राघोपुर में गंगा का कहर: 686 करोड़ रुपया खर्च के बाद भी नहीं रुका कटाव? 250 मीटर बांध बहा, अब रेलवे लाइन खतरे में
गोपालपुर राघोपुर में फ्लड फायटिंग करते मजदूर | Prabhat Khabar Network
गंगा और कोसी के कटाव ने नवगछिया अनुमंडल को सालों से त्रस्त किया है. करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद राघोपुर में 250 मीटर जमींदारी तटबंध गंगा में समा गया है. अब रेलवे लाइन की सुरक्षा बड़ी चिंता का विषय बन गई है.
नवगछिया/गोपालपुर (भागलपुर) : गंगा और कोसी के कटाव से नवगछिया अनुमंडल के कई इलाकों में वर्षों से संकट बना हुआ है. कटाव से बचाव के लिए लगातार करोड़ों रुपये की योजनाएं चलायी गयीं और बाढ़ के दौरान फ्लड फाइटिंग भी की जाती रही है. इसके बावजूद राघोपुर में कटाव ने एक बार फिर व्यवस्था की चुनौती बढ़ा दी है. लगातार कटाव के कारण करीब 250 मीटर जमींदारी तटबंध गंगा में समा गया है, जबकि अब बची जमीन और उसके आगे मौजूद रेलवे लाइन की सुरक्षा चिंता का विषय बन गयी है.
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वर्षों में करोड़ों खर्च, फिर भी कटाव बरकरार
उपलब्ध पुराने रिकॉर्ड के अनुसार राघोपुर-काजीकोरैया जमींदारी तटबंध पर वर्ष 2005-06 में करीब 13 करोड़ रुपये की लागत से स्थायी कटाव निरोधी कार्य शुरू हुआ था. इसके बाद 2008 में करीब 18.77 करोड़, 2014 में 67.99 करोड़ और 2015 में करीब 65 करोड़ रुपये की योजनाओं का उल्लेख मिलता है. वर्ष 2016 में इस्माईलपुर-बिंदटोली और राघोपुर क्षेत्र के लिए करीब 115 करोड़ रुपये की योजना भी सामने आयी थी.
एक पुराने आकलन के अनुसार वर्ष 2006 से 2019 के बीच पूरे नवगछिया अनुमंडल में स्थायी कटाव निरोधी और फ्लड फाइटिंग कार्यों पर करीब 686 करोड़ रुपये खर्च हुए. इसके बावजूद राघोपुर-काजीकोरैया तटबंध हर साल गंगा के दबाव से जूझ रहा है.
2026 में फिर पांच करोड़ की योजना
राघोपुर को कटाव से बचाने के लिए इस वर्ष भी करीब पांच करोड़ रुपये की प्राक्कलित लागत से कटाव निरोधी योजना तैयार की गयी थी. लेकिन जुलाई में तेज कटाव ने बचाव तैयारियों की परीक्षा ले ली. तटबंध का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त होने के साथ जल संसाधन विभाग का अस्थायी कैंप कार्यालय भी गंगा में समा गया.
इसके बाद फ्लड फाइटिंग कार्य शुरू किया गया. बालू भरे बोरे, जियो बैग, बांस रोल और हाथी पांव के साथ नाव, ट्रैक्टर, पोकलेन और जेसीबी जैसी मशीनरी लगायी गयी. एक समय बचाव कार्य में 250 से अधिक मजदूर, 20 नाव, 30 ट्रैक्टर और करीब 2.50 लाख बालू भरे बोरे उपलब्ध कराये गये थे.
बचाव कार्य के बीच 250 मीटर बांध गंगा में बहा
लगातार बचाव कार्य के बावजूद राघोपुर-खैरपुर के बीच करीब 250 मीटर जमींदारी बांध गंगा में समा गया. कटाव स्थल पर करीब 16 मीटर गहरी खाई बन गयी है. अब बची हुई जमीन और उसके आगे मौजूद रेलवे लाइन को सुरक्षित रखना विभाग के लिए बड़ी चुनौती बन गया है.
जल संसाधन विभाग के अभियंता प्रमुख ई. वरुण कुमार ने रेलवे ट्रैक की सुरक्षा को प्राथमिकता बताते हुए अतिरिक्त संसाधन और बड़े संवेदकों को बचाव कार्य में लगाने की बात कही है. विभाग के अनुसार नदी की मुख्य धारा तटबंध की ओर शिफ्ट होने और विक्रमशिला सेतु के अपस्ट्रीम में तेज बहाव के कारण मार्जिनल बांध पर लगातार दबाव बना हुआ है.
सवाल सिर्फ कटाव का नहीं, खर्च का भी
राघोपुर की मौजूदा स्थिति अब केवल बाढ़ और कटाव का मामला नहीं रह गयी है. वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी तटबंध बार-बार कमजोर पड़ रहा है, तो इसके स्थायी समाधान को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है.
क्या स्थायी कटाव निरोधी योजनाओं की तकनीकी डिजाइन बदलती नदी की धारा के अनुरूप रही? क्या निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और निगरानी पर्याप्त रही? क्या हर साल होने वाले फ्लड फाइटिंग पर खर्च के बावजूद स्थायी सुरक्षा की रणनीति तैयार नहीं हो सकी?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभागों के विस्तृत तकनीकी और वित्तीय रिकॉर्ड से ही स्पष्ट होगा. फिलहाल जमीन और रेलवे लाइन को बचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है.
रेलवे लाइन तक पहुंचा संकट
राघोपुर में कटाव जिस तेजी से बढ़ा है, उसने अब रेलवे लाइन की सुरक्षा को सीधे चिंता के केंद्र में ला दिया है. तटबंध और जमीन का लगातार कटना जारी रहा तो रेलवे ट्रैक पर भी खतरा बढ़ सकता है. ऐसे में आने वाले दिनों में बचाव कार्य की प्रभावशीलता और नदी की धारा के रुख पर निगरानी बेहद महत्वपूर्ण होगी.
कटाव रुक नहीं रहा और बचाव पर खर्च भी जारी है. अब सवाल यही है कि करोड़ों रुपये की योजनाओं के बाद भी गंगा के सामने तटबंध कब तक बेबस रहेगा और रेलवे लाइन को आखिर कितनी जल्दी सुरक्षित किया जा सकेगा?
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