JDU से निकाले जाने के बाद खतरे में अनंत सिंह की विधायकी! क्या कहता है दल-बदल कानून?
अनंत सिंह का फाइल फोटो
Anant Singh: JDU से छह साल के लिए निष्कासित होने के बाद मोकामा विधायक अनंत सिंह की विधायकी पर भी संकट मंडरा रहा है. पार्टी ने उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द करने की सिफारिश की है. दल-बदल कानून के तहत उनकी विधायकी कैसे जा सकती है और इस प्रक्रिया में स्पीकर की क्या भूमिका होगी? MLC चुनाव में नीरज कुमार के खिलाफ अनंत सिंह की क्या भूमिका रही थी? समझिए, इस पूरे मामले की हर अहम बात.
Anant Singh: मोकामा के विधायक अनंत सिंह को जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है. उनकी प्राथमिक सदस्यता भी रद्द कर दी गई है. पार्टी ने बिहार विधानसभा अध्यक्ष से उनकी सदस्यता समाप्त करने की सिफारिश की है. इसकी वजह विधान परिषद चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ जाकर जन सुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह का समर्थन करना बताया गया है.
लेकिन क्या पार्टी से निष्कासित होते ही किसी विधायक की विधायकी खत्म हो जाती है? ऐसा नहीं है. विधानसभा की सदस्यता रद्द करने के लिए संविधान में तय प्रक्रिया का पालन करना होता है. इस मामले में दल-बदल विरोधी कानून और विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका अहम होगी.
अनंत सिंह पर कार्रवाई का आधार क्या हो सकता है?
JDU के मुताबिक, अनंत सिंह ने पार्टी के निर्देशों की अवहेलना की. उन्होंने पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में पार्टी उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ काम किया और जन सुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह का समर्थन किया. पार्टी ने इसे अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधि माना है.
अब सवाल है कि क्या किसी दूसरी पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करना विधानसभा सदस्यता जाने का आधार बन सकता है? इसका जवाब परिस्थितियों और उपलब्ध सबूतों पर निर्भर करेगा.
संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत किसी विधायक को अयोग्य ठहराने का एक आधार यह है कि वह स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ दे. इसके लिए औपचारिक रूप से इस्तीफा देना जरूरी नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट किया था कि विधायक के आचरण से भी यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उसने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है.
हालांकि, किसी दूसरे उम्मीदवार का समर्थन करना अपने आप में हर मामले में सदस्यता समाप्त करने के लिए पर्याप्त होगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता. यह देखना होगा कि अनंत सिंह की गतिविधियां किस तरह की थीं, पार्टी के निर्देश क्या थे और उनके खिलाफ कौन-से सबूत पेश किए जाते हैं.
क्या है दल-बदल विरोधी कानून?
दल-बदल विरोधी कानून भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में दिया गया है. इसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए जोड़ा गया था. इसका उद्देश्य राजनीतिक दल बदलने के आधार पर सांसदों और विधायकों की सदस्यता जाने से जुड़े नियम तय करना है.
इस कानून के तहत मुख्य रूप से दो स्थितियों में किसी सदस्य को अयोग्य ठहराया जा सकता है:
- स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ना: विधायक ने औपचारिक इस्तीफा भले न दिया हो, लेकिन उसके आचरण से यह साबित हो कि उसने अपनी पार्टी छोड़ दी है.
- पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान करना: सदन में पार्टी के अधिकृत निर्देश यानी व्हिप के खिलाफ मतदान करना या बिना अनुमति मतदान से अनुपस्थित रहना भी अयोग्यता का आधार बन सकता है. इसके लिए संविधान में निर्धारित शर्तें लागू होती हैं.
अनंत सिंह के मामले में मुख्य सवाल यह होगा कि क्या उनके आचरण को स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ने के रूप में देखा जा सकता है. क्योंकि मामला विधान परिषद चुनाव में दूसरी पार्टी के उम्मीदवार के समर्थन का है, इसलिए इसकी परिस्थितियों और सबूतों की जांच जरूरी होगी.
पार्टी से निष्कासन के बाद भी कैसे लागू हो सकता है कानून?
यह इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू है. आम तौर पर ऐसा लग सकता है कि जब किसी विधायक को उसकी पार्टी ने निकाल दिया, तो वह उस पार्टी का सदस्य नहीं रहा. लेकिन दल-बदल कानून के संदर्भ में मामला इतना सीधा नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने जी. विश्वनाथन बनाम तमिलनाडु विधानसभा के अध्यक्ष मामले में स्पष्ट किया था कि किसी सदस्य को पार्टी से निष्कासित कर देने भर से दल-बदल कानून के लिए उसकी स्थिति अपने आप नहीं बदल जाती. ऐसे सदस्य को इस कानून के तहत मूल राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ माना जा सकता है.
इसलिए अनंत सिंह को JDU से निष्कासित किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि अब दल-बदल कानून के तहत उनकी सदस्यता पर विचार नहीं हो सकता. हालांकि, उनके खिलाफ कार्रवाई का आधार और उसके समर्थन में मौजूद तथ्य अलग से जांचे जाएंगे.
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अनंत सिंह की विधायकी रद्द कराने के लिए JDU को क्या करना होगा?
प्रभात खबर के पॉलिटिकल एडिटर मिथिलेश कुमार के मुताबिक, JDU को अनंत सिंह के खिलाफ सबूत जुटाने होंगे. पार्टी को यह दिखाना होगा कि उन्होंने पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर गतिविधियां कीं. इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष की ओर से विधानसभा अध्यक्ष को औपचारिक पत्र दिया जा सकता है.
इस प्रक्रिया को आसान भाषा में ऐसे समझिए:
पहला चरण: सबूत जुटाना
JDU को अनंत सिंह के उन बयानों, चुनाव प्रचार और दूसरी गतिविधियों से जुड़े दस्तावेज जुटाने होंगे, जिनके आधार पर पार्टी यह दावा कर रही है कि उन्होंने पार्टी लाइन का उल्लंघन किया. केवल आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं होगा.
दूसरा चरण: विधानसभा अध्यक्ष को आवेदन
पार्टी को अपने आरोपों और सबूतों के साथ विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष सदस्यता समाप्त करने की मांग रखनी होगी. आवेदन में यह स्पष्ट करना होगा कि अनंत सिंह का कौन-सा आचरण संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के तहत आता है.
तीसरा चरण: आरोपों की जांच और जवाब का मौका
आवेदन मिलने के बाद विधानसभा अध्यक्ष मामले पर विचार कर सकते हैं. जरूरत पड़ने पर अनंत सिंह को नोटिस जारी कर उनका पक्ष पूछा जा सकता है. उन्हें आरोपों का जवाब देने और अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने 2021 के एक फैसले में भी कहा था कि ऐसे मामलों में संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए और जहां जरूरी हो, वहां साक्ष्य पेश किए जाने चाहिए.
चौथा चरण: विधानसभा अध्यक्ष का फैसला
दोनों पक्षों की बात और उपलब्ध सबूतों पर विचार करने के बाद विधानसभा अध्यक्ष फैसला ले सकते हैं. यदि यह निष्कर्ष निकलता है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता की शर्तें पूरी होती हैं, तो अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता समाप्त की जा सकती है. फैसले को उचित आधार पर अदालत में चुनौती भी दी जा सकती है.
अनंत सिंह का पक्ष भी क्यों अहम होगा?
अनंत सिंह पहले कह चुके हैं कि वह JDU के कार्यकर्ता हैं और विधान परिषद का चुनाव पार्टी आधारित चुनाव नहीं है. ऐसे में यदि उनके खिलाफ सदस्यता समाप्त करने की याचिका आती है, तो उनका पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा.
विधानसभा अध्यक्ष को यह देखना होगा कि पार्टी की ओर से लगाए गए आरोपों के समर्थन में पर्याप्त सबूत हैं या नहीं. साथ ही, यह भी जांचना होगा कि संबंधित गतिविधियां दल-बदल कानून के दायरे में आती हैं या नहीं.
इसलिए केवल पार्टी से निष्कासन के आदेश के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि अनंत सिंह की विधायकी निश्चित रूप से समाप्त हो जाएगी. इसका फैसला संवैधानिक प्रक्रिया के बाद ही होगा.
क्या पार्टी से निकाले जाने और विधायकी जाने में अंतर है?
दोनों अलग-अलग कार्रवाई हैं. JDU ने अनंत सिंह को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है और उनकी प्राथमिक सदस्यता रद्द कर दी है. यह पार्टी का संगठनात्मक फैसला है.
वहीं, विधानसभा सदस्यता समाप्त करना संविधान के तहत अयोग्यता से जुड़ा मामला है. इसके लिए संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई और विधानसभा अध्यक्ष का फैसला जरूरी है.
यानी अनंत सिंह की विधायकी जाने का रास्ता खुल सकता है, लेकिन अंतिम फैसला सबूतों, कानून की व्याख्या और विधानसभा अध्यक्ष की कार्रवाई पर निर्भर करेगा.
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