होली हो तो नये कपड़े में

Published at :23 Mar 2016 6:23 AM (IST)
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होली हो तो नये कपड़े में

आज हम भारत के समाज को गरीब कह सकते हैं, हालांकि यहां बहुत अमीर भी मिलेंगे. लेकिन अमीरों के कारण भारत का समाज अमीर नहीं हो सकता. भारत में पहले बहुजन, समाज का पूरा ढांचा संपन्न था. संपन्न समाज में ही उत्सव प्रवेश कर सकता है, गरीब समाज में उत्सव प्रवेश नहीं कर सकता. गरीब […]

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आज हम भारत के समाज को गरीब कह सकते हैं, हालांकि यहां बहुत अमीर भी मिलेंगे. लेकिन अमीरों के कारण भारत का समाज अमीर नहीं हो सकता. भारत में पहले बहुजन, समाज का पूरा ढांचा संपन्न था. संपन्न समाज में ही उत्सव प्रवेश कर सकता है, गरीब समाज में उत्सव प्रवेश नहीं कर सकता. गरीब समाज में उत्सव धीरे-धीरे विदा होता जाता है. गरीब समाज उत्सव भी मनाता है, तो कर्ज लेकर मनाता है. इसीलिए वह होली के लिए पिछले वर्ष के पुराने कपड़े बचा कर रखता है. होली के दिन फटे-पुराने कपड़ों को निकालता है, यानी जब होली ही खेलनी है, तो फटे-पुराने कपड़ों से खेली जा सकती है.
तो मत ही खेलो. होली का मतलब ही यह है कि कपड़े इतने ज्यादा हैं कि रंग में भिगोये जा सकते हैं. पहले तो होली के दिन, जो सबसे अच्छे कपड़े थे, वही पहन कर निकलते थे लोग. उसका मतलब ही यह था कि इतने अच्छे कपड़े हैं, तुम रंग डालो! लेकिन जिससे हम रंग डलवाने जा रहे हैं, उसको भी धोखा दे रहे हैं. कपड़ा पुराना, धुलवा कर आ गये हैं.
वह रंग डालनेवाले को भी धोखा दे रहे हैं. रंग डालने का मतलब ही क्या था? जिन लोगों ने कपड़ों पर रंग डालने का खेल-खेला होगा, उनके पास कपड़े जरूरत से ज्यादा रहे होंगे, अन्यथा नहीं खेल सकते हैं यह खेल. इसलिए होली के दिन कोई कपड़े पर रंग डाल जाता है, तो दिल दुखता है. दिल खुश होना चाहिए कि किसी ने रंग डालने योग्य माना, लेकिन दिल दुखता है. दुखेगा, क्योंकि कपड़े भारी महंगे हो गये हैं. हां, पश्चिम में होली खेली जा सकती है. आज नहीं कल होली पश्चिम में प्रवेश करेगी, इसकी घोषणा की जा सकती है.
अब उनके पास कपड़े हैं, रंग भी हैं, समय भी है, फुर्सत भी है.
और उनकी होली में एक आनंद होगा, उत्सव होगा, जो हमारी होली में नहीं हो सकता. संपन्नता से मेरा मतलब है- संपूर्ण समाज की संपन्नता. पूरा समाज संपन्न होता है, तो जो उस समाज में दरिद्र होता है, वह भी उस समाज के संपन्न से बेहतर होता है. यानी आज अमेरिका का दरिद्रतम आदमी भी पैसे पर उतना पकड़ वाला नहीं है, जितना हिंदुस्तान का संपन्नतम आदमी है.
-आचार्य रजनीश ओशो
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