सिंधु जल संधि को स्थगित किए जाने के बाद लद्दाख में पानी के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में एक अहम पहल सामने आई है. स्टॉक कांगड़ी ग्लेशियर से निकलने वाले स्टॉक नाले के अतिरिक्त पानी को अब इगू-फे (Igoo-Phey) सिंचाई नहर में पहुंचाया जा रहा है. लद्दाख भारत का सबसे ठंडे और शुष्क इलाकों में से एक है. यहां ग्लेशियर और बर्फ पिघलने से पानी तो मिलता है, लेकिन खेती के लिए उसे सही जगह तक पहुंचाना बड़ी चुनौती रही है. यही वजह है कि एक तरफ पानी की धारा बहती रही और दूसरी तरफ किसान सीमित सिंचाई पानी के लिए इंतजार करते रहे. अब प्रशासन ने इसी अंतर को कम करने की कोशिश की है.कैसे खेतों तक पहुंचेगा ग्लेशियर का पानी?लद्दाख प्रशासन के अनुसार स्टॉक नाले से करीब 36.60 क्यूसेक पानी का बहाव होता है. एक क्यूसेक करीब 28.32 लीटर प्रति सेकंड के बराबर होता है. 24 घंटे के हिसाब से यह मात्रा करीब 9 करोड़ लीटर बैठती है. पहले इस पानी का बड़ा हिस्सा बिना इस्तेमाल के सिंधु नदी की ओर चला जाता था. अब इसके एक हिस्से को मौजूदा सिंचाई ढांचे की तरफ मोड़ा गया है.14 अगस्त को सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग ने स्टॉक नाले की धारा से पानी मोड़ने के लिए जेसीबी की मदद से दो साधारण ट्रेंच यानी नालियां तैयार कीं. शुरुआती चरण में करीब 26 क्यूसेक पानी नहर की ओर मोड़ा गया है. इसमें लगभग 19 क्यूसेक पानी इगू की दिशा में और 7 क्यूसेक इगू-फे की ओर भेजा जा रहा है. बाकी करीब 10 क्यूसेक पानी के इस्तेमाल की योजना पर भी काम चल रहा है.50 से करीब 80 क्यूसेक हुआ नहर में पानी का प्रवाहइस बदलाव का सबसे सीधा असर इगू-फे (Igoo-Phey) नहर के पानी पर पड़ेगा. प्रशासन के मुताबिक नहर में पहले करीब 50 क्यूसेक पानी उपलब्ध रहता है लेकिन ग्लेशियर के पानी की अतिरिक्त आपूर्ति के बाद यह प्रवाह करीब 80 क्यूसेक तक पहुंचने की उम्मीद है.इससे पहले सीमित पानी के कारण गांवों में सिंचाई की व्यवस्था रोस्टर के आधार पर चलती थी. यानी किसानों को तय समय और सीमित घंटों में ही पानी मिल पाता था. लेकिन अब रोजाना पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था बनी रहेगी .इगू-फे (Igoo-Phey) सिंचाई नहर खुद भी कोई नई परियोजना नहीं है. इसका निर्माण 1979 में शुरू हुआ था और 2005 में इसे पूरा किया गया. इसकी कुल लंबाई करीब 43 किलोमीटर है.लद्दाख प्रशासन के मुताबिक नहर को लगभग 4,500 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई के लिए डिजाइन किया गया था, हालांकि लंबे समय तक रखरखाव और पानी की कमी के कारण इसका पूरा लाभ नहीं मिल सका.कम लागत में खेतों तक पहुंचेगा पानी इस पहल की खासियत इसका कम लागत वाला तरीका है. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पानी को मोड़ने के लिए किसी बड़े बांध या नई नहर के निर्माण के बजाय साधारण अर्थवर्क और जेसीबी से ट्रेंच तैयार की गईं.यानी इस काम में बड़े कैपिटल एक्सपेंडिचर की जरूरत नहीं पड़ी. यह मॉडल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लद्दाख जैसे दुर्गम और ऊंचाई वाले इलाके में बड़े निर्माण कार्य महंगे और समय लेने वाले हो सकते हैं.ये भी पढ़ें: सरकारी स्कूल का जायजा लेने से पहले क्यों जरूरी है परमिशन ? CJP विवाद से समझिए पूरा नियमसिंधु जल संधि का इससे क्या संबंध है?यहां एक जरूरी चीज समझना जरूरी है. 1960 की सिंधु जल संधि के तहत सिंधु, झेलम और चिनाब पश्चिमी नदियां हैं, जिनके पानी के उपयोग में पाकिस्तान को व्यापक अधिकार मिले थे.वहीं भारत को इन नदियों के पानी का घरेलू उपयोग, सीमित कृषि उपयोग और निर्धारित शर्तों के तहत पनबिजली उत्पादन जैसे अधिकार दिए गए थे. बड़े प्रोजेक्टों के लिए संधि में सूचना और तकनीकी प्रक्रियाओं का प्रावधान था.भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से अबेयांस यानी स्थगित रखने का फैसला किया था.लद्दाख में स्टॉक नाले के ग्लेशियर पानी को सिंचाई के लिए मोड़ने की पहल का सिंधु जल संधि से सीधा कानूनी संबंध नहीं है, लेकिन इसका भौगोलिक संबंध जरूर है. स्टॉक नाले का पानी आगे चलकर सिंधु नदी में मिलता है.इसलिए इस पहल को फिलहाल स्थानीय जल संरक्षण और सिंचाई व्यवस्था मजबूत करने की कार्रवाई के तौर पर देखना ज्यादा सटीक है.ये भी पढ़ें: विदेश जाने वाले यात्री घटे, फिर कैसे बढ़ा विदेशी एयरलाइंस का ट्रैफिक? समझिए भारतीय कंपनियों को क्यों लगा दोहरा झटकालद्दाख के लिए क्यों है अहम है ये योजना लद्दाख में चुनौती सिर्फ पानी की उपलब्धता नहीं, बल्कि उसे सही समय पर खेत तक पहुंचाने की है. स्टॉक नाले के पानी को पहले से मौजूद नहर में पहुंचाने से नई परियोजना खड़ी किए बिना उपलब्ध संसाधन का उपयोग बढ़ाया जा रहा है. 12 गांवों और 1,000 एकड़ से अधिक जमीन तक नियमित सिंचाई पहुंचने पर खेती, फसल उत्पादन और ग्रामीण आय पर असर पड़ सकता है.इस पहल का बड़ा संदेश ये है कि पानी की समस्या हमेशा नए जलस्रोत खोजने की नहीं होती. कई बार समाधान पहले से मौजूद पानी को सही दिशा देने में छिपा होता है. रिपोर्ट के अनुसार लद्दाख प्रशासन अब ऐसे दूसरे नालों की भी पहचान कर रहा है, जहां ग्लेशियर और बर्फ पिघलने का पानी बिना इस्तेमाल बह जाता है. अगर इसी तरह कम लागत वाले स्थानीय समाधान आगे बढ़ते हैं, तो शीत मरुस्थल लद्दाख में खेती के लिए पानी की तस्वीर आने वाले वर्षों में काफी बदल सकती है.पढ़िए देश दुनिया और बिहार झारखंड की ओरिजिनल खबर