लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी लगातार सरकार पर यह आरोप लगा रहे हैं कि सरकार जनता के वोटों से चुनकर नहीं आई है. वह आरोप लगा रहे हैं कि यह सरकार वोटों में हेराफेरी करके सत्ता हथिया रही है. अब यहां यह समझने की जरूरत है कि आखिर यह कैसे संभव है? क्या राहुल गांधी बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं या फिर उनके आरोपों में कोई सच्चाई है?वोट चोरी का मुद्दा सामने कैसे आया?वोट चोरी को विपक्ष ने कब और कैसे मुद्दा बनाया, इसे समझने के लिए हमें पहले 2024 के लोकसभा चुनाव पर नजर डालनी होगी. लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन की पार्टियों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया. कुल 48 सीटों में से कांग्रेस को 13,शिवसेना (UBT) को 9 और एनसीपी (SP) को 8 सीटें मिलीं. कुल मिलाकर 48 सीटों में से 30 सीटें कांग्रेस और उनकी सहयोगी पार्टियों के पास थीं. बीजेपी और शिवसेना की सीटें महज 16 सीटों तक सिमट गई थीं. यहां सिमट गईं कहना इसलिए जरूरी है क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियों ने 48 में से 41 सीटें जीती थीं.लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र के प्रदर्शन ने कांग्रेस पार्टी में नई जान फूंकी क्योंकि पार्टी लगातार हार से पस्त हो चुकी थी. वहीं 2024 के चुनाव में अगर बीजेपी बहुमत के जादुई आंकड़े 272 से चूकी, तो बेशक इसमें महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम की अहम भूमिका था. लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 240 सीटें मिलीं थीं.महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 : पार्टीवार परिणामपार्टीसीटेंभाजपा (BJP)132शिवसेना (शिंदे)57राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार)41शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)20कांग्रेस16राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार)10समाजवादी पार्टी2जन सुराज्य शक्ति2निर्दलीय2राष्ट्रीय समाज पक्ष (RSP)1ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM)1राष्ट्रीय युवा स्वाभिमान पार्टी1राजर्षि शाहू विकास आघाड़ी1कुल288अब यहां यह समझना जरूरी है कि महाराष्ट्र के लोकसभा चुनाव से वोट चोरी का मुद्दा कैसे जुड़ा? दरअसल लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव भी हुए और दोनों चुनाव में महज 5 महीने का फर्क था. महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव, अप्रैल–मई 2024 को हुए जबकि विधानसभा चुनाव नवंबर महीने में हुए थे. लोकसभा चुनाव में जहां कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों का प्रदर्शन शानदार रहा था, वहीं विधानसभा चुनाव में पार्टी हार गई. महज 5 महीनों के अंतर पर हुए चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस फिसड्डी साबित हो गई. कुल 288 सीटों में से बीजेपी और गठबंधन को 234 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियां 50 सीटों पर सिमटी. यहीं से शुरुआत हुई वोट चोरी के आरोपों की. राहुल गांधी ने सरकार पर वोटों में हेराफेरी करके चुनाव जीतने का आरोप लगाना शुरू किया क्योंकि उनका यह सोचना था कि इतनी जल्दी मतदाता अपना मत नहीं बदलता.बिहार में हुए SIR ने वोट चोरी के मुद्दे को कैसे बढ़ाया?SIR यानी (Special Intensive Revision) वह गहन प्रक्रिया जिसके जरिये मतदाता सूची को संशोधित किया जाता है. यानी एसआईआर वह प्रोसेस है जिसमें चुनाव आयोग मतदाता सूची को वेरिफाई करता है और घर-घर जाकर मतदाताओं का वेरिफिकेशन करता है. जिसके जरिए मतदाताओं का नाम सूची में जोड़ा या हटाया जाता है. बिहार में विधानसभा चुनाव 2025 के पहले जब एसआईआर शुरू हुआ तो उसके लिए 2003 के मतदाता सूची को आधार बनाकर वेरिफिकेशन किया जाने लगा. जो लोग 2003 में 18 साल के नहीं हुए थे, वैसे मतदाताओं को अपनी पात्रता की वैधता साबित करने के लिए अपने माता-पिता और परिवार वालों की पहचान के लिए दस्तावेज जमा करने पड़ रहे थे, जिसकी वजह से कई लोगों का नाम सूची से कट गया. चुनाव आयोग के अनुसार करीब 65 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट से हटाए गए थे.इस आंकड़े के सामने आने के बाद विपक्ष आक्रामक हो गया और कहा जाने लगा कि सरकार चुनाव आयोग को कठपुतली की तरह इस्तेमाल कर रही है और उनका इस्तेमाल वोट चोरी कर चुनाव जीतने के लिए कर रही है. अब सवाल यह है कि आखिर यह कैसे संभव है? देश में तो ईवीएम के जरिए चुनाव होते हैं, तो वोट चोरी कैसे हो सकता है?वोट चोरी का गणित क्या बता रहे विपक्षी दल ?राहुल गांधीविपक्ष के नेता राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी सरकार पर वोट चोरी का जो आरोप लगाते आ रहे हैं, क्या वह संभव है? अगर संभव है, तो कैसे? इसे लेकर विपक्षी दलों की अपनी-अपनी दलील है. सियासी दल वोट चोरी का जो गणित बता रहे हैं, उसको कुछ इस तरह से समझा जा सकता है. मान लीजिए किसी लोकसभा सीट पर दो प्रमुख उम्मीदवारों को 5.10 लाख और 4.90 लाख वोट मिलते हैं. जीत का अंतर 20 हजार वोट है. अब अगर किसी कारण से दूसरे उम्मीदवार के 15 हजार वास्तविक समर्थक मतदाता सूची से बाहर हो जाएं और वे मतदान न कर पाएं, तो वोट मशीन में किसी तरह की गड़बड़ी किए बिना ही चुनावी अंतर 35 हजार हो जाएगा. मतदाता सूची में वास्तविक मतदाता का नाम जुड़ा या हटा रहना भी चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है. ऐसा राजनीतिक दलों का दावा है. इसी को आधार बनाकर राजनीतिक दल मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और वेरिफिकेशन की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं. विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग इरादतन वैसे वोटर्स का नाम हटा रहा है, जो सरकार के खिलाफ वोट कर सकते हैं.<div class="poll-widget" data-poll-id="6abe425c0f1123fc50b87aeb" data-template="template#2"></div>क्या है फॉर्म 6 विवाद ?फॉर्म 6 के जरिये कोई व्यक्ति मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदन करता है. चूंकि अभी जो SIR हो रहा है उसका आधार 2003 के मतदाता सूची को बनाया गया है इसलिए फॉर्म 6 में एक अतिरिक्त डिक्लेरेशन जोड़ा गया था. इसमें आवेदक से पूछा गया कि उसका, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछले एसआईआर में था या नहीं. दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज की. उनका तर्क था कि फॉर्म 6 में इस तरह का बदलाव नियमों में संशोधन के बिना नहीं किया जाना चाहिए. लेकिन चुनाव आयोग का पक्ष अलग है. आयोग का कहना है कि मूल फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया , बल्कि SIR के लिए अतिरिक्त घोषणापत्र जोड़ा गया था. इस मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के बीच विवाद हुआ, जिसकी रिपोर्टिंग इंडियन एक्सप्रेस ने की और पूरे देश में यह मामला गरमाया. विपक्ष का आरोप है कि फॉर्म 6 की आड़ में कई लोगों के नाम सूची से हटाए गए हैं.क्या है एक्सपर्ट्स की राय?पूर्व सूचना आयुक्त और वरिष्ठ पत्रकार बैजनाथ मिश्र का कहना है कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी को अतिश्योक्ति अलंकार में बात करने की आदत है. अगर वोट चोरी हो रहा है, तो उनके बूथ लेवल एजेंट क्या कर रहे हैं, वो क्यों नहीं आपत्ति दर्ज करा रहे हैं? अगर चुनाव आयोग किसी मतदाता की पात्रता पर सवाल उठा रहा है, तो आपत्ति दर्ज करानी चाहिए, आयोग को जवाब देना होगा. एसआईआर की प्रक्रिया इस देश में पहली बार नहीं हो रही है, मतदाता अपने अधिकारों से वाकिफ है और अगर उसका नाम कटेगा, तो वो चुप नहीं बैठेगा. जो पार्टियां यह आरोप लगा रही हैं कि उनके वोटर्स के नाम काटे जा रहे हैं, उनके पास इस बात का क्या प्रमाण है कि जो नाम कटे हैं वो बीजेपी के वोटर्स थे या कांग्रेस के? कोई भी चुनाव आयुक्त हो वो किसी पार्टी को चुनाव नहीं जिता सकता, क्योंकि देश की जनता बहुत समझदार है और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी.प्रभात खबर के पॉलिटिकल एडिटर मिथिलेश कुमार का कहना है कि बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया पूरी हुई तो 65 लाख लोगों का नाम सूची से हटाया गया. अगर ये लोग वैध वोटर्स होते तो कोई तो सामने आता? 65 लाख बहुत बड़ी संख्या है, 65 हजार लोग भी सामने नहीं आए, जिन्होंने यह कहा हो कि मेरा नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है. एसआईआर की प्रक्रिया को मैंने करीब से देखा है. यहां गड़बड़ी यह नहीं है कि किसी एजेंडे के तहत किसी व्यक्ति का नाम काटा गया, दिक्कत यह है कि बीएलओ घर-घर जाते नहीं है, जिसकी वजह से परेशानी होती है. मतदाता सूची में हेराफेरी की बात महज पॉलिटिकल एजेंडा है.अगर किसी बूथ में गलत तरीके से मतदाताओं का नाम जोड़ा या हटाया गया है, तो जो राजनीतिक दल आरोप लगा रहे हैं उनके बूथ लेवल एजेंट मामले को उजागर क्यों नहीं कर रहे हैं? यह सवाल भी राजनीतिक दलों से पूछा जाना चाहिए. बीएलओ को टास्क भी इतना ज्यादा दे दिया जाता है कि उसकी समस्याएं व्यावहारिक नजर आती हैं. एसआईआर की प्रक्रिया में कोई समस्या नहीं है और इस बात को सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है.ये भी पढ़ें: Explained: ज्ञानेश कुमार को हटाने की तैयारी में कांग्रेस! कैसे होती है CEC की नियुक्ति और हटाने का क्या है नियम?