नाटक ''तेरा चेहरा विद्रूप है'' को िकया जींवत

Updated at : 09 Mar 2019 7:21 AM (IST)
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नाटक ''तेरा चेहरा विद्रूप है'' को िकया जींवत

बेगूसराय : मुक्तिबोध की रचना मेरा चेहरा विद्रुप है का नाट्य रूपांतरण दीपक सिन्हा का सफल मंचन बेगूसराय आइटीआइ के सभागार में युवा नाट्य निदेशक मोहित मोहन के निर्देशन में किया गया. नाटक का उद्घाटन रंगकर्मी अवधेश सिन्हा, जनकवि दीनानाथ सुमित्र, वरिष्ठ चित्रकार सीताराम, रंगकर्मी दीपक सिन्हा एवं हरिशंकर गुप्ता ने संयुक्त रूप से दीप […]

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बेगूसराय : मुक्तिबोध की रचना मेरा चेहरा विद्रुप है का नाट्य रूपांतरण दीपक सिन्हा का सफल मंचन बेगूसराय आइटीआइ के सभागार में युवा नाट्य निदेशक मोहित मोहन के निर्देशन में किया गया. नाटक का उद्घाटन रंगकर्मी अवधेश सिन्हा, जनकवि दीनानाथ सुमित्र, वरिष्ठ चित्रकार सीताराम, रंगकर्मी दीपक सिन्हा एवं हरिशंकर गुप्ता ने संयुक्त रूप से दीप जलाकर किया .
अतिथियों का स्वागत आहुति नाट्य अकादमी के सचिव रामानुज प्रसाद सिंह ने चादर व जयशंकर प्रसाद की पुस्तक भेंट कर किया. इस मौके पर वरिष्ठ चित्रकार सीताराम ने अकादमी को बधाई देते हुए ग्रामीण क्षेत्र के दर्शकों से नाटक देखने की अपील की. उन्होंने कहा कि आहुति नाट्य अकादमी प्रारंभ से ही नये युवा निर्देशकों को अवसर प्रदान करती है.
युवा रंगकर्मी हरिशंकर एवं दीपक सिन्हा ने बेगूसराय के रंगमंच को बिहार की सांस्कृतिक राजधानी बताया. मुख्य अतिथि रंगकर्मी अवधेश सिन्हा ने अपने संबोधन में बेगूसराय के रंग अभिनेताओं को पढ़ने की सलाह देते हुए कहा कि अध्ययन से ही सृजन की क्षमता का विकास होता है.
उन्होंने कहा कि आज का नाटक मुक्तिबोध की रचना तेरा चेहरा विद्रुप है नाट्य रूपांतरण दीपक सिन्हा का प्रदर्शन कर मोहित मोहन ने दर्शकों के सामने औरतों के जीवन की कड़वी सच्चाई को रखा है. प्रस्तुत नाटक का कथ्य पितृसत्ता और मध्य वर्ग के स्त्री विमर्श को लेकर है. मध्य वर्ग अपनी आर्थिक तंगी को लेकर हमेशा से परेशान रहा है. कम आमदनी में बेहतर तरीके से रहने के अव्यावहारिक कानून का शिकंजा कसता है.
सर्वटे की पत्नी प्रमीला काफी हद तक अपने पति के बनाये गये नियम के साथ चलने की कोशिश करती है पर आखिर में थक कर हार जाती है. तब वह अपने पति के दोस्त यानि लेखक के पास पहुंच कर सवाल-जवाब करती है. वह भावुक होती है और विद्रोहित भी होती है. वह पितृसत्ता के साथ सवाल खड़ा करती है. अंतत: स्वयं रास्ते की तलाश करने की हिम्मत जुटाती है.
नाटक में पत्नी की भूमिका में युवा अभिनेत्री अंकिता सिंह,सर्वटे मोहित मोहन, सुमंजय की भूमिका सचिन कुमार और पुत्र की भूमिका में राहुल कुमार ने जीवंत अभिनय किया. मंच कल्पना व निर्माण मदन द्रोण, कुंदन कुमार, सचिन, वस्त्र विन्यास एवं रूप सज्जा अंकिता सिन्हा, सचिन कुमार, मोहित कुमार, प्रकाश परिकल्पना रवि वर्मा, मकसूदन, साउंड डिजायन सोनी कुमारी समेत अन्य कलाकारों ने अपने अभिनय से नाटक को जीवंत बनाया.
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