसार किराया सूची अंदर चस्पा होना चाहिए
आरा से इन जगहों के लिए खुलती हैं बसें
पटना, रांची, टाटा, बोकारो, मोहनियां, बक्सर, सासाराम, डेहरी, धनबाद, कोलकाता, वाराणसी
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