थैलेसीमिया की चपेट में दो बच्चे अब इलाज में मदद की दरकार
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :07 Jul 2016 8:28 AM (IST)
विज्ञापन

20 दिनों पर दोनों बच्चों को एक-एक यूनिट खून की पड़ती है जरूरत पिछले तीन साल से औरंगाबाद का ब्लड बैंक उपलब्ध करा रहा खून सासाराम, बक्सर वाराणसी व पटना सहित अन्य कई सरकारी अस्पतालों से बेटों के लिए ले चुके हैं खून रोहतास जिले के राजपुर गांव के हैं रहनेवाले उत्तर प्रदेश के शक्तिनगर […]
विज्ञापन
20 दिनों पर दोनों बच्चों को एक-एक यूनिट खून की पड़ती है जरूरत
पिछले तीन साल से औरंगाबाद का ब्लड बैंक उपलब्ध करा रहा खून
सासाराम, बक्सर वाराणसी व पटना सहित अन्य कई सरकारी अस्पतालों से बेटों के लिए ले चुके हैं खून
रोहतास जिले के राजपुर गांव के हैं रहनेवाले
उत्तर प्रदेश के शक्तिनगर में पान की दुकान से चलता है परिवार
औरंगाबाद (ग्रामीण) : हर मां-बाप के आंखों का तारा उनका संतान होता है. जन्म से लेकर युवा होने तक परवरिश की जिम्मेवारी मां-बाप की होती है. हर किसी का सपना होता है कि बुढ़ापे की लाठी उनका संतान हो. लेकिन, जब सपने टूटने लगते हैं तो बरबस आंसू की धार रुके नहीं रुकती.
जन्म से ही जब संतान को खतरनाक बीमारी जकड़ ले तो मां-बाप का सपना टूटना लाजिमी है. ऐसे ही मां-बाप है कुंज बिहारी व प्रेमलता देवी. जिन्हें संतान का सुख तो मिला. लेकिन, ईश्वर ने सुख के हर कदम पर कांटे ही बिछा रखे हैं. जीवन और मौत से जूझ रहे अपने दो मासूम पुत्रों को लेकर दर-दर की ठोकरें खां रहे हैं. वैसे कुंज बिहारी रहनेवाले रोहतास जिले के राजपुर गांव के हैं.
लेकिन, दो बेटों की बीमारी से शक्तिगढ़ से बनारस और बक्सर से पटना, औरंगाबाद सहित कई जिलों की खाक छान ली. पांच वर्ष के पवन और तीन वर्ष के सूरज को बचाने की जद्दोजहद ने मां-बाप व अन्य परिवारों की सुख शांति छिन गयी. पिछले तीन वर्षों से औरंगाबाद ब्लड बैंक से सहयोग पा रहे हैं. इनकी हकीकत सुनने के बाद शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसके आंख से आंसू न निकल जाये. कुंज बिहारी और प्रेमलता को पहला संतान पवन के रूप में हुआ. ठीक 10 महीने के बाद थैलेसीमिया (रक्त संबंधी) नामक बीमारी ने उसे जकड़ ली. बेटे को बचाने की चाह लिये कई अस्पतालों का चक्कर काटा. इसी बीच ठीक दो साल बाद एक और पुत्र हुआ सूरज. प्रारंभ में यह ठीक था. लेकिन, पिछले आठ महीने से यह भी थैलेसीमिया से पीड़ित हो गया. पहले एक बेटे के इलाज के लिए दौड़ लगा रहे थे, अब दोनों को एक साथ लेकर इलाज के लिए भटक रहे हैं.
कुंज बिहारी कहते हैं कि अभी तक चार लाख से अधिक रुपये खर्च हो गये. हर 20वें दिन दोनों बेटों को एक-एक यूनिट खून की जरूरत पड़ती है. उत्तर प्रदेश के शक्तिनगर में छोटा-मोटा पान की दुकान है, जिससे परिवार चल रहा था. लेकिन, बेटों की बीमारी ने सब कुछ बरबाद कर दिया. पत्नी व घर के अन्य सदस्यों के गहने बिक गये. अब एक छोटा सा घर है, वह भी बिकने के कगार पर है. परिजन भी अब साथ छोड़ रहे हैं,आखिर कब तक वो सहयोग करते. कुंज बिहारी और उनकी पत्नी प्रेमलता कहती हैं कि अपने बेटों के जीवन बचाने के लिए अपनी जिंदगी दावं पर लगा देंगे.
क्या है थैलेसीमिया
शहर के जाने-माने चिकित्सक डाॅ ब्रजकिशेार सिंह का कहना है कि थैलेसीमिया एक गंभीर बीमारी है. इसमें खून की लगातार जरूरत पड़ती है. वैसे यह वंशानुगत होता है और मां के वंश से ही अधिक प्रभावित होता है. इसमें ग्लोबिन नहीं बन पाता है. इससे पीड़ित लोगों की उम्र अधिक नहीं होती.
बोन ट्रांसप्लांट इसका कुछ हद तक उपाय है. लेकिन, लाखों खर्च होने के बाद भी जीवन की कोई गारंटी नहीं है. देश के बड़े अस्पतालों में इसका इलाज हो सकता है. सदर अस्पताल के चिकित्सक डाॅ कुमार महेंद्र प्रताप बताते हैं कि थैलेसीमिया में ब्लड बनना ही बंद हो जाता है. शरीर में लंबी हड्डी के बीच जो मज्जा रहता है उसी से खून बनता है. लेकिन, थैलेसीमिया होने के बाद खून बनना बंद हो जाता है, जिससे हमेशा खून की जरूरत पड़ती है.
बोन मैरो ट्रांसप्लांट में 22 लाख खर्च
सदर अस्पताल प्रांगण में बुधवार को अपने दो मासूम बच्चों को गोद में लिये बैठे कुंज बिहारी और प्रेमलता देवी पर जब प्रभात खबर प्रतिनिधि की नजर पड़ी और कारण जानना चाहा तो बताने के पूर्व ही दोनों की आंखें डबडबा गयी. कुंज बिहारी ने बताया कि पिछले चार वर्षों से वह बेटों को बचाने की लड़ाई लड़ रहे है. थैलेसीमिया से पीड़ित पवन और सूरज के लिए खून की जरूरत पड़ती है.
चार बार स्वयं खून दे चुका हूं. अब डॉक्टर कहते हैं कि आप भी बीमार हो जायेंगे. सासाराम, बक्सर, वाराणसी व पटना सहित अन्य कई सरकारी अस्पतालों से बेटों के लिए खून ले चुका है. लेकिन, अब कोई मदद करना नहीं चाहता. पिछले तीन साल से औरंगाबाद का ब्लड बैंक खून उपलब्ध करा रहा है. शक्तिगढ़ से यहां आने-जाने में हर महीने दो हजार रुपये खर्च होते हैं. बड़े चिकित्सकों से भी दिखाया. डॉक्टर कहते हैं कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट होने से नयी जिंदगी मिल सकती है, वह भी कोई गारंटी नहीं. इसके लिये 20 से 22 लाख रुपये खर्च होंगे. अब पैसे आयेंगे कहां से, कौन करेगा मदद?
दी जायेगी सहायता
पीड़ित परिवार की सेवा करना मानव का धर्म है. इस दुनिया में इनसान ही इनसान के काम आता है. कुंज बिहारी और प्रेमलता देवी अपने संतानों को बचाने के लिए दर-दर की ठोकर खां रहे हैं. अगर हम मानवता के नाते सहयोग करते हैं तो इससे बड़ा पुण्य कुछ भी नहीं. उन्हें ममद की जायेगी.
जगन्नाथ सिंह, अवकाश प्राप्त शिक्षक
सेवा धर्म के कई मिसाल इस देश व बिहार के लोगों ने समय-समय पर पेश किया है. हमारे संस्कार और हमारी संस्कृति यह बताती है कि हम सेवा भाव से कभी पीछे नहीं हटे हैं. रोहतास के राजपुर गांव के दो मासूम बच्चों की मदद के लिए हमारा संस्थान तैयार है. लोगों से अपील करते हैं कि औरंगाबाद व अन्य जिले के लोग थैलेसीमिया से पीड़ित दोनों बच्चों की मदद करें.
जगदीश सिंह, अध्यक्ष, महाराणा प्रताप सेवा संस्थान
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
विज्ञापन
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए
विज्ञापन




