झारखंड में दुर्गा विसर्जन के दौरान क्यों निकलता है मशाल जुलूस? जानें 169 साल पुरानी परंपरा
मशाल के साथ श्रद्धालु (फाइल फोटो)
Chakradharpur Mashal Julus: झारखंड के चक्रधरपुर में दुर्गा विसर्जन के दौरान मशाल जुलूस निकालने की अनोखी परंपरा है. जानें 1857 के विद्रोह और अंग्रेजों से जुड़ी एक ऐतिहासिक कहानी साथ ही इस परंपरा का इतिहास और महत्व.
चक्रधरपुर मशाल जुलूस: झारखंड के चक्रधरपुर में दशहरा मनाने का अंदाज कुछ अलग है. यहां मां दुर्गा की विदाई के दौरान लोग हाथों में मशाल लेकर जुलूस निकालते हैं. ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच निकलने वाला यह जुलूस सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि 1857 के विद्रोह और राजा अर्जुन सिंह से जुड़ी एक कहानी की याद भी दिलाता है.
जब राजा अर्जुन सिंह को बचाने के लिए जुटे थे लोग
इस परंपरा के पीछे की कहानी 1857 के उस दौर से जुड़ी है, जब देश के कई हिस्सों में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह हो रहा था. इसी दौरान झारखंड के पोरहाट के राजा अर्जुन सिंह ने भी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया था.
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कहा जाता है कि अंग्रेज राजा अर्जुन सिंह को पकड़ना चाहते थे. उन्हें उम्मीद थी कि दुर्गा पूजा के अवसर पर राजा अपने महल जरूर लौटेंगे. इसी सोच के साथ अंग्रेजों ने उनके महल के सामने डेरा डाल दिया और उनके आने का इंतजार करने लगे.
लेकिन राजा अर्जुन सिंह के लिए यह आसान नहीं था. जब वह महल के पास पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि अंग्रेज पहले से ही वहां मौजूद हैं. ऐसे में उनके सामने महल तक पहुंचने और अंग्रेजों की नजरों से बचने की चुनौती थी.
मशालों की रोशनी में राजा ने दिया अंग्रेजों को चकमा
कहानी के अनुसार, उस समय पोरहाट के लोग अपने राजा की मदद के लिए आगे आए. बड़ी संख्या में लोग मशालें लेकर महल के आसपास जुटने लगे. चारों तरफ मशालों की रोशनी और लोगों की मौजूदगी के बीच राजा अर्जुन सिंह को छिपकर महल में प्रवेश करने का मौका मिल गया.
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इस तरह राजा अंग्रेजों को चकमा देने में सफल रहे. यह कहानी लोगों के बीच राजा और उनकी प्रजा के आपसी जुड़ाव की याद के रूप में सुनाई जाती है.
मां दुर्गा की विदाई में आज भी जिंदा है यह परंपरा
कहा जाता है कि चक्रधरपुर में हर साल इसी घटना की याद में मशाल जुलूस निकाला जाता है. खास बात यह है कि यहां मां दुर्गा की प्रतिमा को किसी ट्रक या दूसरी गाड़ी पर रखकर नहीं ले जाया जाता. लोग अपने कंधों पर मां की प्रतिमा उठाते हैं और ढोल-नगाड़ों के साथ उन्हें विदाई देते हैं.
इस तरह चक्रधरपुर का दुर्गा विसर्जन आस्था और इतिहास की याद को एक साथ जोड़ता है. मां दुर्गा की विदाई के साथ निकलने वाला मशाल जुलूस लोगों को राजा अर्जुन सिंह और उनकी मदद के लिए आगे आए लोगों की कहानी भी याद दिलाता है.
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