जुनून के सामने फीकी पड़ी उम्र, नौकरी छोड़ शुरू की समाजसेवा

Published at :21 Apr 2016 1:12 AM (IST)
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जुनून के सामने फीकी पड़ी उम्र, नौकरी छोड़ शुरू की समाजसेवा

क्या किया समाज में बदलाव नोकरी छोड़ समाजसेवा की ललक लिए गांव आते ही आहर सफाई ,सड़क भराई सहित ग्रामीण बुनियादी समस्याओं को सुधारा. 1972 में नोखा आंदोलन में जेल गए ,1973 में नोखा में ही जुल्म मिटाओ आंदोलन की शुरुआत की . इसको ले 3 अक्टूबर 1973 को पवनी गांव में इन्हें जान से […]

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क्या किया समाज में बदलाव

नोकरी छोड़ समाजसेवा की ललक लिए गांव आते ही आहर सफाई ,सड़क भराई सहित ग्रामीण बुनियादी समस्याओं को सुधारा. 1972 में नोखा आंदोलन में जेल गए ,1973 में नोखा में ही जुल्म मिटाओ आंदोलन की शुरुआत की . इसको ले 3 अक्टूबर 1973 को पवनी गांव में इन्हें जान से मारने की कोशिश हुई सूचना पर पहुंची पुलिस ने इनकी जान बचायी .
1974 के जेपी आंदोलन से जुड़े और जेल भी गये . बिक्रमगंज ,सासाराम समेत कई गाँवो में भी कॉलेज खुलवाये, ताकि पिछड़ी आबादी के लोग शिक्षा से जुड़ सके. आज भी 80 साल के उम्र में गांव गांव शिक्षा, भेदभाव ,जुल्म ,शोषण के विरुद्ध आवाज बन लोगों को जागरूक करते हैं. कहते हैं आज राजनीति की परिभाषा बदल गयी है़ कभी समाजसेवा के लिए की जा रही राजनीति आज व्यवसाय हो गयी है.
बिक्रमगंज (रोहतास) : मुझे महात्मा गांधी के आदर्शों ,आंबेडकर के ऊंच-नीच के भेदभाव को पाटने की वकालत और लोहिया के समतामूलक समाज की स्थापना के सिद्धांतों ने इस कदर प्रभावित किया की नोकरी छोड़ समाज से जुड़ गया . निचली आबादी को शिक्षित करने ,उन्हें अपने अधिकारो का बोध कराने और इसके लिए जरूरत पड़ने पर अपनी जान कुर्बान करने की सनक ने मुझे दीवाना बना दिया.
यह कहानी है एक ऐसे शख्स की जिसकी उम्र है 80 साल. और काम समाज में व्याप्त ऊंच-नीच के भेद को मिटाना और समतामूलक समाज का निर्माण करना नाम है लक्षमण चौधरी जन्म नासरीगंज थाने का तिलशा गांव. जिंदगी के इस उम्र में भी जुनून इतनी की सब फीका फीका नजर आते हैं .
पुराने मट मैले कपड़ों में लिपटा कांधे पर गांधी झोला टांगे और कड़क दार आवाज के मालिक लक्षुमण चौधरी बिक्रमगंज में मिले . देख कर लगा कोई गवई हैं, पर बातों-बातों में ही फराटेदार अंगरेजी में उनका जवाब सुन आंखें चौंधिया गयी . जब बात आगे बढ़ी, तो पता चला ये वहीं लक्षुमण चौधरी है, जिन्होंने शोषित समाज दल जैसे क्रन्तिकारी विचारधारावाली पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक है .
कभी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे चौधरी ने 65 वर्ष की उम्र में पार्टी पद छोड़ दिया और कहा की रिटायरमेंट की उम्र में पद पर नहीं बैठना चाहिए. जब उम्र बढ़ जाये, तो नवयुवकों के लिए पद छोड़ देनी चाहिए . इस सिद्धांत को नहीं माननेवालों को भ्रष्ट तक कहते हैं . अपने जीवन के उन पलों को साझा करते हुए श्री चौधरी ने बताया कि 10 नवंबर 1967 को प्रधानाध्यापक की नौकरी को छोड़ दी. 300 रुपये प्रति महीना मिलता था उस वक्त जब नौकरी को छोड़ कर समाजसेवा की तरफ मुड़ा. शेरघाटी के सीनियर सेकेंडरी आवासीय विद्यालय का प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत था जब नौकरी छोड़ी.
इस सवाल पर उन्होंने बताया कि मुझे पिता ने बहुत ही गरीबी में पढ़ाया था .पिछड़ा तबका से होने के कारण गरीबी और भेद भाव को काफी बचपन में ही महसूस किया . नोकरी में था तभी पत्नी का निधन हो गया तब बेटे की उम्र ढाई साल थी . पत्नी की मौत के बाद लोगों ने दुबारा शादी का दबाव बनाया, तो नौकरी छोड़ समाज से ही नाता जोड़ लिया .
शेरघाटी के ही घघरी गांव में रह कर गरीब आदिवासियों के बच्चों को सफाई और पढ़ाई करायी. 1978 में शोषित समाज दल के उपाध्यक्ष बनाया गया बाद में अध्यक्ष बनने से मना किया. मेरा मानना है कि जिंदगी के एक पड़ाव पर रुक कर युवाओं को मौका देना चाहिए .
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