रियो ओलिंपिक 55 दिन शेष : जब ट्रेन ड्राइवर ने अपनी कप्तानी में भारत को दिलाया स्वर्ण पदक

Published at :11 Jun 2016 6:14 AM (IST)
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रियो ओलिंपिक 55 दिन शेष : जब ट्रेन ड्राइवर ने अपनी कप्तानी में भारत को दिलाया स्वर्ण पदक

रियो ओलिंपिक : 55 दिन शेष 1947 के बाद आजाद भारत के पहले हॉकी कप्तान थे किशन लाल सुनील कुमार रांची : स्वर्गीय किशन दादा उर्फ किशन लाल उस शख्सीयत का नाम था, जिन्होंने 1947 में आजादी मिलने के बाद 1948 के ओलिंपिक खेलों में बतौर कप्तान अंग्रेजों को उन्हीं की सरजमीं पर हरा कर […]

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रियो ओलिंपिक : 55 दिन शेष

1947 के बाद आजाद भारत के पहले हॉकी कप्तान थे किशन लाल

सुनील कुमार

रांची : स्वर्गीय किशन दादा उर्फ किशन लाल उस शख्सीयत का नाम था, जिन्होंने 1947 में आजादी मिलने के बाद 1948 के ओलिंपिक खेलों में बतौर कप्तान अंग्रेजों को उन्हीं की सरजमीं पर हरा कर भारत को हॉकी का ‘गोल्ड मेडल’ दिलाया था. बहुत ही कम लोगों को पता है कि वह ट्रेन ड्राइवर थे, लेकिन उनकी कप्तानी में 1948 ओलिंपिक में भारत ने कुल पांच मैच खेले और पांचों में उसे जीत मिली थी. टीम की तरफ से 25 गोल किये गये, जबकि दो गोल खाये. किशन लाल के बारे में कहा जाता है कि जब भी गेंद उनके पास जाती थी, तो वह गोल होता ही था.

राजा टीकमगढ़ का न्योता

किशनदादा की अपने जमाने में तूती बोलती थी और वह भी मेजर ध्यानचंद की तरह ही विख्यात थे. टीकमगढ़ के राजा भी उनकी कलात्मक हॉकी के कायल थे. इस कारण उन्होंने दादा को अपने यहां बुला लिया था, ताकि वे आर्थिक रूप से सक्षम हो सकें, लेकिन इसी बीच रेलवे से बुलावा आ गया.

जाम की लकड़ी से हुई हॉकी की शुरुआत

खुद के बनाये हॉकी स्टिक से करते थे अभ्यास

महू में जब उनके पास हॉकी खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे, तब वे जाम की लकड़ी को काट कर उसे हॉकी की शक्ल देते और अभ्यास करते थे. यही अभ्यास उन्हें एक दिन भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बना गया. वे आजादी के बाद ओलिंपिक में हिस्सा लेनेवाली भारतीय हॉकी टीम के पहले कप्तान थे और उन्होंने 1948 के ओलिंपिक खेलों में ब्रिटेन को उसी के घर जाकर हराते हुए स्वर्ण पदक जीता.

पोलो से प्रेरित होकर हॉकी खेलना शुरू किया

दो फरवरी 1917 को महू में जन्में किशन लाल बचपन में अंग्रेजों को पोलो खेलते देखा करते थे.

इससे उनमें भी खेलने की इच्छा जागी. 14 वर्ष की उम्र में जब उनकी टीम ने हॉकी टूर्नामेंट का खिताब जीता, तब लोग उनके खेल की ओर आकर्षित हुए. 1933 में 16 साल की उम्र तक वह महू हीरोज, महू ग्रीन वॉल्स और इंदौर की कल्याणमल मिल्स का प्रतिनिधित्व कर चुके थे. बाद में किशन लाल और ध्यानचंद ने एकसाथ झांसी हीरोज के लिए खेला. 1937 में भागवत क्लब हॉकी टीम के कप्तान एमएन जुत्शी उनके खेल से काफी प्रभावित हुए. उन्होंने (एमएन जुत्शी) इसकी जानकारी टीकमगढ़ राज्य के महाराजा बीर सिंह जूदेव को दी. फिर टीकमगढ़ महाराज के बुलावे पर उन्होंने टीकमगढ़ के मशहूर भागवत क्लब से खेलना शुरू कर दिया.

हॉकी के मैदान पर ही ली अंतिम सांस

किशन दादा उर्फ किशन लाल की तमन्ना यही थी कि मौत के फरिश्ते जब उन्हें लेने आयें, तो वह जगह हॉकी का मैदान ही हो. दो फरवरी 1902 को जन्में किशनदादा जब मद्रास (अब चेन्नई) में कुरुअप्पा स्वर्ण कप हॉकी टूर्नामेंट में ऑफिशियल बन कर गये, तब मैदान पर ही 21 जून 1980 को उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे दुनिया से चले गये.

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