चाइनीज रोशनी के बीच पारंपरिक हुनर की चमक, बगहा में मिट्टी के दीये गढ़ रहे कुम्हार
दीपावली पर बिक्री के लिए तैयार मिट्टी के बर्तन | Prabhat Khabar Network
दीपावली की तैयारी में बगहा के कुम्हार मिट्टी के दीये गढ़ रहे हैं. चाइनीज सामानों के मुकाबले अपनी पुश्तैनी कला को बचाने और स्वदेशी दीयों को बढ़ावा देने की इनकी अपील.
मिट्टी दीये बगहा: दीपों के पावन पर्व दीपावली के करीब आते ही बगहा शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों के बाजारों तक में जबर्दस्त रौनक देखी जा रही है. घर-आंगन को रोशनी से जगमग करने के लिए लोग रंग-बिरंगी झालरों, आधुनिक लाइटों और दीयों की खरीदारी में जुटे हैं. आधुनिकता के दौर में बाजार में चाइनीज रोशनी की भरमार के बावजूद मिट्टी के पारंपरिक दीयों का महत्व आज भी पूरी शिद्दत से बरकरार है.

पुश्तैनी हुनर को बचाने में जुटे कुम्हार परिवार
अपनी सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत और पुश्तैनी कला को जिंदा रखने के लिए स्थानीय कुम्हार दिन-रात चाक पर पसीना बहा रहे हैं. बगहा के रहने वाले हरि पंडित ऐसे ही हुनरमंद कारीगर हैं, जिन्होंने बदलते दौर की कठिन चुनौतियों के बाद भी अपनी पुश्तैनी परंपरा की लौ को मंद नहीं पड़ने दिया है. वे अपने पूरे परिवार के साथ मिलकर मिट्टी के दीये, कुल्हड़ और विभिन्न प्रकार के कलात्मक बर्तन तैयार करने में जुटे हैं.
सप्ताह भर पहले से शुरू हो जाती है तैयारी
दीपावली से कई सप्ताह पूर्व ही कुम्हार परिवारों में दीया निर्माण का कार्य तेज हो जाता है. इस कठिन प्रक्रिया में परिवार के सभी सदस्य अपनी हिस्सेदारी निभाते हैं:
- मिट्टी की तैयारी: दूर-दराज से विशेष चिकनी मिट्टी लाकर उसे कूटकर बारीक व मुलायम बनाया जाता है.
- चाक पर ढलाई: चाक की गति के साथ मिट्टी को सुंदर और सलीकेदार दीयों का आकार दिया जाता है.
- सुखाना और पकाना: धूप में सुखाने के बाद भट्ठी (आंवा) में निश्चित तापमान पर पकाकर इन्हें मजबूत किया जाता है.
स्थानीय कारीगरों के समर्थन की भावुक अपील
कारीगर हरि पंडित ने बताया कि मिट्टी के बर्तन और दीये बनाना उनका पीढ़ियों पुराना पेशा है, जिससे उनके परिवार की पहचान और रोजी-रोटी जुड़ी है. उनके द्वारा बनाए गए दीये स्थानीय बाजारों के अलावा सीमावर्ती क्षेत्रों तक भेजे जाते हैं. उन्होंने कहा कि चाइनीज सामानों के चलन से उनका व्यापार काफी प्रभावित हुआ है, फिर भी वे इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं.
हरि पंडित ने आम लोगों से अपील की है कि वे इस दीपोत्सव पर विदेशी लाइटों के बजाय स्वदेशी मिट्टी के दीये खरीदें. इससे स्थानीय कारीगरों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा और भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा हमेशा जीवंत रहेगी.
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